पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४० पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
सरां सरां यह कहियं । गच्छियं भगताय अंगयं नेहं ॥ भिद्दे तु चक्रम मंटी । दृही निय अब यो देहं ॥ छं० ॥ १८८ ॥ रू० ॥ ८६ ॥ दूहा ॥ बांबी फिर अंगच बली । अंग उदैट्टी जाम ॥ क्षीन सबद मुख निक्कसे । धीर धीर कै राम ॥ छं० ॥ १८० ॥ रू० ॥ ८७ ॥ तब धरि सधि कयौ सु रिषि । दिषि प्रबत्न तप पार ॥ बाल्मीक रिषि सो भयौ । सुनि गिरि सुअन विचार ॥ छं० ॥ १८१ ॥ रू० ॥ ८८ ॥ ॥ हिमालय के मध्यम पुत्र नंद का वशिष्ट के साथ आना स्वीकार करना ॥ कवित्त ॥ सुनि सु बचन सिरि सुअन । सर्व विधि राम वाच रचि ॥ मध्य पुत्र गिरि नंद । सोय उच्चरयौ वाच सचि ॥ हौं सु पंग बिन पाय । क्रंम्मि सक्यों न राह दुर ॥ जाय परौं षित घात । करौं उद्दार वाच धुर ॥ पित बाच राम सज्ज्र्यौ सु बन । बाच सु हरिचंद अव्व वहि ॥ सोइ बाच तात ऋत कज्ज रिषि । कोइ सचुक्कहि मुंष मचि ॥ छं० ॥ १८२ ॥ रू० ॥ ८८ ॥ ॥ वशिष्ट का अर्बुद नाग को कहना कि जो तू नंद गिरि को उठा ले चले तौ हमारा कार्य सिद्ध हो ॥ पहरी ॥ अर्बुदा अचल अर्बुदति नाम । क्रित काम पयच षोरौ सु कांम ॥ धर नंद नंद नंदन प्रमान । उच्चार सार लै जाहु थान ॥ १८४ ॥ ८६ पाठान्तर :- बांकी । निक्कसै । कौं ॥ ८७ पाठान्तर :- दिषि । रिष ॥ ८८ पाठान्तर :- गिगिर । सोइ । हों । उच्चर्यौ । पाद । क्रमि । झंमि । सकों । सक्कौं सक्कै । परों । करों । कोई । चुक्कहि । मुष ॥ इस रूपक की पांचवीं तुक के वाच और सज्ज्र्यौ शब्दों के बीच में राम शब्द किसी २ पुस्तक में लेखक ने लिखना छोड़ दिया है । तथा इसी तुक के दूसरे पाद का पाठ हमारे पाठ के सिवाय किसी २ पुस्तक में "पिता वाच सिर अंबु वहि" करके भी है ॥ १०० पाठान्तर :- इस की पहिली तुक के पहिले पाद का पाठ हमने सं० १६४७ की