पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
३० पृथ्वीराजरासौ। [ आदि पर्व कित्ति कीर अंग लग्गौ परस। तिहि कारन इह उपजिय॥ आषेट जाय पन्नग मृतक। सिंगी, गर घत्तिय, षिज्ञिय॥ ॥ छं०॥ ११८॥ रू०॥ ६३॥ तोटक॥ इति चोटक छंद सुसंत गुरं। दिन सात पळ्यौ हरि गंग कुरं॥ त्रितकाल विकालह चित्त धरं। क्खित पत्त छिमा पिवु लाइ भरं॥ ॥ छं०॥ १२०॥ नृपराज परीक्षत तत्त गुरं। धरि ध्यान कह्यौ बदळीष धरं॥ जून काल सु तप्पय देव नरं। नृप ग्यान सुन्यौ वपु व्यास वरं॥ ॥ छं०॥ १२१॥ रू०॥ ६४॥ साटक॥ या विद्या बदळीत राजन गुरं। आपो रिषं तारयं॥ पून्यं राज सु इन्द्र धारन घरं। विद्या अमारा पुरं॥ अभ्भोयं सुधनं तु मातुळ इयं, सोहं च.रंत्तारयं॥ स्त्रा ध्यानं रिषिराज राजन वरं। पापापच्चारं परं॥ ॥ छं०॥ १२२॥ रू०॥ ६५॥ चौपाई॥ अति किसलय सुस कोमल अंग। जानु कि सुक्किय देहिय अंग॥ [L17: क्रिष्ण दिपायन दीपन व्यास। कोपिन एकिन मंडल चास॥ ॥ छं०॥ १२३॥ रू०॥ ६६॥ दूहा॥ किसनदीप दीपाय नह। कही रिषी सब बत्त॥ जु कछु सराप सु उद्धस्यो। परनराज गेह गत्त॥ ॥ छं०॥ १२४॥ रू०॥ ६७॥ कवित्त॥ तितै आय बर ब्रह्म। अप्प रिषि रिषि सु पुकारं॥ कै तच्छक नृप छतहु। न तरु तच्छक मरै धारं॥ पाठान्तर यह हैं:-अधरत्ती। वारंगन। अंग। ने। काहुं। भागवत्त। जोइ ककचित॥ ६१॥ जदि। न। तदि। न। परिसिक्क। घर। रषि। परीषत। प्रतप्य। प्रपेषि। प्रसत्र। घम। संग। लियै। हियै। वष्प। परिताहि। घटिय॥ ६३॥ ६४ पाठान्तर:-तोटकछंद। क्तिं। पिबुलाइ। त्रितकाल। तत। नून॥ ६५ पाठान्तर:-गुरु। यम्भोयं। सुधनं। मातुल। तारयं। ध्यान। राजं॥ ६६ पाठान्तर:-सु। सकोमल। देहीय। देही। अयंग। किस्ना। दीपायन। चंद्रायना॥ ६७ पाठान्तर:-रषी। वत। जु। उधर्यो। आगत्त। ६८ पाठान्तर:-तंछक। हतहुं। तक्कक। भई। भइय। मान। तों। निधान। धरि। चित। ध्यान।
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ३१ उभय चित्त चिंतयौ । भय्य श्री नाग सु मानं ॥ नृप न हतो तौ मरन । अचित नृप रिष्य निधानं ॥ दुच्च भंति चित्त चिंता सुचित । धरिय ध्यान चित जान जिय ॥ सत विप्प आइ लिय बोर बर । आय च्छ्य राजन सु दिय ॥ ॥ छं० ॥ १२५ ॥ रू० ॥ ६८ ॥ कवित्त ॥ दिय च्छ्यं सधि कीट । सुफल लेइ राजन धारिय ॥ क्रम खंडन लागंत । निकरि कीटं कित कारिय ॥ छिनक मधि बाढंत । भए पुनि पंचनि नारिय ॥ नृपय हुकम मुष दियौ । करो सो काम कररिय ॥ फिरि आय राय दिष्टह वविय । क्रम्म मद्धि उसनह फनिय ॥ जं जाच जीह कलि हंस छत । भय्य देह ब्रन अप्पनिय ॥ ॥ छं० ॥ १२६ ॥ रू० ॥ ६६ ॥ तव जनमेजय पुत्त । दिसा दच्छिन जन मुकिय ॥ तहां धन अंतर वैद । दरक चढ़ि लैन सु तकिय ॥ करिय षेद चलि अप्प । सत्तस चेला संग धारिय ॥ आस्तीक जु धुर नाग । तव सु तकूक विचारिय ॥ कत्त तक्कि रूप छुकुटी भय्य । गच्छिय गुरु पुठ्ठे उसिय ॥ अप काज सिप्प सिष्पं दइय । विप्र रूप तकूक हँसिय ॥ ॥ छं० ॥ १२७ ॥ रू० ॥ ७० ॥ दूहा ॥ आस्तीक जु गुर बैर कजि । पढि विद्या ग्रह नाग ॥ जनमेजय न्रिप सो मिलिय । मंड्यौ अप्पन जाग ॥ ॥ छं० ॥ १२८ ॥ रू० ॥ ७१ ॥ ६६ पाठान्तरः-भरा । किसी २ पुस्तक में सो शब्द का पाठ नहीं है । आई राइ । दिष्ट । भईय । भईये ॥ ७० पाठान्तरः-दक्षिन । जनमु । किय । धन । अंतरवेद । सुत । किय । तक्षक । छलन । किं । भईय । पुट्ठे । सिष्यं । सिष्यां । दरह । तक्षक । ७१ पाठान्तरः-तिहित । बढ़स । यत । विप्पं । सचारख । रषि । जानिलु । बात । नृहरिय । मल्ल । होम । मंत । तक्षक । पैतो । अनी । मंत्र ॥
३२ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व कवित्त ॥ ति चित्त वैर सिसु वरन । सपत विप दोख सु चारव ॥ नृप जनमेजय नाम । भयौ तामस उत गारव ॥ तात वैर सिसु दषि । जियन खोइ लोडू विचारै ॥ जातिहु बातन हरिय । सच्छ बंध्यौ जनु जारै ॥ होमंत सक्ति तच्छक सु नग । इन्द्र सरन पत्तौ तबै ॥ सुनि कन्न राज तामस भयौ । करहु मंत साधन सवै ॥ ॥ छं० ॥ १२८ ॥ रु० ॥ ७२ ॥ भुजंगी ॥ करी अस्तुती यं स्वहा इंद्र जोगं । तहां इंद्र आयौ सुरं नाग भोगं ॥ दूतं देव सादेव सारन्न आयौ । तिनं काटि दीयंत खो पाप पायौ ॥ ॥ छं० ॥ १२९ ॥ रु० ॥ ७३ ॥ कवित्त ॥ अभय दान आतुरह । अंन उग्राह पान दत ॥ सरन रषि भय नरन । कढ्ढि मुक चित्त खंडि सत ॥ तय लगि कग्ग कराल । स्वान ससन ऊ वासै ॥ रुधिर चरम अरु असति । वस्न वस्नन ऊ नासै ॥ जो दूय जोइ जग उच्चरै । जननि जाय ग्रब्भह गरै ॥ तिन काज राज प्रारत्थिये । जियत तक्षक तन उब्बरै ॥ ॥ छं० ॥ १३१ ॥ रु० ॥ ७४ ॥ दूहा ॥ नृप चिंता बहु लग्गि मन । ज्यौं जुथ वाय चिकाल ॥ यौं नृप राजत राज कुल । पुनर जनम दुष ज्वाल ॥ ॥ छं० ॥ १३२ ॥ रु० ॥ ७५ ॥ ७२ पाठान्तरः-करि । अस्तुति । स्वाहां । सारन । तिन । सह ॥ इस रूपक के छंद का नाम हम ने शोध करके भुजंगी रक्खा है और सं० १६४७ की तथा सं० १७९० की पुस्तकों में भी यही नाम लिखा है किन्तु इतर पुस्तकों में चंद्रायना नाम लिखा है वह अशुद्ध है ॥ ७४ पाठान्तरः-आतुरहै । अन । कढि । मु । कहित । तुय । ड़ । उं । जोइयै । गभह । कारज । प्रार्थिय । उबरै ॥ ७५ पाठान्तरः-च्रिंत । पुनरजनम ॥
