पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
५२ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
स्याम रोम कपोल विसालं । उन्नत कंध व्यतिय दूसालं ॥ खाल माल खोभै उर क्षोभं । पृथु प्राकृष्ट दिक्क कर दोसं ॥ छं० ॥ २५८ ॥ नयन पृथुज भ्रकुटी सु कहरं । मुख आक्रत्ति बाल घर नूरं ॥ कवच चोन उर चान सरीसं । दल आक्रत्ति भयानक दीसं ॥ छं० ॥ २५९ ॥ तोन पूरि सर बड्डि सु कासं । धरिय पांन सुरबी रवि रासं ॥ खेटक्क खग्ग उनंगी धारं । चाचिवान दिष्यो रिष सारं ॥ छं० ॥ २६० ॥ चाचि आइ रिषि आइ समंगे । चाहुआन कहि सद्द सुरंगे ॥ समरी सकति रिषि गिर वासी । दिय साहाय युद्ध काजि तासी ॥ छं०॥ २६१ ॥ आई सकति सिंघ आरोही । दादस भुजा सु आयुध खोही ॥ खेटक्क खग्ग बरद्दह पासं । घंटा बान ऋती सिर आसं ॥ छं० ॥ २६२ ॥ खप्पर सकति शूल मद पाचं । देषे रूप क्रंम क्रम क्वाचं ॥ आसा पूरि कद्दै रिषि राजं । चाहुवान मंडी कृत काजं ॥ छं० ॥ २६३ ॥ चाल्ली सकति सहाइ अनल्लं । चल्ले सूर सबै कसि बल्लं ॥ खव आए चढि रुष्स ठानं । संह्यौ जुद्ध सबै असमानं ॥ छं० ॥ २६४ ॥
१३४ इस रूपक के छंद २५७ के पाठ में बड़ी गड़बड़ है । एशियाटिक सोसाइटी बंगाल की छापी हुई पुस्तक में “उपज्यौ अनल अनूपम रूप । नहि आक्रति अवरन रूपं ॥ व्रत अभूत सू उंनत जिष्टं । चंदन भर कि बहुम नुदिष्टं” ॥ और सं० १७७० की पुस्तक में “उपज्यौ अनल अनोणम स्तूपं । महि आक्रति अवरम रुपं । जंत अभूत असु उत्तमा जिष्टं । वंदन भरकि बहु मन पिष्टं” ॥ और संवत् १६४७ की में “उपन्त्यौ अनल अनूपम रूपं । नहि आक्रुति अवरम स्तूपं । व्रत अभूत असु उचंत जिष्टं । चवंदन भरा के बहु मंन पिष्टं” ॥ किन्तु हमारा पाठ कर्नल ड्रोड साहब के गुरु बारेट झापासिंहजी ने जिस सं० १८५९ की पुस्तक से रासा पढा था उसके अनुसार है ॥ इस में “तूपं” शब्द हमारे पाठकों को अर्थ करते समय परिश्रम देगा क्योंकि जिस संस्कृत शब्द “तूप” का यह अपभ्रंश हिन्दी है वह संस्कृत के अच्छे विद्वानों के पढ़ने में भी उस का बहुधा प्रयोग न होने के कारण बहुत ही कम आया होगा और वह वाचस्पत्यबृहदभिधान और शब्दार्थचिन्तामणि जैसे बड़े कोशों में भी नहीं मिलेगा परंतु प्रोफेसर बिलसन साहब के कोष में मिलेगा वे इसको त्रिलिंग में strong अर्थात् बलवान अथवा पुष्ट का वाचके लिखते हैं ॥ पाठान्तर:-उंनित । उंनित । उचतं । दुसालं । प्राकुष्टं । दिक्क । आक्रति । बालहर । आक्रति । सरि वीरं खिरासं । उनंगी । चांहि । बान । गिरंवासी । वरदह । कंता । क्रम । मंडी । सहाई । ठानं । आवटि । धुंमकेत । सर्कतिय संहृतिय । अध । पासं । तास । तिका । प्रसौनिय । यण्ये नाम । ताम । संवत् १६४७ और संवत् १७७० की में “धास्यौ कर सिर ले चंहुवानं” । पाठ है । धर्यौ । चाहुवान । वधहु । वंस । मान । चहुवान । असमान । गई । हे है । चहुवानं । उपज्जि ।
