भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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३० पृथ्वीराजरासौ। [ आदि पर्व कित्ति कीर अंग लग्गौ परस। तिहि कारन इह उपजिय॥ आषेट जाय पन्नग मृतक। सिंगी, गर घत्तिय, षिज्ञिय॥ ॥ छं०॥ ११८॥ रू०॥ ६३॥ तोटक॥ इति चोटक छंद सुसंत गुरं। दिन सात पळ्यौ हरि गंग कुरं॥ त्रितकाल विकालह चित्त धरं। क्खित पत्त छिमा पिवु लाइ भरं॥ ॥ छं०॥ १२०॥ नृपराज परीक्षत तत्त गुरं। धरि ध्यान कह्यौ बदळीष धरं॥ जून काल सु तप्पय देव नरं। नृप ग्यान सुन्यौ वपु व्यास वरं॥ ॥ छं०॥ १२१॥ रू०॥ ६४॥ साटक॥ या विद्या बदळीत राजन गुरं। आपो रिषं तारयं॥ पून्यं राज सु इन्द्र धारन घरं। विद्या अमारा पुरं॥ अभ्भोयं सुधनं तु मातुळ इयं, सोहं च.रंत्तारयं॥ स्त्रा ध्यानं रिषिराज राजन वरं। पापापच्चारं परं॥ ॥ छं०॥ १२२॥ रू०॥ ६५॥ चौपाई॥ अति किसलय सुस कोमल अंग। जानु कि सुक्किय देहिय अंग॥ [L17: क्रिष्ण दिपायन दीपन व्यास। कोपिन एकिन मंडल चास॥ ॥ छं०॥ १२३॥ रू०॥ ६६॥ दूहा॥ किसनदीप दीपाय नह। कही रिषी सब बत्त॥ जु कछु सराप सु उद्धस्यो। परनराज गेह गत्त॥ ॥ छं०॥ १२४॥ रू०॥ ६७॥ कवित्त॥ तितै आय बर ब्रह्म। अप्प रिषि रिषि सु पुकारं॥ कै तच्छक नृप छतहु। न तरु तच्छक मरै धारं॥ पाठान्तर यह हैं:-अधरत्ती। वारंगन। अंग। ने। काहुं। भागवत्त। जोइ ककचित॥ ६१॥ जदि। न। तदि। न। परिसिक्क। घर। रषि। परीषत। प्रतप्य। प्रपेषि। प्रसत्र। घम। संग। लियै। हियै। वष्प। परिताहि। घटिय॥ ६३॥ ६४ पाठान्तर:-तोटकछंद। क्तिं। पिबुलाइ। त्रितकाल। तत। नून॥ ६५ पाठान्तर:-गुरु। यम्भोयं। सुधनं। मातुल। तारयं। ध्यान। राजं॥ ६६ पाठान्तर:-सु। सकोमल। देहीय। देही। अयंग। किस्ना। दीपायन। चंद्रायना॥ ६७ पाठान्तर:-रषी। वत। जु। उधर्यो। आगत्त। ६८ पाठान्तर:-तंछक। हतहुं। तक्कक। भई। भइय। मान। तों। निधान। धरि। चित। ध्यान।