भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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पृष्ठ 63

५० पृथ्वीराजरासो । [ आदि पर्व ॥ तथापि राक्षसों का उपद्रव शान्त न होना ॥ रूखया ॥ कारयं जग्ग बंधान निंमानयं । रचियं कुंड षंडं थिरं थानयं ॥ आसनं दिव्य देवान आव्हानयं । असुरं कीन उच्चिष्ट जथानयं ॥ छं० ॥ २५१ ॥ रु० ॥ १२८ ॥ ॥ तब वशिष्ट का स्वयं कुंड रचन कर यज्ञार्थ बैठना और चिंतवन करना ॥ दूहा ॥ जब वाचिष्टह जग्ग कजि । सजि कुंडह सुभ थान ॥ तब आसुर अन संक ह्वे । किय उच्चिष्ट उतान ॥ छं० ॥ २५२ ॥ रु० ॥ १२९ ॥ कवित्त ॥ तब चिंतिय वाचिष्ठं । एह आसुर अविचारिय ॥ जग्ग जीच उच्चिष्ट । करैं कातर अव धारिय ॥ सुरन अंस संगहे । हवै नह हव्य हुआवह ॥ सो उपाव संचियै । (जो *) याहि संवरै असुर सव ॥ निम्म्यौ सु सूर संग्राम भर । अरि अलंध षंडन सु षल ॥ सम धरचि जग्ग कारन सकल । विमल सिष्ट सोमै सथल ॥ छं० ॥ २५३ ॥ रु० ॥ १३० ॥ अरिल्ल ॥ अघट घाटं रिषि दृषि निसाचर । परिसि च्यार धरि ध्यान ग्यान बर ॥ चिंतिय ब्रह्म करम किच्छि कामह । भयौ रूप रिषि ब्रह्म सुतामह ॥ ॥ छं० ॥ २५४ ॥ रु० ॥ १३१ ॥ १२८ इस रूपक के छंद का नाम जो चंद ने मलयां प्रयोग किया है यह स्रग्वणी नामक चार रणण का छंद है ॥ पाठान्तरः-बंधाननि । मानयं । रुचियं । आहवानयं । उशिष्ट । १२९ पाठान्तरः-वाशिष्ट । सुथांन । अनं । १३० पाठान्तरः-चिंतिय । जिष्ट । जिह । करै । हवै न हव्यहु आवह । संयाम । षंडं । समं । सैाभै ॥ (जो *) विशेष है ॥ १३१ पाठान्तरः-ईषि । निसाचरं । वरं । ब्रह्मकरम ॥ सं० १७७० की पुस्तक में "ध्यान" शब्द नहीं है ॥