भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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४८ पृथ्वीराजरासो। [ आदि पर्व ॥ यज्ञ का अनुष्ठान सुन कर राक्षसों का एकत्र हो आना ॥ दूहा ॥ जंचकेत दानव दुसह । अरु रषस धुमकेत । अप्प सथ्य लीने सकल । आए दुष्टह छेत ॥ ॥ छं० ॥ २४३ ॥ रु० ॥ १२१ ॥ ॥ ऋषियों का अनलकुंड रचन कर ब्रह्म कर्म प्रारंभ करना ॥ कवित्त ॥ आबू करि रिषि जग्ग। मंच कारन सु मंच जपु ॥ पंड हत्थ नर उंड। अष्ट अंगुल ऊर्द्ध वपु ॥ इय्य तीन अरु अट्ट । मंडि चक्कून समा सम ॥ खप्प समति सम फियौ। फनति बच्यौ देव क्रम ॥ अगिनेव थान अगिनेव धर। बाय कुंड दच्छिन दिसा ॥ नैरत निवर्त धज मंडि कै। ब्रह्म क्रम्म खग्गे रिसा ॥ ॥ छं० ॥ २४४ ॥ रु० ॥ १२२ ॥ ॥ दैत्यों का ऋषियों के यज्ञ में विघ्न करना ॥ कवित्त ॥ पंच पर्व्व जग्योपवीत । पंच पर्व्वी अधिकारिय ॥ देवो मुनि दुजराज । वैश्य शूद्रह चितकारिय ॥ चर विडाख पशु म्लेच्छ । क्रम चंडाल पंड करि ॥ इह प्रमान दस (विधि*) सुक्रम । जग्ग मंडे सुमंडि हरि ॥ दानव सु दुष्ट दुष्टंसु क्रम । दुष्ट मूच वरिषा करै ॥ पसु मंस रुधिर नंषै सु जल । क्रम विप्र संसुह डरै ॥ छं० ॥ २४५ ॥ रु० ॥ १२३ ॥ वै वेदी वै विप्र। गीत गांयच मंच जप ॥ ता मंझो घन विघ्न । करै आरिष्ट असुर कुप ॥ १२१ पाठान्तर :-यंत्रकेत । राषेस । धुम्रकेत । अप । सथ । अहेत ॥ १२२ पाठान्तर :-आब्बु । रिष्षि । तप । हथ । वर । उरद्ध । वप । अट्ठं । संमंति । खप । कीयो । वंचयो । अगिनेव । आगे । नेव थान । अगि । नेव । बाइ । कुंड । दषिन । किसा । रसा ॥ १२३ पाठान्तर :-जग्योपवीत । जुग्योपवीत । सं० १६४७ और १७७० की पुस्तकों में यह पाठ है "इह विंधि प्रमान दस विधि सुक्रमं"। जंग । जग । सुमंडि । सुदुष्ट । दुष्ट । सुझम्म । वसु । मंसु । सुज़ल । कर्म । समुह ॥ (विधि *) विशेष है ॥ १२४ पाठान्तर :-गाइचं । मंडय । मंडे । पर्वत हलावे । मोहिनी । रूप कबाइक धरै । नट्टहिं । कबक्क । वै । "वै हथिन तालि न धरै" भी सं० १६४७ की में पाठ है । हरथ्यै ।