भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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४४ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व ॥ वशिष्ठ के वचन सुन महादेव का प्रत्यक्ष हो वर मांगने को कहना ॥ चौपाई ॥ सुनि मुनि बचन ओद मन ईसं । आय धरौ रह्यौ उद्दरि सीसं ॥ बर ! बर ! वानि जानि मंन अंग्गहु । जंपद्धि ईस आस जिहि जग्गहु ॥ छं० ॥ २१३ ॥ रू० १०८ ॥ मंगहु मुनि सज्जन गुन गुन बर । चलै कित्ति जित्ती जिहि धुर घर ॥ ता कित्ती मुकतीह खों खिज्जै । ब्रह्मासन आसन डोखिज्जै ॥ छं० ॥ २१४ ॥ रू० ॥ १०९ ॥ ॥ ईस का स्वरूप देख ऋषि का मुदित होना ॥ चौपाई. ॥ देषि सरूप ईस मन उम्मदि । जै जै जीव धन्य वानी बदि ॥ गौर कपूर तेज तन उद्दित । रिषि रोमांचित तब मन मुदित ॥ छं० ॥ २१५ ॥ रू० ॥ ११० ॥ मुदित मन उद्दित तन भारी । धरि बैकुंठ ईस मनचारी ॥ अर्बुद गिरि धरि ध्यान सु ईसं । करै काल तिहि काल जगीसं ॥ छं० ॥ २१६ ॥ रू० ॥ १११ ॥ ॥ वशिष्ठ ऋषि का महादेव को नमस्कार करना ॥ साटक ॥ त्रैनैनं चिजटेव सीस चितयं । चैरूप चोसूलयं ॥ चदेवं चिःदसा चिभू चिगुनयं । चीसंधि वेदत्रयं ॥ चैरग्निं चयलच्छि काल चितयं । ग्रामं चयं चैवयं ॥ गंगा चै त्रिपुरारि भासित तनुं । सोयं नमः संभवे ॥ छं० ॥ २१७ ॥ रू० ॥ ११२ ॥ १०८-१०९ पाठान्तरः-मंगहुं । जगहुं ॥ चलै और कित्ति शब्दो के बीच में "ई" शब्द का पाठ सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं है और इधर के समय की लिखित पुस्तकों में है । धुर धुर । कीती । मुक्तीह ॥ ११०-१११ पाठान्तरः- उमदि । गौरक । पूर ॥ ११२ पांठान्तरः-निजटेवसीस । त्रयलच्छिकालं । त्रितयंयाम ॥