पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 46, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंआदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । २६ गाहा ॥ मनो रिपि छह्यं प्रानं । बल्लीकं जीवनं गुरयं ॥ जो फल लग्यौ पच्छ । तौ कालं रिप खो वरयं ॥ ॥ छं० ॥ ११५ ॥ रू० ॥ ५८ ॥ दूहा ॥ दूय चिंतय रिषि राज गुर । पुच्छिय अन रिष राज ॥ द्यौं उधार होइ आप वर । कहो कृपा करि आज ॥ ॥ छं० ॥ ११६ ॥ रू० ॥ ६० ॥ कवित्त ॥ मद संडी इक पुरुष । निसा भइव अध रत्ती ॥ वरंगना अंगने । डस्यौ अच्चि परत धरत्ती ॥ सुरापान आसिष्य । गयौ करहुं तव छुद्दिय ॥ उच्चारन चा राम । जाय वैकुंठ सु ठहिय ॥ परताप नाम सद गति भइय । कीर कहत परिषत्त सम ॥ भागवत्त सुनच्चि जो इक्क चित । तौ सराप छुद्दय अक्रम ॥ ॥ छं० ॥ ११७ ॥ रू० ॥ ६१ ॥ ज दिन आप तुच्चि भयौ । त दिन परिखोक घर घघर ॥ पसू पंषि जन्र खंडि । कुंडि मुनिवर समाधि उर ॥ कुंडि चक्र घरि रष्षि । कूप तूं मात परिष्षत ॥ पंडव वंस प्रतष्ष । तषत भ्रम धारी दिप्पत ॥ अचरिज्ज कहा तुम उद्धरन । होइ प्रसन सुकदेव कहि ॥ दिन सत्त अवधि अंतर बहुत । धरि सु उद्धरै छिनक महि ॥ ॥ छं० ॥ ११८ ॥ रू० ॥ ६२ ॥ धरनि रूप करि धेन । भ्रम्स वछरा संग लीयै ॥ झारषंड महि चरत । देषि कलिजुग कुपि चीयै ॥ चरन तीन भद्धांत । प्रजा सब आय पुकारिय ॥ चढि करि तें नृपराज । बद्ध्य परि ताच्चि बक्कारिय ॥ ५८ पाठान्तर :- प्रान । वलीकं । लगौ । पछू । पछं । तो ॥ इस के छंद का नाम सं० १६४७ की पुस्तक में गाथा है ॥ ६० पाठान्तर :-चिंतन । रिपिराज । पुछिय । होय । आप ॥ ६१-६३-यह तीन रूपक सं० १७१० और सं० १६४७ की पुस्तक के अतिरिक्त उस से पीछे की जितनी पुस्तक अब तक मेरे देखने में आई हैं उन सब में हैं परन्तु जब तक उन से भी पहिले की पुस्तकें न प्राप्त हों तब तक इन रूपकों को हम निश्चय रूप से क्षेपक नहीं कह सक्ते । इन को