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ३३ ॥ वर्तमान आबू पर्वत के उद्धार की कथा ॥
॥ उस तक्षक का आबू पर अपना अर्बुद नाम धर रहना ॥ कवित्त ॥ स तछ आवू प्रमान । मंदीयौ सू अचल कर ॥ गरब गरूर तें विडुरिं । सुडरु रह्यौ जु संत धुर ॥ अचल ईस प्रति ताम । अचल आचित्त अचल घर ॥ देव देव प्रारत्थि । इन्द्र मुक्किय इंडिय धर ॥ अरबुद नाम धर जुत्तिया । दूर तपित थथराइया ॥ कलपान पुहुप अरु वस्त्र गुरु । झांच गुरु गुर झाइया ॥ छं० ॥ १३३ ॥ रु० ॥ ७६ ॥ ॥ गालव ऋषि के शिष्य उत्तङ्ग का उपाख्यान ॥ दूहा ॥ सो आवू उद्धार विधि । कह्यौ कथा * परबंध ॥ ज्यौं अनादित्या रिष्य मुख । सुनी सु गुर समबंध ॥ छं० ॥ १३४ ॥ रु० ॥ ७७ ॥ गुरु गालव उत्तंग सिष । बहु विद्या पढ़ि जाम ॥ पय लग्गौ गुर राज कें । कहौ दक्कुना काम ॥ छं० ॥ १३५ ॥ रु० ॥ ७८ ॥ वाघा ॥ गालव रिषि सिष्य उतंग । दिय विद्या बुध क्रम क्रम अंग ॥ गुर दषिन कज्जैं गुर जच्चै । गुर पतनी तब मंगि विरच्चै ॥ १३६ ॥ कुंडल जच्चि षिचिया कानं । अप्यौ जासु दषिना दानं ॥ दिवस अठमी व्रत अपंडै । चरचौं दान विप्र श्रुत मंडै ॥ १३७ ॥ ७६ पाठान्तर :- सो । तक्षक । आ । चित । बर । मुकिय । रूडीय । जुतिय । तप्यित । छाईया ॥ स = वह का वाचक और तछ = सर्प = तक्षक का वाचक जैसे रु० ५१ की ८ तुक में तच्छ प्रयोग हुआ है ॥ ७७ पाठान्तर :- रिष्य ॥ ७८ उतंग । जास । कै । दछना ॥ ७६ पाठान्तर :- उत्संग । दखिन । गुरपतनी । मंगि । दत्तिना । अपंडे । मंडे । करे । संपनी । न्रिप । प्रस॑से । संसष्ये । तव्यक । बीच । रपै । अंचल । इपै । इपे । ठठौ । ताम विराम ।
- हमारे पाठकों को ध्यान में रखना चाहिये कि चंद अर्बुद के उद्धार की कथा अर्बुद खण्ड अर्थात् आबू महात्म्य नामक संस्कृत ग्रंथों से संग्रह करके वर्णन करता है । जिन पाठकों के पढ़ने में अथवा सुनने में यह ग्रंथ आये हैं वे जान सक्ते हैं कि कवि ने थोड़े में बहुत ही आशय लिया है और उत्तङ्ग का उपाख्यान महाभारत के आदि पर्व के पौष्यपर्वाध्याय नामक द्वितीय अध्याय में से भी कवि ने संग्रहीत किया है ॥ ३
३४ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व चल्यौ रिषि चमंके ताम । गुर गुरनी कों करै प्रनाम ॥ चिंतत इष्ट चल्यौ वर राहं । संपत्तौ यौँ सद नृप ठाहं ॥ १४८ ॥ जच्चै कुंडल बिखिय पासं । खोइ समर्पै विधि बर तासं ॥ विप्र प्रसंसै समपे कुंडल । कढि डर तच्छक बीच नीच छल ॥ १४९ ॥ लै कुंडल चल्यौ हरषे मन । आय्यौ राज विप्र अन्यो अन ॥ क्रम्यौ विप्र राह चंचल चर । छलि तच्छक लीनें कुंडल वर ॥ १५० ॥ क्रमयौ विप्र पुठि अति चंचल । धरि अहि रूप सु गयौ रसातज ॥ विख दूखै ठट्ठौ रिषि तामं । दुमत चित्त भय विघ्न विरामं ॥ १५१ ॥ अस्तुति इन्द्र करन लग्यौ रिषि । नंब्बौ बासव खिनक वज्र सिष ॥ त्रित अखित दीयौ आखंडल । धर रिषि तक्खि घात विख मंडल ॥ १५२ ॥ पैठा विप्र नागपुर ठासं । धोम प्रगहै मंच विरामं ॥ दूख्यौ पुरष एक षट आरं । फेरे चक्र तास फिरि तारं ॥ १५३ ॥ दूख्यौ बाह्र बाह्र सत वारं । उंच तेज आजेज अपारं ॥ यौँ नर नारि अश्व वर नामं । वे अह्र हय्य बेई सम कामं ॥ १५४ ॥ चिसत सठि तां तंति ठार्यं । अद्ध खेत स्यामं अध तार्यं ॥ अहि धुत्तेन उपाडू सबाहं । फुंकत पुंकू सधुम्स सराहं ॥ १५५ ॥ पुंकत पुंख धार धुस चली । लग्गै नाग अंग सह थल्ली ॥ प्रगटे अंसू पलक्क उघ धत्ति । अंप्यो कुंडल नाग मान छति ॥ १५६ ॥ ग्हि कुंडल अप्ये गुर वालं । गुर विद्यां अप्पी अभिरामं ॥ दुज वर वज्र पैठ जेहा धर । बिख अखित तिव थान मंडि थिर ॥ छं० ॥ १५७ ॥ रु० ॥ ७९ ॥ दूहा ॥ बिख अथाह तिवि थान भय । बहुत संवच्छर वित्त ॥ पृथुल कराल कराल भौ । जिम जिम काल बितित्त ॥ छं० ॥ १५८ ॥ रु० ॥ ८० ॥ वर्ज । आक्षत । दियौ । रिखि । पैठो । बैठो । धोमं । ठाम । बिराम । फेरै । वाह्र । जो । तामं । बे । हथ । वे । ईस । मकामं । बेइम । सठि । ता । तँति । ठार्य । उपाय । स्याम । धुत्तेन । फूंकत । सधुम । धूम । लगे । थली । अंशू । कुंड । आप्यो । हित्ति । मनि । यही । रामं । पेठि । आक्षेत । आक्षित । ८० पाठान्तर :- वित । प्रियमुल । प्रभार । विवित ॥
