भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 52, कुल 470 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 52

३६ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व हल्ली खेत अच्छी जलही समूहं । अचै शेष षीरं सु सानौ ससुहं ॥ धराचल्लि भागीरथी विम्ब आगं । मिटै अघघ ओघं तनं दुष्ष दागं ॥ १५७ ॥ सुभं उच्च चंदोल बीचं विराजं । मनो खुग्ग आरोह सोपान साजं ॥ नरं नीच नीरं तटं श्रोन प्रस्सं । तवै अग्ग देवं गुनं अब्ब अस्सं ॥ १५८ ॥ परै मख्खू कच्छेवरं धंषि कुद्दी । भजी कावखं गिड्ड गोमाय लुद्दी ॥ तटं श्रोन अच्छी थलं वारि छल्ल । घिनं मक्सिरू चंदोल बीचं वचल्लै ॥ १५९ ॥ तिनं खातसं देह आनूप धारै । वरं उर्वसी चामरं बिक्खू नारै ॥ धरै ध्यान भावं तिनं दुक्ख दब्बै । मिटै मज्जनं अघ्घ साजंम सब्बै ॥ १६० ॥ अलंकृत गंगा तनं तेज खोवै । मनौ दाचनं दाच दाहंन जो वै ॥ सुयं गंग गंगे सु गंगा प्रकारं । धरै नाम गंगा जमं किं करारं ॥ १६१ ॥ त्रिपथ्थी त्रिगामी विराजंत गंगा । मचा स्वग्ग लोकं नरं नारि चंगा ॥ रहहं घरी ज्यौं फिरै तीन लोकं । मचा दिव्य धुन्वी नवं निगम लोकं ॥ १६२ ॥ कलाखी सुचीरं गुफा फारि नागं । प्रगट्टीय मातंगि मानुष्य आगं ॥ रची नष्य अच्छी सुयं ताप अंजै । मचा वहराजं दिवं दुर्ग रंजै ॥ १६३ ॥ अचयं भीषमं मात बहु पाप षंडै । जमं ज्वाल ज्वालं तसं तेज चंडै ॥ रहं रोच रंगी घरं सीस गंगे । मचा मोचनी सात दुग्गा उतंगे ॥ १६४ ॥ बरं काख काखा जलं खेत रूपं । तहां उपनी मात आंबंग नूपं ॥ अई गाम सहं सु सामुह जेतं । डह्यौ नाम गंगा उतंगा विचेतं ॥ १६५ ॥ घरद्वार दारं कला तूं प्रगट्टी । करी मुक्ति मग्गं मचा पाप मही ॥ तिनं नाम खोनै कियं तोय पीजै । कियं संम्रनं देव संज्यान कीजै ॥ १६६ ॥ कियौ गच्चि तें पंथ उग्गाच्चि साजं । तुंही तापिनी तेज तूं तेज राजं ॥ तुंही मध्य वारानसी खोच्छ दैनी । कही काल दुष्यं कटनं क्रपैनी ॥ छं० ॥ १६७ ॥ रू० ॥ ८३ ॥ दूहा ॥ जब लगि रज तन मात की । रहै अंग सो बांइ ॥ तब लगि काल न संपजै । क्रम पाप सब जाइ ॥ छं० ॥ १६८ ॥ रू० ॥ ८४ ॥ मंजने हल्लै । अपसा । जम । दाहं । दाहनं । जोहै । त्रिपंथी । नाग । घटा ताम । मंगा । महादिव्य । नवं । निगम । महावट्टराजं । पदिव दुर्ग । भीषम । जालं । महामोहनी । अनूपं । ध्यै। समरनं संभ्यान । मोच्छ । मोक्ष । दुष्च ॥ ८४ पाठान्तर :—सोलाइ ।