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । ५३
बाहै आवधि सकती सारं । घर आवहि पडै धर भारं ॥ सह्ने धुमरकेत सकतीयं । जंचकेत चहुआन (सु*) छतीयं ॥ छं० ॥ २६५ ॥ अद्द सु रप्पस दानव तद्दे । गए रसातल नट्ठे चद्दे ॥ देवी आइ अनल्लच पासं । जंपी तथ्य प्रसन्नी तासं ॥ छं० ॥ २६६ ॥ आसापूर कद्दै मो नामं । पुज्जै पुत्र पौत्र परिनामं ॥ कुलह गोत्र मुख्य थप्यै नामं । अप्पों रिद्धि अचल्लच तामं ॥ छं० ॥ २६७ ॥ धास्यौ सिर लै कर चहुवानं । ब्रह्महु वंस अंस जस मानं ॥ जीति अप्य देवी चहुआनं । दिय वर दान गई असमानं ॥ छं० ॥ २६८ ॥ गइ असमान कियौ सद् भारी । धुं! धुं! कार नै! जया सारी ॥ है! है! करि हं! हं! चहुआनं । अनल कुंड उपजे परिमानं ॥ छं० ॥ २६९ ॥ चौ मुष्यौ चौ वेद प्रकारं । जैसो मुख देख्यौ अधिकारं ॥ वेदं स्याम अथर्वन रूपं । रिगु जिजु वेद देव गुन नूपं ॥ छं० ॥ २७० ॥ चित्त चंमकार 'चिहूं दिसि जगिगय । पढत ताव्हि ब्रह्मांड सु जग्गिय ॥ बानी धुनि मुनि हरषि वसीसं । वर वचिष्ट तहां दई असीसं ॥ छं० ॥ २७१ ॥ तोचि वंस हांइ कुंडल धारी । जनु कि अर्क राका विस्त्तारी ॥ थुति करि सेव देव तिच्छि पानं । जै जै तप्प जिते चहुवानं ॥ छं० ॥ २७२ ॥ परिचरि वीर वीर नर केकं । तिच्छि चालुक्क भयौ गुन मेकं ॥ परचरि वर पावार ति वारं । क्रोध रूप जाजुल्य निधारं ॥ छं० ॥ २७३ ॥ जाजुल्लति परिचार न दिष्यौ । र्भिज करि विप्र पौरि तह रष्यौ ॥ तिन कारन वाचिष्ट रिषीसं । अर्बुद नाम गिरि नंद जगीसं ॥ छं० ॥ २७४ ॥ ता ऊपर दुरवासा आए । दै सराप वाचिष्ट पठाए ॥ अव वे दानव दुष्ट सु दाषै । तो रष्या चव कुली सु राषै ॥ छं० ॥ २७५ ॥ वंस छतीस गनीजै भारी । च्यार कुली कुल तिन अधिकारी ॥ सब सु जात जोनी मग दिष्यिय । ए ब्रह्मा अविसेष विसिष्यिय ॥ ॥ छं० ॥ २७६ ॥ रू० ॥ १२४ ॥
चिहू । पढ । हरपिव । सीसं । वशिष्ठ । रासा । तप । नरकेकं । तिवारं । पारहारन । तहं । उपर । रप्य । छत्तीस । गति । नै । जित्ती । (सु*) विशेष है ॥
५४ पृथ्वीराजरासो । [ आदि पर्व ॥ क्षत्रीयों के छत्तीस वंशों की नामावली ॥ कवित्त ॥ रवि ससि जादव वंस । ककुत्थ परमार सदावर ॥ चाहुवान चालुक्क । छंद सिल्हार आभीयर ॥ दोय मत्त मक्वान । गरुअ गोहिल गोहिल पुत ॥ चापोत्कट परिच्छार । राव राठौर रोस जुत ॥ देवरा टांक सैंधव अनिग । योतिक प्रतिच्छार दधिषट् ॥ कारद्दपाल कोटपाल हुन । हरितट गोर कमाष मट ॥ छं० ॥ २७७ ॥ रू० १३५ ॥ दूहा ॥ धान्यपालक निकुंभ वर । राजपाल कविनीस ॥ काल छुरक्कै आदि दै । वरने बंस छतीस ॥ ॥ छं० ॥ २७८ ॥ रू० ॥ १३६ ॥ ॥ चारों अग्निकुल क्षत्रीयों ने वशिष्ठ का यज्ञ निर्विघ्न किया ॥ कवित्त ॥ पठन संच रिष जाप । च्यार षिची उप्पाए ॥ कुचिल हीन परिच्छार । पैारि रष्पहु सत आए ॥ १३५-३६ पाठान्तर :-यादव । परमार-रु । तौंबर । चालुक । छिंद । छंदक । आभीवर । गुरुआ गोह । गही श्रुत । राठोर । सिंधव । अनग । अनंग । योतिक । प्रतिहा । दधीपट । करेटपाल । हुन । हरीतट । गोरक । भाड । जट ॥ १३५ ॥ ध्यानपालक । ध्यान पालकनि । कुंभ । कविनीस । द्वै । छत्तीस ॥ कवि चंद के समय में जो छत्तीस कुल क्षत्रियों के प्रसिद्ध थे उन के नाम उसने वर्णन किये हैं अर्थात् रवि = सूर्यवंशी १ ससि = चंद्रवंशी २ जादव = यदुवंशी ३ ककुत्थ = कछवाहे ४ परमार ५ सदावर = तौंबर ६ चौहान ७ चालुक = सोलंकी ८ छंद = रांदेल ९ सिल्हार १० आभीयर ११ दोयमत्त = दाहिमा १२ मक्वान १३ गोहिल १४ गहिलोत १५ चापोत्कट = चावडा १६ परिहार = पंढियार १७ राठौर १८ देवडा १९ टांक २० सैंधव = सिंधव २१ अनिग = अनग २२ योतिक २३ प्रतिच्छार २४ दधिषट २५ कारट्टपाल = काठी २६ कोटपाल २७ हुन = हुन, हुण २८ हरितट = हाडा २९ गोर = गोड ३० कमाष = कमाड, जेठवा ३१ मट = जट ३२ ध्यानपालक वा धान्यपालक ३३ निकुंभ ३४ राजपाल ३५ कालछुरक्कै = कालछुर ३६ । इन के विषय में कवि दलपत रामजी अपने ज्ञाति निबंध नामक ग्रंथ में लिखते हैं कि रत्नकोश नामक संस्कृत ग्रंथ की टीका में लिखा है कि क्षत्रिय कुल का आदि पुरुष मनु उस के वंश में से यह छत्तीस हुए हैं ॥ सं० १६४७ और सं० १७९० की पुस्तकों में इन रूपकों के स्थान में रूपक १३७ और उस के स्थान में इन को लिखे हैं अर्थात् उलट पुलट हैं। हम ने उन का क्रम इस लिये ग्रहण नहीं किया है कि रूपक १३४ के छंद २७६ की पहिली तुक का अर्थ उस के पीछे इन रूपकों का ही होना प्रकाश करता है ॥
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो। ५५ चतुर वीर चहुवान । च्यार सुप्पौ चैवाहं ॥ अष्ट अष्ट आरिष्ट । देव चारिष्ट सु साहं ॥ पंमार वाह्र धन धन करह । कह्यौ रिष्य परमार धन ॥ चालुक्क वाह्र चालुक्क दुज । कुसित कुसन संडित तन ॥ ॥ छं० ॥ २७९ ॥ रू० ॥ १३७ ॥ अनल कुंड आसंग । उपजि चौआन अनिल घन ॥ सुकर संठि करि वार । धनुष संग्रह्यौ वान वल ॥ तिन रष्खिस परिवार । धार सुष धरनि नि घटिय ॥ षन्त जुषित्त संमुद्दे । तिनह्र सिर सरअन तुह्रिय ॥ बंभान जग्य निर विघ्न किय । पुह्रप दृष्टि सुर सीस रजि ॥ रष्पि सु धरनि पग भुज्ज वर । रिष्ट निवारिय इष्ट भजि ॥ ॥ छं० ॥ २८० ॥ रू० १३८ ॥ ॥ जिन्होंने द्विजों की रक्षा कियी उनके वंश में पृथ्विराज हैं ॥ दूहा ॥ तिन रक्षा कीनी सु दुज । तिन्हि सु वंस प्रथ्रिराज ॥ सो सिरषत पर वादनह्र । किय राझौ जुविराज ॥ ॥ छं० ॥ २८१ ॥ रू० ॥ १३६ ॥ ॥ चाहूवानजी के वंश के राजाओं की कथा ॥ ------------------oooo*------------------ ॥ चाहूवानजी से माणिकराजजी पहिले तक तेरह पीढ़ी का वर्णन ॥ पद्धरी ॥ ब्रह्मान जग्य उतपन्न सूर । चहुवान अनल अरि मलन सूर ॥ उत्तंग अंग प्रचंड वाह्र । पहुमीस इंद अरि गिलन राह्र ॥ छं० ॥ २८२ ॥ प्रतिपाल धरनि अंगह्र सु अम्म । श्रुत मान कीन उत्तंग क्रम्म ॥ रत्तो सु जोग भव भोग रास । पुर अमर नाग नर कित्ति जास ॥ छं० ॥ २८३ ॥ १३७-१३८ पाठान्तर :-जाय कुलिल । चहुवान । मुपौ । सुसाहं । वाह्र । हिपि । पंमार । मंडि । ततन ॥ १३७ ॥ कुंद । चौहांन । रष्पि । सपरिवार । मुप । निघट्टिय । जुपितं । निरविघन । भुज्जवर ॥ १३८ ॥ १३६ पाठान्तर :-रख्या । तिहिं । पृथ्वीराज । पृथिराज । प्रवावंदंनह ॥ १४० पाठान्तर :-बंभ्रान । उत्पच । चहुवांन । मल । मयूर । उतंग । पहुबीसु । इंदू अरिगिलन । धरनी । अंग । श्रुतमान । उतंग । रतो । सुजोग । भास । क्रिति । तास्रू । अन । सु । अन । माहंत । संका । विडार । मानिकं । राजंत । सु । अन । माह्र । भूत । भयंकर । रत ।
५६ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्वे
ता सुअन सूर सामंतदेव । अरिसंत मत्त मत्ता जु रेव ॥ महदेव सुअन सोहंत तास । सु प्रसन्न ईस सेवंत जास ॥ छं० ॥ २८४ ॥ बर अजयसिंह सिंघच्च सु राम । नर बीरसिंह संग्राम ताम ॥ सुअ बिंदसूर उद्धारचार । आलोक श्रीय संकाविदार ॥ छं० ॥ २८५ ॥ सुअ बैरसिंह वैरी बिहंड । ध्रुव बीरसिंह अरि बीर डंड ॥ अरिमंत सकल कलि कलन चूर । मानिकं राव चहुआन सूर ॥ छं० ॥ २८६ ॥ ॥ महिसिंहजी से धर्मधिराजजी तक का वर्णन ॥ राजत्त * सुअन ता सहस मध्य । महसिंह सिंघ संग्राम पथ्य * ॥ सुअ चंद्रगुप्त सम चंद्ररूप । प्रतापसिंह आरेन दूप ॥ छं० ॥ २८७ ॥
नूप । तत । पूर । बालंन । प्रथम । जग । दुप । पहु । मंह । रत । कोडी । कियो । चल्यौ । प्रमान । मांन । थांन । चल्यो । मुकजो । मुक्कयौ । निगम । मुक्क्यो । जित । किति । चौसठि । चित । पायौ । जंम । बिप्र । जंम । कदम । कदम । दानेवसल । यांन । स । आनि । उगात । उगात । उतंग । पुकस्यान । जरन । जाहुजाहु । जाह जाह । इन्द । सं० १७७० और १६४७ में "नैर पुर रुद्र डरि हक बजि । मांनि । जज्जेरी । जज्जरीय । पांनि । लगे । डके । सुरूप । मृग । सर्प । अप्प । अप । सद । पुज ॥
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- पक्षपात रहित वृद्ध और विद्वान कवि कहते हैं कि यहां अर्थात् छंद २८६ और २८७ के बीच में कितनेक छंद लोप हो गये हैं किन्तु चंद कवि ने तो मूल पुरुष श्री चहुवानजी से लेकर पृथ्वीराजजी तक पीढ़ावली वर्णन कियी थी कि जिन को सब ऐतिहासिक ग्रंथ और सर्वसा- धारण मनुष्य हिन्दुओं का अंतिम बादशाह होना प्रकाश करते और मानते हैं। और क्वचित् चंद का नाम विध्वंस करने वाले यह कहते हैं कि ग्रंथकर्त्ता