३६ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व हल्ली खेत अच्छी जलही समूहं । अचै शेष षीरं सु सानौ ससुहं ॥ धराचल्लि भागीरथी विम्ब आगं । मिटै अघघ ओघं तनं दुष्ष दागं ॥ १५७ ॥ सुभं उच्च चंदोल बीचं विराजं । मनो खुग्ग आरोह सोपान साजं ॥ नरं नीच नीरं तटं श्रोन प्रस्सं । तवै अग्ग देवं गुनं अब्ब अस्सं ॥ १५८ ॥ परै मख्खू कच्छेवरं धंषि कुद्दी । भजी कावखं गिड्ड गोमाय लुद्दी ॥ तटं श्रोन अच्छी थलं वारि छल्ल । घिनं मक्सिरू चंदोल बीचं वचल्लै ॥ १५९ ॥ तिनं खातसं देह आनूप धारै । वरं उर्वसी चामरं बिक्खू नारै ॥ धरै ध्यान भावं तिनं दुक्ख दब्बै । मिटै मज्जनं अघ्घ साजंम सब्बै ॥ १६० ॥ अलंकृत गंगा तनं तेज खोवै । मनौ दाचनं दाच दाहंन जो वै ॥ सुयं गंग गंगे सु गंगा प्रकारं । धरै नाम गंगा जमं किं करारं ॥ १६१ ॥ त्रिपथ्थी त्रिगामी विराजंत गंगा । मचा स्वग्ग लोकं नरं नारि चंगा ॥ रहहं घरी ज्यौं फिरै तीन लोकं । मचा दिव्य धुन्वी नवं निगम लोकं ॥ १६२ ॥ कलाखी सुचीरं गुफा फारि नागं । प्रगट्टीय मातंगि मानुष्य आगं ॥ रची नष्य अच्छी सुयं ताप अंजै । मचा वहराजं दिवं दुर्ग रंजै ॥ १६३ ॥ अचयं भीषमं मात बहु पाप षंडै । जमं ज्वाल ज्वालं तसं तेज चंडै ॥ रहं रोच रंगी घरं सीस गंगे । मचा मोचनी सात दुग्गा उतंगे ॥ १६४ ॥ बरं काख काखा जलं खेत रूपं । तहां उपनी मात आंबंग नूपं ॥ अई गाम सहं सु सामुह जेतं । डह्यौ नाम गंगा उतंगा विचेतं ॥ १६५ ॥ घरद्वार दारं कला तूं प्रगट्टी । करी मुक्ति मग्गं मचा पाप मही ॥ तिनं नाम खोनै कियं तोय पीजै । कियं संम्रनं देव संज्यान कीजै ॥ १६६ ॥ कियौ गच्चि तें पंथ उग्गाच्चि साजं । तुंही तापिनी तेज तूं तेज राजं ॥ तुंही मध्य वारानसी खोच्छ दैनी । कही काल दुष्यं कटनं क्रपैनी ॥ छं० ॥ १६७ ॥ रू० ॥ ८३ ॥ दूहा ॥ जब लगि रज तन मात की । रहै अंग सो बांइ ॥ तब लगि काल न संपजै । क्रम पाप सब जाइ ॥ छं० ॥ १६८ ॥ रू० ॥ ८४ ॥ मंजने हल्लै । अपसा । जम । दाहं । दाहनं । जोहै । त्रिपंथी । नाग । घटा ताम । मंगा । महादिव्य । नवं । निगम । महावट्टराजं । पदिव दुर्ग । भीषम । जालं । महामोहनी । अनूपं । ध्यै। समरनं संभ्यान । मोच्छ । मोक्ष । दुष्च ॥ ८४ पाठान्तर :—सोलाइ ।
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ३७ गाथा ॥ क्रमं अघं सब भंजै । दिव्यं करै देह सा रूपं ॥ सुरगं करै सु गामी । अह्रं नाम रसन उच्चारं ॥ कृं० ॥ १६९ ॥ रू० ॥ ८५ ॥ ॥ मंदाकिनी गंगा का उभरना और गौ का तिरकर निकलना ॥ दूहा ॥ सुनि गंगा सुवयन रिषि । उभरी आय प्रमान ॥ ताहि तिरंतह नंदिनी । आई तट बिल थान ॥ कृं० ॥ १७० ॥ रू० ॥ ८६ ॥ रिषि सिष्य धाये सु सब । धर कड्डी तँह गाव ॥ सो कड्हिवि मंदाकिनी । गइ पयाल फिरि ठाव ॥ कृं० ॥ १७१ ॥ रू० ॥ ८७ ॥ बिल अथाह दिष्यौ सु रिष । चित चिंता परपत्त ॥ को निकसै या माधिगत । गत भयानक घत्त ॥ कृं० ॥ १७२ ॥ रू० ॥ ८८ ॥ ॥ वशिष्ट ऋषि का उस अथाह बिल बूरने को हिमालय के पास एक पुत्र मांगने जाना ॥ विछप्परी ॥ चिंते रिषि देखि बिल दुक्खित । उर लग्गी अति चिंत मम्झिझ चित ॥ पूछवि रिषि सिष्य कत कामं । सुहै न कोइ बुद्धि बल तामं ॥ १७३ ॥ चिंतै ध्यान अप्प रिषि राजं । याहि सपूरन को थिर काजं ॥ चिंतत रिषि ध्यान उर भासं । है सत पुत्त हेम गिरि जासं ॥ १७४ ॥ एक पुत्त जाचौं तिन पासं । विन्न पूरे पूरै उर आसं ॥ क्रम्यौ राज रिषी दिसि उत्तर । देषी मन आनंद दिव्य धर ॥ १७५ ॥ गौ रिषि राज पास गिर राजं । इष्ष अग्ग पति आसन साजं ॥ मैना सहित आय पग लग्गे । अरघ पाद करि अचवन लग्गे ॥ कृं० ॥ १७६ ॥ रू० ॥ ८९ ॥ ८५ पाठान्तरः-क्रम । सारूपं । सुंगामी ॥ ८६-८८ पाठान्तरः-सुनयन । तिरेत ॥ ८६ ॥ धाए । कढी । तहां । कढवि । गई । ठांव ॥ ८७ ॥ परप्रत । मधि । घत ॥ ८८ ॥ ८९ पाठान्तरः-चिंते । दुक्रत । कोई । संपूरन । नासं । हेमगिरि । पुत्र एक । पू । पूरं । रिषि । उत्तर । मान । रिषिराज । गिरि राजं । दूष्ये । मेना । पय । लागे ॥
३८ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व दूहा ॥ सुनि सुवचन गिरि राज कौ । कहि रिषि कारन बात ॥ पुत्त एक जच्चूं तुमहि । गरित सपूरन गात ॥ छं० ॥ १७७ ॥ रू० ॥ ९० ॥ ॥ हिमालय का अपने सब पुत्रों को ऋषि का अभिप्राय कहना ॥ कवित्त ॥ तब सुचिंत गिर ईस । पुत्त सबे निज स्रव्वं ॥ कहि कारन षिति षात । अप्य रष्यौ कुल अव्वं ॥ इत्त सु रिषि सुत ब्रह्म । नाम वाचिष्ट महा मंति ॥ धर्म्म पार तप पार । पार श्रुत कर्म परम गति ॥ जच्चे सु षोइ तुम एक कहुँ । चिंतिय चत कारज्ज रिषि ॥ संब षो वास बिल उद्धरै । पद पामौ परमुच अषि ॥ छं० ॥ १७८ ॥ रू० ॥ ९१ ॥ ॥ हिमालय के बड़े पुत्र का उत्तर देना कि वह भूमि निषिद्ध है ॥ कवित्त ॥ तब अष्पहि अग्र पुत्त । सुनहु गिरि राज चिंत चित ॥ पिता बाच रिष काज । कोइ खंडहि सुक्रम्स चित ॥ उह सु भूमि निषेध । थान जानहु तुम सब्बं ॥ अंग क्रंम अरु देव । षेव जाजन नहि अव्वं ॥ कुच्छित्त देस कारन विक्रम । तहँ सु केम किज्जै गमन ॥ अप्पियै प्रान मंग्गै जो रिषि । पै दुष्ट थान थप्पहिँ न तन ॥ छं० ॥ १७९ ॥ रू० ॥ ९२ ॥ ॥ वशिष्ठ का प्रत्युत्तर दे कहना कि वह भूमि बड़ी रम्य है ॥ कवित्त ॥ तब जंपे सुत ब्रह्म । सुनौ गिरि राज पुत्त सम ॥ इहि सु भौमि बिल थान । रम्य मंडहि सु तप्प दम ॥ ९०. पाठान्तर :-गिरिराज । संपूरन ॥ ९१ पाठान्तर :-ईसं । रख्यौ । महामति । परमगति । कहुं । संव । संवसौ । परमुच ॥ ९२ पाठान्तर :-गिरिराज । सुक्रम । रुव्व । अव्व । तहां । कहहां । पै ॥ ९३ पाठान्तर :-जंपै । सुन्न । गिरिराज । तिथ । गंधर्व । मूर्त्तिमान । सज्जै । तिसर । धात्र । महि ।
