पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 53, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंआदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ३७ गाथा ॥ क्रमं अघं सब भंजै । दिव्यं करै देह सा रूपं ॥ सुरगं करै सु गामी । अह्रं नाम रसन उच्चारं ॥ कृं० ॥ १६९ ॥ रू० ॥ ८५ ॥ ॥ मंदाकिनी गंगा का उभरना और गौ का तिरकर निकलना ॥ दूहा ॥ सुनि गंगा सुवयन रिषि । उभरी आय प्रमान ॥ ताहि तिरंतह नंदिनी । आई तट बिल थान ॥ कृं० ॥ १७० ॥ रू० ॥ ८६ ॥ रिषि सिष्य धाये सु सब । धर कड्डी तँह गाव ॥ सो कड्हिवि मंदाकिनी । गइ पयाल फिरि ठाव ॥ कृं० ॥ १७१ ॥ रू० ॥ ८७ ॥ बिल अथाह दिष्यौ सु रिष । चित चिंता परपत्त ॥ को निकसै या माधिगत । गत भयानक घत्त ॥ कृं० ॥ १७२ ॥ रू० ॥ ८८ ॥ ॥ वशिष्ट ऋषि का उस अथाह बिल बूरने को हिमालय के पास एक पुत्र मांगने जाना ॥ विछप्परी ॥ चिंते रिषि देखि बिल दुक्खित । उर लग्गी अति चिंत मम्झिझ चित ॥ पूछवि रिषि सिष्य कत कामं । सुहै न कोइ बुद्धि बल तामं ॥ १७३ ॥ चिंतै ध्यान अप्प रिषि राजं । याहि सपूरन को थिर काजं ॥ चिंतत रिषि ध्यान उर भासं । है सत पुत्त हेम गिरि जासं ॥ १७४ ॥ एक पुत्त जाचौं तिन पासं । विन्न पूरे पूरै उर आसं ॥ क्रम्यौ राज रिषी दिसि उत्तर । देषी मन आनंद दिव्य धर ॥ १७५ ॥ गौ रिषि राज पास गिर राजं । इष्ष अग्ग पति आसन साजं ॥ मैना सहित आय पग लग्गे । अरघ पाद करि अचवन लग्गे ॥ कृं० ॥ १७६ ॥ रू० ॥ ८९ ॥ ८५ पाठान्तरः-क्रम । सारूपं । सुंगामी ॥ ८६-८८ पाठान्तरः-सुनयन । तिरेत ॥ ८६ ॥ धाए । कढी । तहां । कढवि । गई । ठांव ॥ ८७ ॥ परप्रत । मधि । घत ॥ ८८ ॥ ८९ पाठान्तरः-चिंते । दुक्रत । कोई । संपूरन । नासं । हेमगिरि । पुत्र एक । पू । पूरं । रिषि । उत्तर । मान । रिषिराज । गिरि राजं । दूष्ये । मेना । पय । लागे ॥