पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ३१ उभय चित्त चिंतयौ । भय्य श्री नाग सु मानं ॥ नृप न हतो तौ मरन । अचित नृप रिष्य निधानं ॥ दुच्च भंति चित्त चिंता सुचित । धरिय ध्यान चित जान जिय ॥ सत विप्प आइ लिय बोर बर । आय च्छ्य राजन सु दिय ॥ ॥ छं० ॥ १२५ ॥ रू० ॥ ६८ ॥ कवित्त ॥ दिय च्छ्यं सधि कीट । सुफल लेइ राजन धारिय ॥ क्रम खंडन लागंत । निकरि कीटं कित कारिय ॥ छिनक मधि बाढंत । भए पुनि पंचनि नारिय ॥ नृपय हुकम मुष दियौ । करो सो काम कररिय ॥ फिरि आय राय दिष्टह वविय । क्रम्म मद्धि उसनह फनिय ॥ जं जाच जीह कलि हंस छत । भय्य देह ब्रन अप्पनिय ॥ ॥ छं० ॥ १२६ ॥ रू० ॥ ६६ ॥ तव जनमेजय पुत्त । दिसा दच्छिन जन मुकिय ॥ तहां धन अंतर वैद । दरक चढ़ि लैन सु तकिय ॥ करिय षेद चलि अप्प । सत्तस चेला संग धारिय ॥ आस्तीक जु धुर नाग । तव सु तकूक विचारिय ॥ कत्त तक्कि रूप छुकुटी भय्य । गच्छिय गुरु पुठ्ठे उसिय ॥ अप काज सिप्प सिष्पं दइय । विप्र रूप तकूक हँसिय ॥ ॥ छं० ॥ १२७ ॥ रू० ॥ ७० ॥ दूहा ॥ आस्तीक जु गुर बैर कजि । पढि विद्या ग्रह नाग ॥ जनमेजय न्रिप सो मिलिय । मंड्यौ अप्पन जाग ॥ ॥ छं० ॥ १२८ ॥ रू० ॥ ७१ ॥ ६६ पाठान्तरः-भरा । किसी २ पुस्तक में सो शब्द का पाठ नहीं है । आई राइ । दिष्ट । भईय । भईये ॥ ७० पाठान्तरः-दक्षिन । जनमु । किय । धन । अंतरवेद । सुत । किय । तक्षक । छलन । किं । भईय । पुट्ठे । सिष्यं । सिष्यां । दरह । तक्षक । ७१ पाठान्तरः-तिहित । बढ़स । यत । विप्पं । सचारख । रषि । जानिलु । बात । नृहरिय । मल्ल । होम । मंत । तक्षक । पैतो । अनी । मंत्र ॥