पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व कवित्त ॥ ति चित्त वैर सिसु वरन । सपत विप दोख सु चारव ॥ नृप जनमेजय नाम । भयौ तामस उत गारव ॥ तात वैर सिसु दषि । जियन खोइ लोडू विचारै ॥ जातिहु बातन हरिय । सच्छ बंध्यौ जनु जारै ॥ होमंत सक्ति तच्छक सु नग । इन्द्र सरन पत्तौ तबै ॥ सुनि कन्न राज तामस भयौ । करहु मंत साधन सवै ॥ ॥ छं० ॥ १२८ ॥ रु० ॥ ७२ ॥ भुजंगी ॥ करी अस्तुती यं स्वहा इंद्र जोगं । तहां इंद्र आयौ सुरं नाग भोगं ॥ दूतं देव सादेव सारन्न आयौ । तिनं काटि दीयंत खो पाप पायौ ॥ ॥ छं० ॥ १२९ ॥ रु० ॥ ७३ ॥ कवित्त ॥ अभय दान आतुरह । अंन उग्राह पान दत ॥ सरन रषि भय नरन । कढ्ढि मुक चित्त खंडि सत ॥ तय लगि कग्ग कराल । स्वान ससन ऊ वासै ॥ रुधिर चरम अरु असति । वस्न वस्नन ऊ नासै ॥ जो दूय जोइ जग उच्चरै । जननि जाय ग्रब्भह गरै ॥ तिन काज राज प्रारत्थिये । जियत तक्षक तन उब्बरै ॥ ॥ छं० ॥ १३१ ॥ रु० ॥ ७४ ॥ दूहा ॥ नृप चिंता बहु लग्गि मन । ज्यौं जुथ वाय चिकाल ॥ यौं नृप राजत राज कुल । पुनर जनम दुष ज्वाल ॥ ॥ छं० ॥ १३२ ॥ रु० ॥ ७५ ॥ ७२ पाठान्तरः-करि । अस्तुति । स्वाहां । सारन । तिन । सह ॥ इस रूपक के छंद का नाम हम ने शोध करके भुजंगी रक्खा है और सं० १६४७ की तथा सं० १७९० की पुस्तकों में भी यही नाम लिखा है किन्तु इतर पुस्तकों में चंद्रायना नाम लिखा है वह अशुद्ध है ॥ ७४ पाठान्तरः-आतुरहै । अन । कढि । मु । कहित । तुय । ड़ । उं । जोइयै । गभह । कारज । प्रार्थिय । उबरै ॥ ७५ पाठान्तरः-च्रिंत । पुनरजनम ॥