पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 55, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंआदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ३६ सर्वै देव इच्छि वास । तिव्य लब्धै रिषि स्वव्वं ॥ विप्र ब्रज वर वच्छि । सु गुन गंध्रव सव कव्त्रं ॥ किन्नरच्च क्रम सुत धर्म धर । सुरति मान सज्जैति सिर ॥ हरि ब्रह्म ईस संवास सच । जो आक्रम चि इक्क गिर ॥ छं० ॥ १८० ॥ रू० ॥ ८३ ॥ ॥ और वहां आगे वाल्मीक ऋषित्व को प्राप्त हुवे हैं ॥ पद्धरी ॥ रमनीक ठाम वाचिष्ट राज । तहां वसहि देव देवच्च विराज ॥ इच्छि थान पुव्व क्रत युग प्रमान । रिषि कियो तप्प जर्जित विधान ॥ १८१ ॥ वाल्मीक वीर इक्क वधिक रूप । अति पाप क्रंम आघात कूप ॥ भंजै सु मग्ग तिन भ्रम्म थान । पायौ सु हरिय दरसन विधान ॥ १८२ ॥ चित संप चक्र गद्द पदम वाहु । तन स्याम सुभित पीतच्च प्रबाहु ॥ दिप्प्यौ सु लछी तन रूप सील । कीनी बह तन तिन निसप ढील ॥ १८३ ॥ आयौ सु दिट्ठ गोविन्द वीर । जानी न पुव्व भ्रम्मह सरीर ॥ द्विति दिप्पि दिट्ठ कामच्च कद्दूर । विंक्यो सु पाप मध्यां सम्मूर ॥ १८४ ॥ तव आय रिप्प उपदेस दीन । किचि काज इच्छां यह क्रंम कीन ॥ अग्नी रु बंध तिय मात पुत्त । वंटहि कि पाप पापच्च सजुत्त ॥ १८५ ॥ तिच्छि जाइ कह्यौ वर भीन्न मान । वंक्यौ न पाप किन अंग थान ॥ लग्ग्यौ चरन्न कर धनुष तोरि । आघात घात बानी सजोरि ॥ १८६ ॥ व्याघात नाम सो वधिक थान । भ्रम भ्रग्यौ इक्क वहूक्रच्छ निधान * ॥ छं० ॥ १८७ ॥ रू० ॥ ८४ ॥ गाथा ॥ यों कत्थियं रिषि राजं । तुम कोइ दिवस भ्रमन करि अध्यं ॥ फुनि हम दरसन प्रापं । सध्यं गुर मंच दे कानं ॥ छं० ॥ १८८ ॥ रू० ॥ ८५ ॥ ८४ पाठान्तर :- जु । धर्म । दर्शन । लछि । वीर । धर्मह । धरमह । विंक्यौ । मथांस । भूर । रिपि । दृट्ठां । रह्वां । क्रम । त्रिय । पुत । संजुत । चरन । तोरी । भ्रग्यो । इक । वृक्ष ।
- यह पंक्ति कर्नल टोड साहब वाली पुस्तक में नहीं है ॥ ८५ पाठान्तर :- कोई । प्रमं । ससथ्य । मरा । मरा । गहिय । भट्टै । अब । अबयो ॥