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ३६ सर्वै देव इच्छि वास । तिव्य लब्धै रिषि स्वव्वं ॥ विप्र ब्रज वर वच्छि । सु गुन गंध्रव सव कव्त्रं ॥ किन्नरच्च क्रम सुत धर्म धर । सुरति मान सज्जैति सिर ॥ हरि ब्रह्म ईस संवास सच । जो आक्रम चि इक्क गिर ॥ छं० ॥ १८० ॥ रू० ॥ ८३ ॥ ॥ और वहां आगे वाल्मीक ऋषित्व को प्राप्त हुवे हैं ॥ पद्धरी ॥ रमनीक ठाम वाचिष्ट राज । तहां वसहि देव देवच्च विराज ॥ इच्छि थान पुव्व क्रत युग प्रमान । रिषि कियो तप्प जर्जित विधान ॥ १८१ ॥ वाल्मीक वीर इक्क वधिक रूप । अति पाप क्रंम आघात कूप ॥ भंजै सु मग्ग तिन भ्रम्म थान । पायौ सु हरिय दरसन विधान ॥ १८२ ॥ चित संप चक्र गद्द पदम वाहु । तन स्याम सुभित पीतच्च प्रबाहु ॥ दिप्प्यौ सु लछी तन रूप सील । कीनी बह तन तिन निसप ढील ॥ १८३ ॥ आयौ सु दिट्ठ गोविन्द वीर । जानी न पुव्व भ्रम्मह सरीर ॥ द्विति दिप्पि दिट्ठ कामच्च कद्दूर । विंक्यो सु पाप मध्यां सम्मूर ॥ १८४ ॥ तव आय रिप्प उपदेस दीन । किचि काज इच्छां यह क्रंम कीन ॥ अग्नी रु बंध तिय मात पुत्त । वंटहि कि पाप पापच्च सजुत्त ॥ १८५ ॥ तिच्छि जाइ कह्यौ वर भीन्न मान । वंक्यौ न पाप किन अंग थान ॥ लग्ग्यौ चरन्न कर धनुष तोरि । आघात घात बानी सजोरि ॥ १८६ ॥ व्याघात नाम सो वधिक थान । भ्रम भ्रग्यौ इक्क वहूक्रच्छ निधान * ॥ छं० ॥ १८७ ॥ रू० ॥ ८४ ॥ गाथा ॥ यों कत्थियं रिषि राजं । तुम कोइ दिवस भ्रमन करि अध्यं ॥ फुनि हम दरसन प्रापं । सध्यं गुर मंच दे कानं ॥ छं० ॥ १८८ ॥ रू० ॥ ८५ ॥ ८४ पाठान्तर :- जु । धर्म । दर्शन । लछि । वीर । धर्मह । धरमह । विंक्यौ । मथांस । भूर । रिपि । दृट्ठां । रह्वां । क्रम । त्रिय । पुत । संजुत । चरन । तोरी । भ्रग्यो । इक । वृक्ष ।
- यह पंक्ति कर्नल टोड साहब वाली पुस्तक में नहीं है ॥ ८५ पाठान्तर :- कोई । प्रमं । ससथ्य । मरा । मरा । गहिय । भट्टै । अब । अबयो ॥
४० पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
सरां सरां यह कहियं । गच्छियं भगताय अंगयं नेहं ॥ भिद्दे तु चक्रम मंटी । दृही निय अब यो देहं ॥ छं० ॥ १८८ ॥ रू० ॥ ८६ ॥ दूहा ॥ बांबी फिर अंगच बली । अंग उदैट्टी जाम ॥ क्षीन सबद मुख निक्कसे । धीर धीर कै राम ॥ छं० ॥ १८० ॥ रू० ॥ ८७ ॥ तब धरि सधि कयौ सु रिषि । दिषि प्रबत्न तप पार ॥ बाल्मीक रिषि सो भयौ । सुनि गिरि सुअन विचार ॥ छं० ॥ १८१ ॥ रू० ॥ ८८ ॥ ॥ हिमालय के मध्यम पुत्र नंद का वशिष्ट के साथ आना स्वीकार करना ॥ कवित्त ॥ सुनि सु बचन सिरि सुअन । सर्व विधि राम वाच रचि ॥ मध्य पुत्र गिरि नंद । सोय उच्चरयौ वाच सचि ॥ हौं सु पंग बिन पाय । क्रंम्मि सक्यों न राह दुर ॥ जाय परौं षित घात । करौं उद्दार वाच धुर ॥ पित बाच राम सज्ज्र्यौ सु बन । बाच सु हरिचंद अव्व वहि ॥ सोइ बाच तात ऋत कज्ज रिषि । कोइ सचुक्कहि मुंष मचि ॥ छं० ॥ १८२ ॥ रू० ॥ ८८ ॥ ॥ वशिष्ट का अर्बुद नाग को कहना कि जो तू नंद गिरि को उठा ले चले तौ हमारा कार्य सिद्ध हो ॥ पहरी ॥ अर्बुदा अचल अर्बुदति नाम । क्रित काम पयच षोरौ सु कांम ॥ धर नंद नंद नंदन प्रमान । उच्चार सार लै जाहु थान ॥ १८४ ॥ ८६ पाठान्तर :- बांकी । निक्कसै । कौं ॥ ८७ पाठान्तर :- दिषि । रिष ॥ ८८ पाठान्तर :- गिगिर । सोइ । हों । उच्चर्यौ । पाद । क्रमि । झंमि । सकों । सक्कौं सक्कै । परों । करों । कोई । चुक्कहि । मुष ॥ इस रूपक की पांचवीं तुक के वाच और सज्ज्र्यौ शब्दों के बीच में राम शब्द किसी २ पुस्तक में लेखक ने लिखना छोड़ दिया है । तथा इसी तुक के दूसरे पाद का पाठ हमारे पाठ के सिवाय किसी २ पुस्तक में "पिता वाच सिर अंबु वहि" करके भी है ॥ १०० पाठान्तर :- इस की पहिली तुक के पहिले पाद का पाठ हमने सं० १६४७ की
