पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१६ पृथ्वीराजरासो । [ नवां समय ३२ करी सुफौज एकयं । बहंत ताम तेकयं बहंत वीर आवधं । करंत बीर सावधं ॥ छं० ॥ १७१ ॥ छबक्किक संग संगयं । बहंत अंग अंगयं ॥ झटा-पटा झमक्कयं । करीअ रीत टक्कयं ॥ छं० ॥ १७२ ॥ समं भरं बगत्तरं । छुवंत षंड षंडरं ॥ ठरंत हंड मुंडयं । क्रमंत जंत तुंडयं ॥ छं० ॥ १७३ ॥ फरं फरंत फेफरं । बुझंत ते डरं डरं ॥ करें सुपाडू रिंघयौ । करंत घाव घिंघयौ ॥ छं० ॥ १७४ ॥ करंत धक्क धक्कयं । क्रमंत धक्क धक्कयं ॥ चढंत देत दंतरं । अरु असंत अंतरं ॥ छं० ॥ १७५ ॥ अभक्कयंत श्रोनयं । बहंत वेग कोनयं ॥ झरप्फरंत गिद्धयौ । किलकिकलंन सिद्ध्यौ ॥ छं० ॥ १७६ ॥ नचंत सट्ठि सारियं । करंत बोर तारियं ॥ उछक्कि उक्क ईसुरं । धमं धसंत भीसुरं ॥ छं० ॥ १७७ ॥ फिकारियंत फेरियं । पलं चरंत रेकियं ॥ सपूर श्रोन सक्कती । गुरं सुरंग छक्कती ॥ छं० ॥ १७८ ॥ किलं सुकंठ षामयं । मनंत मंनि तामयं ॥ कटे सुगज्ज कंधरं । विहंड षंड षंडरं ॥ छं० ॥ १७६ ॥ करंग गज्ज चिक्करं । फिरंत सूर फिक्करं ॥ किनक्किनंत बाजयं । जमं ग्रहंत साजयं ॥ छं० ॥ १८० ॥ बह्रंत श्रोन नद्दियं । चलंत सूर सहियं ॥ धरं गजं विकं ठयं । धयं अनेक संठयं ॥ छं० ॥ १८१ ॥ तरं सभ्रंडं झालयं । रजंत संगि लालयं ॥ धरं परंत मच्छयौ । गजं सु सीस कच्छयौ ॥ छं० ॥ १८२ ॥ गजं सुसुंड ग्राछयौ । सुरंजि अप्प चाछयौ ॥ रजंत बीर नम्मयं । भयं दंपति जम्मयं ॥ छं० ॥ १८३ ॥ पल अनंत पंकयं । कुकांतेरं भयं कयं ॥ सुहंत सीस अंबुजं । षटं पदं द्विग्गंबुजं ॥ छं० ॥ १८४ ॥