पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवां समय १० ] पृथ्वीराजरासो । ४०१ बोल्लि चंद पुंडीर । बोल्लि पीची प्रसंग बर ॥ बोल्लि गज्जि गहिल्लोत । बोल्लि काकन्द नाह नर ॥ बोलेति सव्व सामंत भर । कही वत्त सो कहिय चर ॥ सासंत संत भर सव्व मिल्लि । सिंधु सुचंपिय साह घर ॥ छं० ॥ ७७ ॥ रु० ॥ ४८ ॥ लड़ने के लिये प्रस्तुत होने का सब का मत होना ॥ दूहा ॥ कहत सव्व सामंत मति । चढि दल्ल सजौ समंकि ॥ सुनिव मंति कायमास कहि । करहु निसान तमंकि ॥ छं० ॥ ७८ ॥ रु० ॥ ४९ ॥ युद्ध की तयारी होना ॥ गाथा ॥ भय टामंक निसानं । पत्तं निज गेह सूर सामंतं ॥ वाजे वज्जि अनेकं । चय संगे राज चहुआनं ॥ छं० ॥ ७९ ॥ रु० ॥ ५० ॥ गुरुराम ब्राह्मण का आकर आशिर्वाद देना, बहुत कुछ दान कराना और वेद मंत्र से तिलक करना ॥ छंद पद्धरी ॥ आये सुनाम गुर राम राज । पढि पच मंच द्विज बोल्लि साज ॥ ग्रह नव सुदान विधि विद्ध दीन । वेदंत विप्र अभिषेक कीन ॥ छं० ॥ ८० ॥ चव सहस हेम दिय विप्र दान । अस्सेष वेद चय साम गान ॥ दिय दान भूरि पंषी सु चंड । दीनौ सु अध्य जिन हध्य मंडि ॥ छं० ॥ ८१ ॥ जै जया जोच जंपी सु आन । मंगल सुचार चव पढि गान ॥ आसिय दयन चहुआन रान । गुरु राम जज्जि आहुत्त प्रान ॥ छं० ॥ ८२ ॥ ४८ पाठान्तर-प्रथीराज । चरनि । कैमास । भुक्कू । एह । पीचि । गजि । सब । मिल्लि ॥ ४९ पाठान्तर-सुनै । मंत । कैमास । करहु । निसांन ॥ ५० पाठान्तर-पतं । गेह । सामंता । चहुआनं ॥ ५