४२ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व प्रविस कियो गारत्त गिरि । जय जय वचन सरीर हुअ ॥ भै मग मगन सुतन सब्वे सु गिरि । उवरन्नौ नाक सुनाग धुन्न ॥ छं० ॥ १८८ ॥ रु० ॥ १०२ ॥ ॥ बिल का पुर जाना और पुष्प वृष्टि सहित जैजैकार होना ॥ दूहा ॥ उबरन्नौ नाक सु नाग धुन्न । दिव अस्तुति परमान ॥ पुष्प वृष्टि इच्छां करिय । जय जय बंधौ तान ॥ छं० ॥ १८९ ॥ रु० ॥ १०३ ॥ ॥ नग का हिलना ॥ दूहा ॥ गात सकल गिरि जात को । सब बूड्यौ सम नाग ॥ उबरि नास सैलह तहां । सो हलची बिन लाग ॥ छं० ॥ २०० ॥ रु० ॥ १०४ ॥ ॥ नग के हिलने से वशिष्ट चिंता कर ईश आराधन करने लगे ॥ दूहा ॥ नास सुद्दल हल्ल्यौ सुनग । उर अति चिंता जग्ग ॥ अति आतुर वाचिष्ट रिषि । ईस अराधन लग्ग ॥ छं० ॥ २०१ ॥ रु० ॥ १०५ ॥ ॥ वाचिष्ट ऋषि ने महादेव का यह आराधन किया ॥ खाटक ॥ ईसंजा गिरिजानने वगरयं । उच्छंग मातंगिनी ॥ चर्मेजा वड्जामवंत जलजं । बुंदं तयं उज्जलं ॥ रख्यं जारति कर्न कामति मलं । दल्यंति तीयं पुरं ॥ त्रिपुरारिं तन तुंग तारन गुरं । जैजै हरं ईसयं ॥ छं० ॥ २०२ ॥ रु० ॥ १०६ ॥ उच्चरि । अगै । पच्छ । संपन । तथ ॥ इस की अंत की तुक का पाठ किसी २ पुस्तक में “भू मग सुतन सबै सुगिरि । उवस्यौ नाक सु नाक धुन्न” है ॥ १०३ पाठान्तरः-उबयौ । नाक । हयां ॥ १०४ पाठान्तरः-यह रूपक सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है और जब तक कि वह इस से भी प्राचीन पुस्तक में नहीं मिले तब तक उस को क्षेपक नहीं कह सक्ते । सोह । लह्यो । बुड्यौ ॥ १०५ पाठान्तरः-नाग । वाशिष्ट । आराधन । लग ॥ १०६ पाठान्तरः-उद्धंग । छलजं । जलदं । रिपं । करन । दलंयंति ॥
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । ४३ भुजंगी ॥ नमो आदि नाथं स्वयंभू सनाथं । नहीं मात तातं न को मंगि वातं ॥ जटा जूटयं सेषरं चंद्र भालं । उरं चार उद्दारयं रुंड मालं ॥ २०३ ॥ अनीलं असन्नं उपब्बीत राजं । कलं काल कूटं करं सूझ साजं ॥ वरं चंग ओधूत विंभूत ओपं । प्रलै कोटि उग्रंसि कालं अनोपं ॥ २०४ ॥ करी चर्म कंधं हरी पारिधानं । वृषं वाहनं वास कैलास थानं ॥ उमा अंग वामं सु कामं पुरष्यं । सिरं गंग नेचं त्रयं पंच मुष्यं ॥ २०५ ॥ नमः संभवायं सरव्वाय पायं । नमो रुद्रयायं वरहाय सायं ॥ पसूपत्तए नित्तए मुग्गयाए । कपहीं मछादेव भीमं भवाए ॥ २०६ ॥ मषघ्नाय ईसानए चंबकाए । नमो धम्मए धातए अद्धकाए ॥ कुमारो गुरव्वे नमो नील ग्रीवे । नमो व्याधए बाघए हिच्छ जीवे ॥ २०७ ॥ नमो लोहिते नील सिष्षंडए तं । नमो शूलिने चक्षुषे दिव्यए तं ॥ बसूरेतवे संव्वदेवस्तुतेवं । नमो पिंग जाटिष्टाए देव देवं ॥ २०८ ॥ नमो तप्प मानाय ब्रषं धुजाए । नमो ब्रह्मचारी त्रयंब्रह्मकाए ॥ सिवं चातमे चातगे स्वर्गचाए । नमो विश्वमावित्तए विश्वराए ॥ २०९ ॥ नमस्ते नमस्ते नमो सीतताए । नमो सर्ववन्नायने संकराए ॥ नमो ब्रह्मवक्ताय भूत पिताए । नमो वाचपे विश्वपे भूतपाए ॥ २१० ॥ नमो सीससाहस्रए नीतएसं । सहस्रंभुजा नैन साहस्त्र तेसं ॥ नमो पादसाहस्र आसंखकनं । नमो वन्हि चीरन्य हीरन्यवर्ने ॥ २११ ॥ नमो भक्ति आकंपनं संभु देवं । थिरं रिद्धि दाता मनं वच सेवं ॥ प्रसनो भवो ईस तब्बे न कब्बै । तनं ताप विन्नासए चित्त तब्बे ॥ छं० ॥ २१२ ॥ रु० ॥ १०७ ॥ १०७ पाठान्तर :- स्वंभू । समार्थं । नही । मंगी । चंदभालं । उर । रुंडमालं । असनं । उपंवीत । कलंकालकूटं । विभूत । सिकाले । अलोपं । करि । बंधं वृपवाहनं । वासं । थानं । दामं । कुरष्यं । गंगा । नैनं । उद्रप्रायं । सरवाय । वरदाय । पशू । पत्त । ए । नित । ए । मुग्ग । जाए । कपट्टरी । कर्पट्टरी । मषंघ्नाय । इसं । नए । धम्म । ए । धात । ए । गुव्वं । नल । व्याध । ए । बाघ । ए । ट्ठिच्छ । सिषंड । एतं । दिव्य । एतं । वसूदेवते के श्वदेवनं । स्तुतेवं । ब्रषंध । जाये । त्रयब्रह्म । काए । खर्श । चाये । विश्वमा । वित्तए । नमस । ते । नमस । ते । सीत । ताए । साहस । एनीत । एसं । सहस्र । नैन । सहस्र । आसंप । कर्ने । हिरन्य । संभा विनास । ए । चित्त ॥ सं० १६४७ की पुस्तक में इस छंद की ८ वीं तुक में को निस्सए शब्द नहीं है ॥
४४ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व ॥ वशिष्ठ के वचन सुन महादेव का प्रत्यक्ष हो वर मांगने को कहना ॥ चौपाई ॥ सुनि मुनि बचन ओद मन ईसं । आय धरौ रह्यौ उद्दरि सीसं ॥ बर ! बर ! वानि जानि मंन अंग्गहु । जंपद्धि ईस आस जिहि जग्गहु ॥ छं० ॥ २१३ ॥ रू० १०८ ॥ मंगहु मुनि सज्जन गुन गुन बर । चलै कित्ति जित्ती जिहि धुर घर ॥ ता कित्ती मुकतीह खों खिज्जै । ब्रह्मासन आसन डोखिज्जै ॥ छं० ॥ २१४ ॥ रू० ॥ १०९ ॥ ॥ ईस का स्वरूप देख ऋषि का मुदित होना ॥ चौपाई. ॥ देषि सरूप ईस मन उम्मदि । जै जै जीव धन्य वानी बदि ॥ गौर कपूर तेज तन उद्दित । रिषि रोमांचित तब मन मुदित ॥ छं० ॥ २१५ ॥ रू० ॥ ११० ॥ मुदित मन उद्दित तन भारी । धरि बैकुंठ ईस मनचारी ॥ अर्बुद गिरि धरि ध्यान सु ईसं । करै काल तिहि काल जगीसं ॥ छं० ॥ २१६ ॥ रू० ॥ १११ ॥ ॥ वशिष्ठ ऋषि का महादेव को नमस्कार करना ॥ साटक ॥ त्रैनैनं चिजटेव सीस चितयं । चैरूप चोसूलयं ॥ चदेवं चिःदसा चिभू चिगुनयं । चीसंधि वेदत्रयं ॥ चैरग्निं चयलच्छि काल चितयं । ग्रामं चयं चैवयं ॥ गंगा चै त्रिपुरारि भासित तनुं । सोयं नमः संभवे ॥ छं० ॥ २१७ ॥ रू० ॥ ११२ ॥ १०८-१०९ पाठान्तरः-मंगहुं । जगहुं ॥ चलै और कित्ति शब्दो के बीच में "ई" शब्द का पाठ सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है और इधर के समय की लिखित पुस्तकों में है । धुर धुर । कीती । मुक्तीह ॥ ११०-१११ पाठान्तरः- उमदि । गौरक । पूर ॥ ११२ पांठान्तरः-निजटेवसीस । त्रयलच्छिकालं । त्रितयंयाम ॥
