पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व दूहा ॥ सुनि सुवचन गिरि राज कौ । कहि रिषि कारन बात ॥ पुत्त एक जच्चूं तुमहि । गरित सपूरन गात ॥ छं० ॥ १७७ ॥ रू० ॥ ९० ॥ ॥ हिमालय का अपने सब पुत्रों को ऋषि का अभिप्राय कहना ॥ कवित्त ॥ तब सुचिंत गिर ईस । पुत्त सबे निज स्रव्वं ॥ कहि कारन षिति षात । अप्य रष्यौ कुल अव्वं ॥ इत्त सु रिषि सुत ब्रह्म । नाम वाचिष्ट महा मंति ॥ धर्म्म पार तप पार । पार श्रुत कर्म परम गति ॥ जच्चे सु षोइ तुम एक कहुँ । चिंतिय चत कारज्ज रिषि ॥ संब षो वास बिल उद्धरै । पद पामौ परमुच अषि ॥ छं० ॥ १७८ ॥ रू० ॥ ९१ ॥ ॥ हिमालय के बड़े पुत्र का उत्तर देना कि वह भूमि निषिद्ध है ॥ कवित्त ॥ तब अष्पहि अग्र पुत्त । सुनहु गिरि राज चिंत चित ॥ पिता बाच रिष काज । कोइ खंडहि सुक्रम्स चित ॥ उह सु भूमि निषेध । थान जानहु तुम सब्बं ॥ अंग क्रंम अरु देव । षेव जाजन नहि अव्वं ॥ कुच्छित्त देस कारन विक्रम । तहँ सु केम किज्जै गमन ॥ अप्पियै प्रान मंग्गै जो रिषि । पै दुष्ट थान थप्पहिँ न तन ॥ छं० ॥ १७९ ॥ रू० ॥ ९२ ॥ ॥ वशिष्ठ का प्रत्युत्तर दे कहना कि वह भूमि बड़ी रम्य है ॥ कवित्त ॥ तब जंपे सुत ब्रह्म । सुनौ गिरि राज पुत्त सम ॥ इहि सु भौमि बिल थान । रम्य मंडहि सु तप्प दम ॥ ९०. पाठान्तर :-गिरिराज । संपूरन ॥ ९१ पाठान्तर :-ईसं । रख्यौ । महामति । परमगति । कहुं । संव । संवसौ । परमुच ॥ ९२ पाठान्तर :-गिरिराज । सुक्रम । रुव्व । अव्व । तहां । कहहां । पै ॥ ९३ पाठान्तर :-जंपै । सुन्न । गिरिराज । तिथ । गंधर्व । मूर्त्तिमान । सज्जै । तिसर । धात्र । महि ।