पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआदि पर्व ] . पृथ्वीराजरासौ । २६ खिजि कच्चौ नैन भरीव । तस नाम रूप सरीव ॥ पै जुन्न बालक बुद्धि । गलि गर्भ क्यौं न वितुद्धि ॥ १०२ ॥ तिच्छि तजिय तात ह्मान । धरि कोप अंग निधान ॥ करि क्रोध अंखि सुरत्त । छविजानि लग्गिय लत्त ॥ १०३ ॥ जिहि जियत पुच्च अप्प । को तांत लब्भय दप्प ॥ रिस करौं जोब प्रमान । जरै तीन लोक अमान ॥ १०४ ॥ रिस तेज कंपत बाल । दिप्यो सु तात विसाल ॥ वह लग्गि ब्रह्म धियान । भयौ कोटि तामस नाम ॥ १०५ ॥ अति ना रत्न दिखि रिखि लोइ । दिख्या सु तात समोइ ॥ छं० ॥ १०६ ॥ रू० ॥ ५१ ॥ कवित्त ॥ जोरि हत्थ थुति संच । फिर्यो पर दच्छि लग्गि पथ ॥ रुधिर नयन आरक्त । कंठ लग्ग्यौ सु मुक्ति भय ॥ भूत द्वार वीभार । गाजि आये सुत मग्गं ॥ भर भर भर उच्चार । रोस दावा नल लग्गं ॥ जिहि चच्चौ अप्प मो तात गर । गनिव सत्त दिन में प्रमति ॥ जो हत्यो अप्प तक्षक सुन्नत । कै काया अन्न सुगति ॥ छं० ॥ १०७ ॥ रू० ॥ ५२ ॥ साटक ॥ धंन्यो धंन्य सु बाल तापन तपं । बालं वलं विव्हलं ॥ सोयं पुच कि सोस दोस चि विधं । वानीय गद् गद् गलं ॥ एवं भूप विसाल भूमि भरतं । धर्मं धरा राजनं ॥ तं तेजं नवि चोर व्याघ्र विघनं । नैवापि संतापयं ॥ छं० ॥ १०८ ॥ रू० ॥ ५३ ॥ और चंद के काव्य को उक्त भारत औ भागवत से मिलाकर सूक्ष्म विचार कर देखे तो वह निः- संदेह यह अनुमान कर सक्ता है कि चंद संस्कृत भाषा अच्छी जानता था और यह बड़े बड़े ग्रंथ भी उस के पढ़े हुए थे क्योंकि चंद के कोई २ छंद उक्त ग्रंथों के श्लोकों के ठीक अनुवाद प्रतीत होते हैं । इस हनूफाल छंद के चारों पाद बारह २ मात्रा के होते हैं ॥ ५२ पाठान्तरः-फिर्र्यौ । लग्यौ । विभार । जाजि । आइय । आईय । हत्यो । प्रमत्ति । प्रमित्त । कैकाया । सुयति ॥ ५३ पाठान्तरः-धन्यौ धन्य । तनं । बाल । भरनं । तेजंन । विचोर । विघन ॥