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ४५ ॥ प्रमथाधिपति ने आनन्दित होकर वर मांगने को कहा ॥ दूहा ॥ आनंद्यो प्रमथाधिपति । वर ! वर ! बंद्यौ बानि ॥ रिषि संगहु उतकंठ मन । सोइ समप्यौँ आनि ॥ छं० ॥ २१८ ॥ रू० ॥ ११३ ॥ ॥ वशिष्ट ऋषि का नंदगिरि को अचल करने का वर मांगना ॥ दूहा ॥ फिरि रिषि जंप्यौ संभु सों । जो तुट्ठो मुझ भास ॥ नग चलंतौ अचल करि । पुनि सज्जौ सिर वास ॥ छं० ॥ २१९ ॥ रू० ॥ ११४ ॥ सो आबू गिरि राज गुरु । सुर गिर सम सैलास ॥ त्रिपथ नाम मुनि देव का । वसि रु कियो कैलास ॥ छं० ॥ २२० ॥ रू० ॥ ११५ ॥ ॥ महादेव का पर्वत को अचल कर उसमें अचल नाम से विराजना ॥ कवित्त ॥ तब सु ईस मन मुदित । पानि चंप्यौ गिर गौरव ॥ अचल अचल्ल कहि अचल्ल । भयौ अचलेस नाम तब ॥ सुथिर भयौ नग नंदि । अप्प सिर वास सु सज्यौ ॥ उभय आय तिहि थान । सगन प्रमथाधिप रज्यौ ॥ गिरि नंद नाम हेमल्ल सुतन । अर्बुद नाग सु मिच मन ॥ तिहि नाम त्रिविध भय तिध्य हर । पारस अप्पन अर्थ तन ॥ छं० ॥ २२१ ॥ रू० ॥ ११६ ॥ कवित्त ॥ अचल नाम कहि अचल । अचल विद्या अभ्यासिय ॥ अर्बुद गिरि थिर धरम्यौ । बियौ बानारस बासिय ॥ वष्टित नाम इक वरष । मुक्ति खंभेति जगत गुर ॥ इच्छत नाम इक दीह । करै उपवास सोइ नर ॥ ११३-११५ पाठान्तरः-प्रथमाधिपति । बानी । समप्योँ ॥ ११३ ॥ मोँ । तुठो । भग्न पास ॥ ११४ ॥ गुरुं । सं० १६४७ की में "मुदगिर सम सैलास" और सं० १७१० की में "सुर गिर सम सैलास" और सं० १८५६ में "मेरु समल सैलास" पाठ हैं ॥ त्रिपथा । ताप । सुनि वसि । रुकियौ ॥ ११५ ॥ ११६ पाठान्तरः-अच । प्रथमाधिपं । रंज्यो । नम । तिद्य । अथि ॥
बाना रभंति बारानसिय । आबू अर्बुद उद्दरिय ॥ जट विकट जाल विब्भूति रँग । सुरग मुकति ढिग ढिग फिरिय ॥ छं० ॥ २२२ ॥ रू० ॥ ११० ॥ ॥ आबू को अचल देख कर वशिष्ट का प्रसन्न होना और अन्य ऋषियों को वहां यज्ञ के लिये बुलाय जप तप और वास करना ॥ पद्धरी ॥ अग अचल दिषि वाशिष्ट रिष । मन मुदित भयौ सम आय सिष ॥ छर वासदेव सब गुन समान । आबरन रिद्धि चित चिंतं थान ॥ २२३ ॥ आभासि सिष गौतमह तथ्य । आचर्यौ वास अनि रिष सथ्य ॥ आभासि रिष अनेक ताम । संबोधि बोलि पृथु पृथुक नाम ॥ २२४ ॥ देवलह असित अंबावि सूत्र । सौमिच सर्प्प माली विभूत्र ॥ मह मक्षन सनक जैनेय पैल । दाखभ्य वक्र सुमंत औल ॥ २२५ ॥ दीपाय कित शूलंसि राय । तैतरिय जश्ववक्री सुताय ॥ जैमनिय ध्रुव्व वैसंपयान । घर्षनह लोम असुहोच जान ॥ २२६ ॥ मंडव्य अरति कौसिक्कं दाम । उष्णीष चिवन पर्नाद वाम ॥ घटजात सुबल मोजायनेय । बकवाक परासर वायवेय ॥ २२७ ॥ सचिवाक जात क्रन क्रन्न माख । सनिवाक क्रिताश्रम सुचि पाख ॥ सिषि वांसु पर्षत पारिजात । अगस्ति मारकंडे सुभाति ॥ २२८ ॥ पाविच पानि सर्वेन्य रम्य । किरनाषकेत अगु सेष सभ्य ॥ जंघावं भालकी कोप वेग । गालम हरीय ब्रह्म अगेग ॥ २२९ ॥ कौडिन्न बंध माखी सनक्कु । सानंद सनातन कत्त वक्कु ॥ सांडिल्ल करक वाराह पंग । कौमार अश्व हय घोष मंग ॥ २३० ॥ वेनीय जघन जघ नासकेत । कन्हं कलाप वकीव सेत ॥ अष्टाचवक्र उद्दालकेय । च्यवनह कपिल मातंग जेय ॥ २३१ ॥ ११० धयौ । बीयो । लभ्यौ । तिजगत । वानार । भंति । वानारसीय । उद्धरीय । मुति ॥ ११८ पाठान्तरः-दिषि । वाशिष्ट । सिष । आचर्य्यौ । प्रिथक । अंकवा । विसूत्र । सप्प । ध्रुव । हरष । नह । मंडप । कौसिक । उष्णीक । पनदिवाम । घट । जात । बाल । वाक । बालजाक । वाय । वेय । सचि वाक । क्रच । क्रनमाल । सनि । वाक । क्रिताश्री । सिषि । वांस । पर्वत । भाल । की । गालं । महि । रिय । कौंडिन । सांडिलं । वेनी । जय । घन । घना । सकेत । कन्ह । वसेत अष्टाह ।
