पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 410, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ें४०० | पृथ्वौराजरासो । | [ नवां समय १६ अरब खां का कहना कि आज ठहर जाइए शकुन अच्छा नहीं है ॥ गही सुरतान सु आरब बग्ग । रहौ दिन आज सगुंन न जग्ग ॥ रहै कुहु अज्ज ततार सुदिन । मची चढि चल्लहु मन्नि सगुन्न ॥ कं० ॥७१॥ सुलतान का कहना कि काफ़िर चौहान को जीतना कौन बड़ी बात है जो इतना बिचार करते हैं ॥ कहै सुरतान अहो तुम क्रूर । भयं भय क्षित्यु सु भंषहु नूर ॥ कहा बल जुद्ध कहै प्रथिराज । कित्तौ बल सामत जुडिच्च साज ॥ कं० ॥७२॥* छनां रन सूर जिके चहुआन । गहैं जुध राज सु छंडिय प्रान ॥ कहा डर काफर दाषहु मुक्झ । कहा भर आवध आंगरि जुक्झ ॥ कं ॥ ७३ ॥ * नसंनि चमंकि च्ल्यौ सुरतान । टमंकिय गज्जिय न्ह निसान ॥ जल व्यल होय थलं जल भार । असमग्गह मग्ग चल्लै गछिन्लार ॥ कं० ॥७४॥ मिल्यौ इक साहन लष समुंद । समुझिकन कंन भयो सुर मुंद ॥ चल्थौ सुरतान मिलान मिलान । बढी अति चिंत दुनी चहुआन ॥ कं० ॥ ७५ ॥ रू० ॥ ४६ ॥ शाह का चौहान की ओर जाना और दूतों का यह समाचार नागौर में हुसैन को देना ॥ दूहा ॥ गयौ साचि चहुआन घर । दिण मिलान मिलान ॥ गए सुचर नागौर पुर । कही षबरि सुरतान ॥ छं० ॥ ७६ ॥ रु० ॥ ५७ ॥ पृथ्वीराज का चढ़ाई का समाचार सुनकर सरदारों को बुला- कर सिंध तक शाह के पहुंचने का हाल कहना ॥ कवित्त ॥ सुनिय षबरि प्र थराज । कचिय जे चरन चरित सद्द ॥ बोलि मंत्रि कयमास । बोलि चामंड गुभक्क गद्द ॥
- यह ७२ और ७३ दो छंद सं० १६४७ वाली पुरानी पुस्तक में नहीं किन्तु इतर में हैं ॥ .४१ पाठान्तर-चहुवान । धर । दीए । मिलांन २ । सुंचर । सुरतांन ॥