भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ४५ ॥ प्रमथाधिपति ने आनन्दित होकर वर मांगने को कहा ॥ दूहा ॥ आनंद्यो प्रमथाधिपति । वर ! वर ! बंद्यौ बानि ॥ रिषि संगहु उतकंठ मन । सोइ समप्यौँ आनि ॥ छं० ॥ २१८ ॥ रू० ॥ ११३ ॥ ॥ वशिष्ट ऋषि का नंदगिरि को अचल करने का वर मांगना ॥ दूहा ॥ फिरि रिषि जंप्यौ संभु सों । जो तुट्ठो मुझ भास ॥ नग चलंतौ अचल करि । पुनि सज्जौ सिर वास ॥ छं० ॥ २१९ ॥ रू० ॥ ११४ ॥ सो आबू गिरि राज गुरु । सुर गिर सम सैलास ॥ त्रिपथ नाम मुनि देव का । वसि रु कियो कैलास ॥ छं० ॥ २२० ॥ रू० ॥ ११५ ॥ ॥ महादेव का पर्वत को अचल कर उसमें अचल नाम से विराजना ॥ कवित्त ॥ तब सु ईस मन मुदित । पानि चंप्यौ गिर गौरव ॥ अचल अचल्ल कहि अचल्ल । भयौ अचलेस नाम तब ॥ सुथिर भयौ नग नंदि । अप्प सिर वास सु सज्यौ ॥ उभय आय तिहि थान । सगन प्रमथाधिप रज्यौ ॥ गिरि नंद नाम हेमल्ल सुतन । अर्बुद नाग सु मिच मन ॥ तिहि नाम त्रिविध भय तिध्य हर । पारस अप्पन अर्थ तन ॥ छं० ॥ २२१ ॥ रू० ॥ ११६ ॥ कवित्त ॥ अचल नाम कहि अचल । अचल विद्या अभ्यासिय ॥ अर्बुद गिरि थिर धरम्यौ । बियौ बानारस बासिय ॥ वष्टित नाम इक वरष । मुक्ति खंभेति जगत गुर ॥ इच्छत नाम इक दीह । करै उपवास सोइ नर ॥ ११३-११५ पाठान्तरः-प्रथमाधिपति । बानी । समप्योँ ॥ ११३ ॥ मोँ । तुठो । भग्न पास ॥ ११४ ॥ गुरुं । सं० १६४७ की में "मुदगिर सम सैलास" और सं० १७१० की में "सुर गिर सम सैलास" और सं० १८५६ में "मेरु समल सैलास" पाठ हैं ॥ त्रिपथा । ताप । सुनि वसि । रुकियौ ॥ ११५ ॥ ११६ पाठान्तरः-अच । प्रथमाधिपं । रंज्यो । नम । तिद्य । अथि ॥