४८ पृथ्वीराजरासो। [ आदि पर्व ॥ यज्ञ का अनुष्ठान सुन कर राक्षसों का एकत्र हो आना ॥ दूहा ॥ जंचकेत दानव दुसह । अरु रषस धुमकेत । अप्प सथ्य लीने सकल । आए दुष्टह छेत ॥ ॥ छं० ॥ २४३ ॥ रु० ॥ १२१ ॥ ॥ ऋषियों का अनलकुंड रचन कर ब्रह्म कर्म प्रारंभ करना ॥ कवित्त ॥ आबू करि रिषि जग्ग। मंच कारन सु मंच जपु ॥ पंड हत्थ नर उंड। अष्ट अंगुल ऊर्द्ध वपु ॥ इय्य तीन अरु अट्ट । मंडि चक्कून समा सम ॥ खप्प समति सम फियौ। फनति बच्यौ देव क्रम ॥ अगिनेव थान अगिनेव धर। बाय कुंड दच्छिन दिसा ॥ नैरत निवर्त धज मंडि कै। ब्रह्म क्रम्म खग्गे रिसा ॥ ॥ छं० ॥ २४४ ॥ रु० ॥ १२२ ॥ ॥ दैत्यों का ऋषियों के यज्ञ में विघ्न करना ॥ कवित्त ॥ पंच पर्व्व जग्योपवीत । पंच पर्व्वी अधिकारिय ॥ देवो मुनि दुजराज । वैश्य शूद्रह चितकारिय ॥ चर विडाख पशु म्लेच्छ । क्रम चंडाल पंड करि ॥ इह प्रमान दस (विधि*) सुक्रम । जग्ग मंडे सुमंडि हरि ॥ दानव सु दुष्ट दुष्टंसु क्रम । दुष्ट मूच वरिषा करै ॥ पसु मंस रुधिर नंषै सु जल । क्रम विप्र संसुह डरै ॥ छं० ॥ २४५ ॥ रु० ॥ १२३ ॥ वै वेदी वै विप्र। गीत गांयच मंच जप ॥ ता मंझो घन विघ्न । करै आरिष्ट असुर कुप ॥ १२१ पाठान्तर :-यंत्रकेत । राषेस । धुम्रकेत । अप । सथ । अहेत ॥ १२२ पाठान्तर :-आब्बु । रिष्षि । तप । हथ । वर । उरद्ध । वप । अट्ठं । संमंति । खप । कीयो । वंचयो । अगिनेव । आगे । नेव थान । अगि । नेव । बाइ । कुंड । दषिन । किसा । रसा ॥ १२३ पाठान्तर :-जग्योपवीत । जुग्योपवीत । सं० १६४७ और १७७० की पुस्तकों में यह पाठ है "इह विंधि प्रमान दस विधि सुक्रमं"। जंग । जग । सुमंडि । सुदुष्ट । दुष्ट । सुझम्म । वसु । मंसु । सुज़ल । कर्म । समुह ॥ (विधि *) विशेष है ॥ १२४ पाठान्तर :-गाइचं । मंडय । मंडे । पर्वत हलावे । मोहिनी । रूप कबाइक धरै । नट्टहिं । कबक्क । वै । "वै हथिन तालि न धरै" भी सं० १६४७ की में पाठ है । हरथ्यै ।
५० पृथ्वीराजरासो । [ आदि पर्व ॥ तथापि राक्षसों का उपद्रव शान्त न होना ॥ रूखया ॥ कारयं जग्ग बंधान निंमानयं । रचियं कुंड षंडं थिरं थानयं ॥ आसनं दिव्य देवान आव्हानयं । असुरं कीन उच्चिष्ट जथानयं ॥ छं० ॥ २५१ ॥ रु० ॥ १२८ ॥ ॥ तब वशिष्ट का स्वयं कुंड रचन कर यज्ञार्थ बैठना और चिंतवन करना ॥ दूहा ॥ जब वाचिष्टह जग्ग कजि । सजि कुंडह सुभ थान ॥ तब आसुर अन संक ह्वे । किय उच्चिष्ट उतान ॥ छं० ॥ २५२ ॥ रु० ॥ १२९ ॥ कवित्त ॥ तब चिंतिय वाचिष्ठं । एह आसुर अविचारिय ॥ जग्ग जीच उच्चिष्ट । करैं कातर अव धारिय ॥ सुरन अंस संगहे । हवै नह हव्य हुआवह ॥ सो उपाव संचियै । (जो *) याहि संवरै असुर सव ॥ निम्म्यौ सु सूर संग्राम भर । अरि अलंध षंडन सु षल ॥ सम धरचि जग्ग कारन सकल । विमल सिष्ट सोमै सथल ॥ छं० ॥ २५३ ॥ रु० ॥ १३० ॥ अरिल्ल ॥ अघट घाटं रिषि दृषि निसाचर । परिसि च्यार धरि ध्यान ग्यान बर ॥ चिंतिय ब्रह्म करम किच्छि कामह । भयौ रूप रिषि ब्रह्म सुतामह ॥ ॥ छं० ॥ २५४ ॥ रु० ॥ १३१ ॥ १२८ इस रूपक के छंद का नाम जो चंद ने मलयां प्रयोग किया है यह स्रग्वणी नामक चार रणण का छंद है ॥ पाठान्तरः-बंधाननि । मानयं । रुचियं । आहवानयं । उशिष्ट । १२९ पाठान्तरः-वाशिष्ट । सुथांन । अनं । १३० पाठान्तरः-चिंतिय । जिष्ट । जिह । करै । हवै न हव्यहु आवह । संयाम । षंडं । समं । सैाभै ॥ (जो *) विशेष है ॥ १३१ पाठान्तरः-ईषि । निसाचरं । वरं । ब्रह्मकरम ॥ सं० १७७० की पुस्तक में "ध्यान" शब्द नहीं है ॥
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ५१ ॥ वशिष्ठ का चाहुवानजी को उत्पन्न करना ॥ कवित्त ॥ अनल कुंड किय अनल । सजि उपगार सार सुर ॥ कसन्नासन आसनह । मंडि जग्योपवीत जुरि ॥ चतुरानन स्तुति सह । संच उच्चार सार किय ॥ सु करि कमंडल वारि । जुजित आव्हान थान दिय ॥ जा अग्नि पानि अव अहुति जजि । भजि सु दुष्ट आव्हान करि ॥ उपज्यौ अनल चहुवान तब । चव सु बाहु असि बाह धरि ॥ ॥ छं० ॥ २५५ ॥ रु० ॥ १३२ ॥ दूहा ॥ भुज प्रचंड चव चार मुख । रक्त ब्रन्न तन तुंग ॥ अनल कुंड उपज्यौ अनख । चाहुवान चतुरंग ॥ ॥ छं० ॥ २५६ ॥ रु० ॥ १३३ ॥ ॥ ऋषियों का चाहुवानजी का स्वरूप देख कर उन को चाहुवान कहना । उन को राक्षसों से युद्ध करने की शक्ति देने को आशापूरा देवी का स्मरण करना । देवी का प्रत्यक्ष होकर चाहुवान जी को राक्षसों से युद्ध करने में सहायता देना । राक्षसों का रसातल को जाना। देवी का चाहुवान जी को अपनी कुल देवी मानने की आज्ञा करना और उन का अपने वंश भर की कुल देवी मानना स्वीकार करना । देवी का उन को वर देकर पधारना । वशिष्ठ का चाहुवान जी को आशीर्वाद देकर अन्य अनलों का वर्णन करना और दुर्वासा को शाप देकर पठाना ॥ वाधा ॥ उपज्या अनल अनूपम रूपं । नहि आकृति अवर नर दूपं ॥ अंन अभूत सु उन्नत जिष्टं । वंदन भर कि बइ मनु पिष्टं ॥ छं० ॥ २५७ ॥ १३२ पाठान्तरः-अनलकुंड सजि । मंडि । जज्ञोपवित । आह्वान । नाजाने । आबद्दान । उपन्यो । चहुआन ॥ पुरातत्त्ववेत्ताओं के स्मरण में रहे कि प्रायः यह कहा जाता है कि अग्निकुलों की कब उत्पत्ति आबू पर हुई उस का कोई पौराणिक प्रमाण भी नहीं मिलता । अतएव हम एक यह प्रमाण विदित करते हैं कि कालिंदिका प्रकाश नामक ग्रंथ में पुराणोक्त यह श्लोक लिखा हैः- श्लोक ॥ दूषयिष्यन्ति यवना, स्सहस्राब्दे गते कलौ । तदा रक्षां करिष्यति, याज्ञिकाः क्षत्रियर्षभाः ॥ १३३ पाठान्तरः-रत । ब्रन । बच ।
५२ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
