पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबाना रभंति बारानसिय । आबू अर्बुद उद्दरिय ॥ जट विकट जाल विब्भूति रँग । सुरग मुकति ढिग ढिग फिरिय ॥ छं० ॥ २२२ ॥ रू० ॥ ११० ॥ ॥ आबू को अचल देख कर वशिष्ट का प्रसन्न होना और अन्य ऋषियों को वहां यज्ञ के लिये बुलाय जप तप और वास करना ॥ पद्धरी ॥ अग अचल दिषि वाशिष्ट रिष । मन मुदित भयौ सम आय सिष ॥ छर वासदेव सब गुन समान । आबरन रिद्धि चित चिंतं थान ॥ २२३ ॥ आभासि सिष गौतमह तथ्य । आचर्यौ वास अनि रिष सथ्य ॥ आभासि रिष अनेक ताम । संबोधि बोलि पृथु पृथुक नाम ॥ २२४ ॥ देवलह असित अंबावि सूत्र । सौमिच सर्प्प माली विभूत्र ॥ मह मक्षन सनक जैनेय पैल । दाखभ्य वक्र सुमंत औल ॥ २२५ ॥ दीपाय कित शूलंसि राय । तैतरिय जश्ववक्री सुताय ॥ जैमनिय ध्रुव्व वैसंपयान । घर्षनह लोम असुहोच जान ॥ २२६ ॥ मंडव्य अरति कौसिक्कं दाम । उष्णीष चिवन पर्नाद वाम ॥ घटजात सुबल मोजायनेय । बकवाक परासर वायवेय ॥ २२७ ॥ सचिवाक जात क्रन क्रन्न माख । सनिवाक क्रिताश्रम सुचि पाख ॥ सिषि वांसु पर्षत पारिजात । अगस्ति मारकंडे सुभाति ॥ २२८ ॥ पाविच पानि सर्वेन्य रम्य । किरनाषकेत अगु सेष सभ्य ॥ जंघावं भालकी कोप वेग । गालम हरीय ब्रह्म अगेग ॥ २२९ ॥ कौडिन्न बंध माखी सनक्कु । सानंद सनातन कत्त वक्कु ॥ सांडिल्ल करक वाराह पंग । कौमार अश्व हय घोष मंग ॥ २३० ॥ वेनीय जघन जघ नासकेत । कन्हं कलाप वकीव सेत ॥ अष्टाचवक्र उद्दालकेय । च्यवनह कपिल मातंग जेय ॥ २३१ ॥ ११० धयौ । बीयो । लभ्यौ । तिजगत । वानार । भंति । वानारसीय । उद्धरीय । मुति ॥ ११८ पाठान्तरः-दिषि । वाशिष्ट । सिष । आचर्य्यौ । प्रिथक । अंकवा । विसूत्र । सप्प । ध्रुव । हरष । नह । मंडप । कौसिक । उष्णीक । पनदिवाम । घट । जात । बाल । वाक । बालजाक । वाय । वेय । सचि वाक । क्रच । क्रनमाल । सनि । वाक । क्रिताश्री । सिषि । वांस । पर्वत । भाल । की । गालं । महि । रिय । कौंडिन । सांडिलं । वेनी । जय । घन । घना । सकेत । कन्ह । वसेत अष्टाह ।