भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 408, कुल 470 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 408

३६८ पृथ्वीराजरासो । [ नवां समय १४ अरब खां का पृथ्वीराज के बल की प्रशंसा करना ॥ कवित्त ॥ दृष्ट मंच उच्चार । दिष्ट उठ्ठ चित इक्क थर ॥ क्रमत पेषि पच्चीस । भिल्लन सन एक्क दृष्टि पर ॥ सहस सुभर बाधंत । एक्क सामंत पराक्रम ॥ जामच्च दुप्पल्ल करै । ताम बाधंत वीर दस ॥ सिर परै सुचक्कै धर भिरै । परै श्रोन उठ्ठे सधर ॥ असिधार सूर उठ्ठै किलकिकि । एह पराक्रम सूर नर ॥ छं० ॥६१॥ रु० ॥४०॥ तातार खां का अरब खां की बात को हँसी में उड़ा देना, अरब खां का कहना कि अपनी आंख से न देखने से ऐसा कहते है। ॥ कवित्त ॥ हस्यौ षान तातार । एम घाजी सम वदिय ॥ जय रुनची बिन बषत । मरन भै डरै न कहिय ॥ कहि आरब तत्तार । अहो सामंत न दिष्टिय ॥ अतुल तेज बल अतुल । अतुल बल देव सुरषिय ॥ वे साम अंग रत्ते अतुल । अतुल मत्त कैमास भर ॥ उमरा अनंत देषे अनत । अतुल बल पहुचै न नर ॥ छं० ॥६२॥ रु० ॥४१॥ शाह का क्रोध करके तातार खां को चढ़ाई के लिये प्रस्तुत होने की आज्ञा देना ॥ दूहा ॥ कहै साचि गोरी गहअ । अहो षान तत्तार ॥ काल्हि तरीक सुडंच दिन । चढि अरि सद्धौ सार ॥ छं० ॥६३॥ रु० ॥४२॥ दूहा ॥ उठि गोरी दिन्ने बहुरि । गयौ सु अंदर साह ॥ बहुरि षान मीरं बरा । अति चंचल तुर ताह ॥ छं० ॥ ६४ ॥ रु० ॥ ४३ ॥ ४० पाठान्तर--उच्चार । उठ । इक्क । पच्चीस । दृषि । दुप्ल । तांम । परै । सुहक्कै । उठैं । ऊठैं । ४१ पाठान्तर--तत्तार । वदिय । भय । कहिय । काहि । दिषिय । रषिय । सांम । उंमरा । अनंत ॥ ४२ पाठान्तर--काल्हि । तेरीक सुं । सधौ ॥ ४३ पाठान्तर--दिनं ॥