स्याम रोम कपोल विसालं । उन्नत कंध व्यतिय दूसालं ॥ खाल माल खोभै उर क्षोभं । पृथु प्राकृष्ट दिक्क कर दोसं ॥ छं० ॥ २५८ ॥ नयन पृथुज भ्रकुटी सु कहरं । मुख आक्रत्ति बाल घर नूरं ॥ कवच चोन उर चान सरीसं । दल आक्रत्ति भयानक दीसं ॥ छं० ॥ २५९ ॥ तोन पूरि सर बड्डि सु कासं । धरिय पांन सुरबी रवि रासं ॥ खेटक्क खग्ग उनंगी धारं । चाचिवान दिष्यो रिष सारं ॥ छं० ॥ २६० ॥ चाचि आइ रिषि आइ समंगे । चाहुआन कहि सद्द सुरंगे ॥ समरी सकति रिषि गिर वासी । दिय साहाय युद्ध काजि तासी ॥ छं०॥ २६१ ॥ आई सकति सिंघ आरोही । दादस भुजा सु आयुध खोही ॥ खेटक्क खग्ग बरद्दह पासं । घंटा बान ऋती सिर आसं ॥ छं० ॥ २६२ ॥ खप्पर सकति शूल मद पाचं । देषे रूप क्रंम क्रम क्वाचं ॥ आसा पूरि कद्दै रिषि राजं । चाहुवान मंडी कृत काजं ॥ छं० ॥ २६३ ॥ चाल्ली सकति सहाइ अनल्लं । चल्ले सूर सबै कसि बल्लं ॥ खव आए चढि रुष्स ठानं । संह्यौ जुद्ध सबै असमानं ॥ छं० ॥ २६४ ॥
१३४ इस रूपक के छंद २५७ के पाठ में बड़ी गड़बड़ है । एशियाटिक सोसाइटी बंगाल की छापी हुई पुस्तक में “उपज्यौ अनल अनूपम रूप । नहि आक्रति अवरन रूपं ॥ व्रत अभूत सू उंनत जिष्टं । चंदन भर कि बहुम नुदिष्टं” ॥ और सं० १७७० की पुस्तक में “उपज्यौ अनल अनोणम स्तूपं । महि आक्रति अवरम रुपं । जंत अभूत असु उत्तमा जिष्टं । वंदन भरकि बहु मन पिष्टं” ॥ और संवत् १६४७ की में “उपन्त्यौ अनल अनूपम रूपं । नहि आक्रुति अवरम स्तूपं । व्रत अभूत असु उचंत जिष्टं । चवंदन भरा के बहु मंन पिष्टं” ॥ किन्तु हमारा पाठ कर्नल ड्रोड साहब के गुरु बारेट झापासिंहजी ने जिस सं० १८५९ की पुस्तक से रासा पढा था उसके अनुसार है ॥ इस में “तूपं” शब्द हमारे पाठकों को अर्थ करते समय परिश्रम देगा क्योंकि जिस संस्कृत शब्द “तूप” का यह अपभ्रंश हिन्दी है वह संस्कृत के अच्छे विद्वानों के पढ़ने में भी उस का बहुधा प्रयोग न होने के कारण बहुत ही कम आया होगा और वह वाचस्पत्यबृहदभिधान और शब्दार्थचिन्तामणि जैसे बड़े कोशों में भी नहीं मिलेगा परंतु प्रोफेसर बिलसन साहब के कोष में मिलेगा वे इसको त्रिलिंग में strong अर्थात् बलवान अथवा पुष्ट का वाचके लिखते हैं ॥ पाठान्तर:-उंनित । उंनित । उचतं । दुसालं । प्राकुष्टं । दिक्क । आक्रति । बालहर । आक्रति । सरि वीरं खिरासं । उनंगी । चांहि । बान । गिरंवासी । वरदह । कंता । क्रम । मंडी । सहाई । ठानं । आवटि । धुंमकेत । सर्कतिय संहृतिय । अध । पासं । तास । तिका । प्रसौनिय । यण्ये नाम । ताम । संवत् १६४७ और संवत् १७७० की में “धास्यौ कर सिर ले चंहुवानं” । पाठ है । धर्यौ । चाहुवान । वधहु । वंस । मान । चहुवान । असमान । गई । हे है । चहुवानं । उपज्जि ।
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । ५३
बाहै आवधि सकती सारं । घर आवहि पडै धर भारं ॥ सह्ने धुमरकेत सकतीयं । जंचकेत चहुआन (सु*) छतीयं ॥ छं० ॥ २६५ ॥ अद्द सु रप्पस दानव तद्दे । गए रसातल नट्ठे चद्दे ॥ देवी आइ अनल्लच पासं । जंपी तथ्य प्रसन्नी तासं ॥ छं० ॥ २६६ ॥ आसापूर कद्दै मो नामं । पुज्जै पुत्र पौत्र परिनामं ॥ कुलह गोत्र मुख्य थप्यै नामं । अप्पों रिद्धि अचल्लच तामं ॥ छं० ॥ २६७ ॥ धास्यौ सिर लै कर चहुवानं । ब्रह्महु वंस अंस जस मानं ॥ जीति अप्य देवी चहुआनं । दिय वर दान गई असमानं ॥ छं० ॥ २६८ ॥ गइ असमान कियौ सद् भारी । धुं! धुं! कार नै! जया सारी ॥ है! है! करि हं! हं! चहुआनं । अनल कुंड उपजे परिमानं ॥ छं० ॥ २६९ ॥ चौ मुष्यौ चौ वेद प्रकारं । जैसो मुख देख्यौ अधिकारं ॥ वेदं स्याम अथर्वन रूपं । रिगु जिजु वेद देव गुन नूपं ॥ छं० ॥ २७० ॥ चित्त चंमकार 'चिहूं दिसि जगिगय । पढत ताव्हि ब्रह्मांड सु जग्गिय ॥ बानी धुनि मुनि हरषि वसीसं । वर वचिष्ट तहां दई असीसं ॥ छं० ॥ २७१ ॥ तोचि वंस हांइ कुंडल धारी । जनु कि अर्क राका विस्त्तारी ॥ थुति करि सेव देव तिच्छि पानं । जै जै तप्प जिते चहुवानं ॥ छं० ॥ २७२ ॥ परिचरि वीर वीर नर केकं । तिच्छि चालुक्क भयौ गुन मेकं ॥ परचरि वर पावार ति वारं । क्रोध रूप जाजुल्य निधारं ॥ छं० ॥ २७३ ॥ जाजुल्लति परिचार न दिष्यौ । र्भिज करि विप्र पौरि तह रष्यौ ॥ तिन कारन वाचिष्ट रिषीसं । अर्बुद नाम गिरि नंद जगीसं ॥ छं० ॥ २७४ ॥ ता ऊपर दुरवासा आए । दै सराप वाचिष्ट पठाए ॥ अव वे दानव दुष्ट सु दाषै । तो रष्या चव कुली सु राषै ॥ छं० ॥ २७५ ॥ वंस छतीस गनीजै भारी । च्यार कुली कुल तिन अधिकारी ॥ सब सु जात जोनी मग दिष्यिय । ए ब्रह्मा अविसेष विसिष्यिय ॥ ॥ छं० ॥ २७६ ॥ रू० ॥ १२४ ॥
चिहू । पढ । हरपिव । सीसं । वशिष्ठ । रासा । तप । नरकेकं । तिवारं । पारहारन । तहं । उपर । रप्य । छत्तीस । गति । नै । जित्ती । (सु*) विशेष है ॥