पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व प्रविस कियो गारत्त गिरि । जय जय वचन सरीर हुअ ॥ भै मग मगन सुतन सब्वे सु गिरि । उवरन्नौ नाक सुनाग धुन्न ॥ छं० ॥ १८८ ॥ रु० ॥ १०२ ॥ ॥ बिल का पुर जाना और पुष्प वृष्टि सहित जैजैकार होना ॥ दूहा ॥ उबरन्नौ नाक सु नाग धुन्न । दिव अस्तुति परमान ॥ पुष्प वृष्टि इच्छां करिय । जय जय बंधौ तान ॥ छं० ॥ १८९ ॥ रु० ॥ १०३ ॥ ॥ नग का हिलना ॥ दूहा ॥ गात सकल गिरि जात को । सब बूड्यौ सम नाग ॥ उबरि नास सैलह तहां । सो हलची बिन लाग ॥ छं० ॥ २०० ॥ रु० ॥ १०४ ॥ ॥ नग के हिलने से वशिष्ट चिंता कर ईश आराधन करने लगे ॥ दूहा ॥ नास सुद्दल हल्ल्यौ सुनग । उर अति चिंता जग्ग ॥ अति आतुर वाचिष्ट रिषि । ईस अराधन लग्ग ॥ छं० ॥ २०१ ॥ रु० ॥ १०५ ॥ ॥ वाचिष्ट ऋषि ने महादेव का यह आराधन किया ॥ खाटक ॥ ईसंजा गिरिजानने वगरयं । उच्छंग मातंगिनी ॥ चर्मेजा वड्जामवंत जलजं । बुंदं तयं उज्जलं ॥ रख्यं जारति कर्न कामति मलं । दल्यंति तीयं पुरं ॥ त्रिपुरारिं तन तुंग तारन गुरं । जैजै हरं ईसयं ॥ छं० ॥ २०२ ॥ रु० ॥ १०६ ॥ उच्चरि । अगै । पच्छ । संपन । तथ ॥ इस की अंत की तुक का पाठ किसी २ पुस्तक में “भू मग सुतन सबै सुगिरि । उवस्यौ नाक सु नाक धुन्न” है ॥ १०३ पाठान्तरः-उबयौ । नाक । हयां ॥ १०४ पाठान्तरः-यह रूपक सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है और जब तक कि वह इस से भी प्राचीन पुस्तक में नहीं मिले तब तक उस को क्षेपक नहीं कह सक्ते । सोह । लह्यो । बुड्यौ ॥ १०५ पाठान्तरः-नाग । वाशिष्ट । आराधन । लग ॥ १०६ पाठान्तरः-उद्धंग । छलजं । जलदं । रिपं । करन । दलंयंति ॥