भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 405, कुल 470 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 405

नवां समय ११ ] पृथ्वीराजरासो । ३६५ अरब खां का कहना कि हुसैन खां को निकाल देने के लिये सुलतान ने कहा है ॥ छंद पद्धरी ॥ उच्चरौ वैन आरब्ब सेष । सल्लाम बहुत पनि एक एष ॥ कढ्ढौ हुसेन तुम देस अंत । साचाव साचि वंकौ सुसंत ॥ इं० ॥ ४३ ॥ जुगमीत अच्छिय उवरै न आदि । इस ताउ आउ बहु वैन सादि ॥ जंपे सुं दैल जे कहे साचि । कढ्ढो न वत्त गंभीर आचि ॥ ळं० ॥ ४४ ॥ शहाबुद्दीन का संदेसा सुनकर पृथ्वीराज का मुख लाल हो गया, भौहें चढ़ गईं ॥ संभखिय वत्त प्रथिराज संत । त्रिकुटी कङ्कर द्विग रक्त जंत ॥ आरक्त मुष्प स्तुत ओन बुंद । कनमन्तिय कोप रोमांच जिंद ॥ इं० ॥ ४५ ॥ कैमास ने डपट कर कहा कि आर्य लोगों का धर्म सुलतान नहीं जानता इससे ऐसा कहता है, हुसैन पृथ्वीराज के शरणागत है, छत्री का धर्म उसे छोड़ने का नहीं है ॥ उच्चरौ कोपि कैमास वानि । अतासनि आर्य सिंचौ सुजानि ॥ आरब्ब बोल दोल्यौ विरूर । सुरतान जानि जंप्यौ गहूर ॥ इं० ॥ ४६ ॥ पनि वुद्ध खच्चौ प्रथिराज तूर । ऋतुवित्त जुद्ध सामंत सूर ॥ हुस्सेन आइ प्रथिराज थान । जोधांन भ्रम पचीय आन ॥ ळं० ॥ ४७ ॥ कन्ह चौहान, सूरसिंह, गोयंदराज, चन्द, पुंडीर आदि का भी यही कहना और सुलतान से लड़ने को हम प्रस्तुत हैं यह कहना ॥ जंपै सुवैन चहुभ्रंनि कन्ह । द्विग पनि रक्त रोमांच तंन ॥ रज भ्रम विषम बुझक्कै न साच । अनि राच्च जेम जंपै विराह ॥ इं० ॥४८॥ गज्जै न लज्ज कोपैं मृगिंद्र । उत्कृष्ट सूर सिर सहि न निंद्र ॥ गुरु तज्जि जंपि गोइंद राज । लग वैन गीर गरु वत्त साज ॥ इं० ॥४९॥ संज्वान तेज सम तेज बान । निरभै सुतासु चंपै पयान ॥ उच्चल्यौ चंद पुंडीर कोप । आदीत भाज रस दून छोर ॥ इं० ॥ ५० ॥