पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
स्याम रोम कपोल विसालं । उन्नत कंध व्यतिय दूसालं ॥ खाल माल खोभै उर क्षोभं । पृथु प्राकृष्ट दिक्क कर दोसं ॥ छं० ॥ २५८ ॥ नयन पृथुज भ्रकुटी सु कहरं । मुख आक्रत्ति बाल घर नूरं ॥ कवच चोन उर चान सरीसं । दल आक्रत्ति भयानक दीसं ॥ छं० ॥ २५९ ॥ तोन पूरि सर बड्डि सु कासं । धरिय पांन सुरबी रवि रासं ॥ खेटक्क खग्ग उनंगी धारं । चाचिवान दिष्यो रिष सारं ॥ छं० ॥ २६० ॥ चाचि आइ रिषि आइ समंगे । चाहुआन कहि सद्द सुरंगे ॥ समरी सकति रिषि गिर वासी । दिय साहाय युद्ध काजि तासी ॥ छं०॥ २६१ ॥ आई सकति सिंघ आरोही । दादस भुजा सु आयुध खोही ॥ खेटक्क खग्ग बरद्दह पासं । घंटा बान ऋती सिर आसं ॥ छं० ॥ २६२ ॥ खप्पर सकति शूल मद पाचं । देषे रूप क्रंम क्रम क्वाचं ॥ आसा पूरि कद्दै रिषि राजं । चाहुवान मंडी कृत काजं ॥ छं० ॥ २६३ ॥ चाल्ली सकति सहाइ अनल्लं । चल्ले सूर सबै कसि बल्लं ॥ खव आए चढि रुष्स ठानं । संह्यौ जुद्ध सबै असमानं ॥ छं० ॥ २६४ ॥
१३४ इस रूपक के छंद २५७ के पाठ में बड़ी गड़बड़ है । एशियाटिक सोसाइटी बंगाल की छापी हुई पुस्तक में “उपज्यौ अनल अनूपम रूप । नहि आक्रति अवरन रूपं ॥ व्रत अभूत सू उंनत जिष्टं । चंदन भर कि बहुम नुदिष्टं” ॥ और सं० १७७० की पुस्तक में “उपज्यौ अनल अनोणम स्तूपं । महि आक्रति अवरम रुपं । जंत अभूत असु उत्तमा जिष्टं । वंदन भरकि बहु मन पिष्टं” ॥ और संवत् १६४७ की में “उपन्त्यौ अनल अनूपम रूपं । नहि आक्रुति अवरम स्तूपं । व्रत अभूत असु उचंत जिष्टं । चवंदन भरा के बहु मंन पिष्टं” ॥ किन्तु हमारा पाठ कर्नल ड्रोड साहब के गुरु बारेट झापासिंहजी ने जिस सं० १८५९ की पुस्तक से रासा पढा था उसके अनुसार है ॥ इस में “तूपं” शब्द हमारे पाठकों को अर्थ करते समय परिश्रम देगा क्योंकि जिस संस्कृत शब्द “तूप” का यह अपभ्रंश हिन्दी है वह संस्कृत के अच्छे विद्वानों के पढ़ने में भी उस का बहुधा प्रयोग न होने के कारण बहुत ही कम आया होगा और वह वाचस्पत्यबृहदभिधान और शब्दार्थचिन्तामणि जैसे बड़े कोशों में भी नहीं मिलेगा परंतु प्रोफेसर बिलसन साहब के कोष में मिलेगा वे इसको त्रिलिंग में strong अर्थात् बलवान अथवा पुष्ट का वाचके लिखते हैं ॥ पाठान्तर:-उंनित । उंनित । उचतं । दुसालं । प्राकुष्टं । दिक्क । आक्रति । बालहर । आक्रति । सरि वीरं खिरासं । उनंगी । चांहि । बान । गिरंवासी । वरदह । कंता । क्रम । मंडी । सहाई । ठानं । आवटि । धुंमकेत । सर्कतिय संहृतिय । अध । पासं । तास । तिका । प्रसौनिय । यण्ये नाम । ताम । संवत् १६४७ और संवत् १७७० की में “धास्यौ कर सिर ले चंहुवानं” । पाठ है । धर्यौ । चाहुवान । वधहु । वंस । मान । चहुवान । असमान । गई । हे है । चहुवानं । उपज्जि ।