पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१८ पृथ्वीराजरासो । [ नवां समय ३४. रत्तरे गात उत्तंग तन । उड्ढ रोम झारंत असि ॥ गच्चि दंत दंति धरि पुंछ छय । उड्डि सुनंघिय बीर हँसि ॥ कूं० ॥ १८० ॥ रू० ॥ ८४ ॥ शहाबुद्दीन की सेना का भड़कना और पृथ्वीराज की सेना का पीछा करना ॥ कवित्त ॥ भरकि सेन साहाब । डररि भगे छय गय नर ॥ घरिय एक बित्ती । बिहुर अड्डे अघास घर ॥ दिष्ठि दिष्ट साहाब । राइ चामंड बीर बर ॥ चंद्रसेन पुंडीर । जाम जह्वां भर सुब्भर ॥ कैमास दिष्टि दिष्ट्यौ सजर । कल्ले च्यारि गछनं सुबचि ॥ आए सुबीर अड्डे अकसि । रन रस आवध रीठ मचि ॥ छं० ॥ १८१ ॥ रू० ॥ ८५ ॥ घोर युद्ध का वर्णन ॥ छंद बिज्जुमाला ॥ मचिय मत्त आवद्ध रीठ । अर घरि दैन सुब्भर पीठ ॥ धक्कैं सूर अग्गर सार । धर धर परै तुहिय धार ॥ छं० ॥ १८२ ॥ जंपैं उभे दीन जु आंन । जुझ्झिय मत्त मत्तिय पांन ॥ बद्ध बद्धह कद्द कै हाक । बज्जे विषम आवध झाक ॥ छं० ॥ १८३ ॥ परि खर थरैं उठैं एक । तब्सी उक्कसि झारैं नेक ॥ छह छही आवध सार । बाद्यै बीर बारं बार ॥ छं० ॥ १८४ ॥ अन्यो अन्य सहैं नाम । आवध ग्रहैं अप्पन ताम ॥ हंहं करैं इष्ट संभारि । उठ्ठै बिरह धारी झारि ॥ छं० ॥ १८५ ॥ अद्धैभुत बीर भैयान । मंचिय कंक विषम कृपान ॥ नर बर बरय हंस रँभान । उट्ठिय नेह प्रेच्छति जानि ॥ छं० ॥ १८६ ॥ ८४ पाठान्तर-मंडलीक । झुझ ढाह भर सुभर । बुड्डिय । उठिय । रतरे । उतंग । उध उडि । हंसि ॥ ८५ पाठान्तर-घरीय । बिहूर । अडे । आय सुहर भर । अथासु । दिषि । राय चामुंड । जांम । जद्दो । सुभर । गहन । सुमीर । अडे । दिन ॥