भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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पृष्ठ 45

२८ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व दत्वा आप मिदं श्रुतं गुरु वरं । मृत्यं च राजा नयं ॥ सत्यँ संप्त दिनानि पानि पवरं । नैवं चलते पयं ॥ त्वं आपं चय लोक जाखति बरं । भुंजे वरं पुचयं ॥ एकँ दीछ सुतप्य प्रापति पदं । त्रैलोकयं चासयं ॥ छं० ॥ १०८ ॥ रू० ॥ ५४ ॥ दूहा ॥ सब रिखि सँ सो पुच तू । वय दिक्खौ परमान ॥ मानहु डम्बर सें उदै । बढति कला बर भान ॥ छं० ॥ ११० ॥ रू० ॥ ५५ ॥ कवित्त ॥ पुच कंठि रिखिराज । जाइ नृप थान सु वत्तौ ॥ पंथ कुज्जह संगह्यौ । रिषि आपान विरत्तौ ॥ अति सु दीन सिर नोच । ऊंच नहिं भाल उचाइय ॥ दिष्टि दिष्ट राजन चरित्त । मंगन नृप आइय ॥ एकांग एक जोगिन्द्र वर । धातु न बंधे हथ्थ पर ॥ करि काज रिखि आयौ घरहि । उरच धरइर लग्ग डर ॥ छं० ॥ १११ ॥ रू० ५६ ॥ गाहा ॥ जो जंप्यो रिष पुत्तं । प्रलयं होइ सत्तियं कालं ॥ जं आवडू तं भ्रंमं । सो किज्जै राजनं बज्जयं ॥ ॥ छं० ॥ ११२ ॥ रू० ॥ ५७ ॥ चोटक ॥ नृप कंठि प्रजंक प्रजंक पला । मुहु मुंदिरु भानक मोद कला ॥ नृप दीन छल्यौ बहु चित्त चितं । सुछल्या जनु पोनय पीप पतं ॥ ॥ छं० ॥ ११३ ॥ पतनं गुर जानि चरन्न लग्यौ । बहुश्यां रिषिराज सु प्रान दग्ग्यौ ॥ ॥ छं० ॥ ११४ ॥ रू० ॥ ५८ ॥ ५४ पाठान्तरः- म्रतंच । मृत्यंच । पानिपहरं । पय । आप हूलाति । तैलाकयं ॥ ५५ पाठान्तरः-मै । मे । तूं । परसान । संवत् १६४७ की पुस्तक में हमारा लिखा पाठ है और इतर पुस्तकों में "मानहु इंदौ वर उदै" है ॥ ५६ पाठान्तरः-जाय । संपत्तौ । आपन । ऊंच । नह । नहि । द्रिष्ट । वप । आईय । जोगिन्द । हथ । किंहि । घरह । उर । घर । अहुर । र्जागग ॥ ५७ पाठान्तर :-झो । झंप्यों । पुत्रं । भावै । भाव । इतं । जो । कीजै ॥ ५८ पाठान्तरः-चिप । वप । फला । दला । मुहुमंदिरू । भान । कमोद । न्रंप । बहुचित । जुनु । पोनय । बहुयौं । किसी पुस्तक में सु शब्द नहीं है ॥