पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 427, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंकचं निवार विथ्थुरं । सुगंधि पंषि कंदुरं ॥ वहंत पूर जोरयं । कक्रूर सह रोरयं ॥ छं० ॥ १८५ ॥ सुतान पंति गोमयं । उचंत वीर सेनयं ॥ अनेक रंग चंमरी । वहंत जीन पंमरी ॥ छं० ॥ १८६ ॥ वदी अनेक साकते । कहंत चंद वाकते ॥ अनेक रथ्य अच्छरं । वरंत सूर सच्छरं ॥ छं० ॥ १८७ ॥ रजोद कंठ सक्कती । रजंत श्रोन रक्तती ॥ हछक्क रंत साजयं । झरंत जेम वाजयं * ॥ छं० ॥ १८८ ॥ रु० ॥ ८२ ॥ पृथ्वीराज की सेना की बढ़ना, और मंडलीक का मारा जाना ॥ कवित्त ॥ बाज जेम चहुआनं । झारि सेना झर सुझर ॥ कोउ उत्त केलत्त । गज्ज ढाहै धर सुद्धर ॥ ढेलि अनी दस पेंड । झंझ वाजंती झारी ॥ मारि सौर अनभंग । बिधर जू क्षेभर सारी ॥ मंडलीक सूर पिछिय सुभर । जुटे पांन सु गज्जनिय ॥ मंडलीक सीस तुहैं बिलगि । धन्यौ पांन बिन चंचनिय ॥ छं० ॥ १८८॥ रु०॥८३ ॥ कवित्त ॥ बिना सीस मंडलीक । छयौ गज्जनीय पांन गुर ॥ अवर मीर चालीस । जुझ रू ढाछ भर सुझर ॥ परत सुअन पर संग । बुद रुधिरं नर बुद्धिय ॥ सुदृध पग्ग सच एक । वीर करि किलकि सुउट्ठिय ॥ ८२ पाठान्तर-छंद लघुनाराच । नराज छंद । बांन । बांनयं ॥ १७० ॥ आउध ॥ १७१ ॥ हवकि । झटकयं । टकयं ॥ १७२ ॥ नरं । बगतंरं । हुअंत ॥ १७३ ॥ फर । पाय । सिंघयौ ॥ १७४ ॥ धकधकयं । दंतदंतरं । अरुझरंत । १७५ ॥ भभकयंत । झरफरंत । किलकि ॥ १७६ ॥ मठि चरियं । दियंत । वीर । डहकि । धम ॥ १७७ ॥ फेरियं । संपूर । सकती । हकती ॥ १७८ ॥ कामयं । गन ॥ १७९ ॥ गंज । चिक्करं । फिकरं । क्रिनक्रिनंत ॥ १८० ॥ नदीयं । सदीयं । धरं गढं । विकठयं । सठय ॥ १८१ ॥ मद्धयौ । ससीस । वछ्यौ ॥ १८२ ॥ झिंगजंसु । ग्राहयो । किरंजि । अथ । चाह्यौ । रुलंत मीर निम्मयं ॥ १८३ ॥ सुभंत शीश । दिगं ॥ १८४ ॥ बियुरं । कंठरं । कसूर ॥ १८५ ॥ गोगयं । वीर रोमयं । जान संमदी ॥ १८६ ॥ रथ । अक्रर । सकरं ॥ १८७ ॥ सकतों । रकती । हहक । रंज १ १८८ ॥ * यह तुक ए. सो. की प्रति में नहीं है । ८३ पाठान्तर-चहुवांन । सुझर । फेडलत खेलत । गज । वाजंतो ठारी । मारि मार । मंडलीक । पिंक्षिय । पेंजिय । गजनोय । मंडलीक । शीश तुट्टे । बिन सीस नीय ॥