ने अपने अज्ञात होने के कारण खंड विखंड वंशावली वर्णन कियी है। इन दोनों सम्मतियों में से हम पहिली से सम्मत हैं क्योंकि प्रथम तो चंद कवि अपने वंश परंपरा से इस राजकुल का मुख्य कवि और ख्यात वर्णन करने वाला था और यह कदापि संभव नहीं है कि आज तो हम चौहान वंश की शुद्ध अथवा अशुद्ध पीढ़ावली जान सकें और हम से सात सौ वर्ष पहिले जो उक्त राजकुल का निज कवि हुवा वह न जानता हो और न वर्णन करै । दूसरे चहुवान वंश की पीढ़ावली जो श्रीमान् श्री बूंदी राव राजाजी महोदय ने निश्चय कराई है और जो एक चहुवान वंश मात्र की पीढ़ावली हम भी सन् १८७३ से सिद्ध कर रहे हैं और वह बूंदी वाली से विशेषांश में मिलती हुई है उन दोनों के अनुसार श्री चहुवानजी से. पृथ्वीराजजी एक सौ सतहत्तरवीं १७७ पीढ़ी में हुए सिद्ध होते हैं। अब यहां सूक्ष्म बुद्धि से विचार कर देखने की बात है कि छंद २८२ से २८६ तक में जो तेरह १३ नाम क्रम से कवि ने कहे हैं वह उक्त दोनों वंशावलियों से बराबर मिलते हैं और "राजत्त सुअन ता सहस मध्य" का अर्थ इन प्रथम माणिक्यराजजी के विषय में घट नहीं सक्ता क्योंकि इतना वंश यहां तक बढ़ नहीं सक्ता। इस के सिवाय जो पाठक चहुवान वंश की इस परम प्रसिद्ध कथा को जानते होंगे कि तीसरी पीढ़ी में अहादेवजी जिनका उपनाम परभंजनजी भी है उनके हाथ से अनजाने प्रमाति ऋषि की एक गाय मर गई थी कि जिस पर ऋषि ने शाप दिया था कि "तुम्हारा वंश नाश हो" तदनन्तर ऋषि को
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । ५७ सुत सोच सिंघ बर मोह रूप । भूतह भयंक रन रत्त भूप ॥ सुत सेनराइ बह लेन वंत । संप्रति राइ सुभ तत्त संत ॥ छं० ॥ २८८ ॥ सुअ नागहस्त सस नाग राज । अस्यून्त नंद आनंद राज ॥ गिर लोहधीर सुत भ्रम्ममार । सुअ बीरसिंघ संकाबिडार ॥ छं० ॥ १८९ ॥ सुअ विबुधसिंघ सम जोगसूर । जस चंदराय बर अजस दूर ॥ सुत किन्नराज जस किन्न चिंत । हरहरह राइ नर बुडिमंत ॥ छं० १८० ॥ वानन्न राइ बलि अंग तास । सुअ प्रथव राइ पहुमी प्रचास ॥ तिन अनुज अंग राजत अनेक । कलि अलप आउ कित्ती अकेय ॥ छं०॥ २९१ । धर्माधिराज रति जोग भोग । पट घंट पित्ति पग्गह सु भोग ॥ मनाने पर उन्होंने अपराध क्षमा कर के कहा कि कितनीक पीढ़ियों तक तो तुम्हारे वंश में एक २ ही पुत्र होता रहेगा फिर वंश बढ़ेगा । इस से भी इस सूत्र का अर्थ माणिकराजजी में नहीं घट सक्ता । तथा उक्त दोनों पीढ़ावलियों को इस रूपक के साथ मिलाने से यह भी ज्ञात होता है कि छंद २८७ से अर्थात् उस में कहे महिसिंहजी एक सौ अड़तालीस १४८ वीं पीढ़ी में हुए और उन से फिर सब नाम बराबर क्रम से एक सौ सतहत्तर १७७ वें पृथ्वीराजजी तक मिलते हैं । क्या अब जो चौदहवीं १४ पीढ़ी से एक सौ सैंतालीस १४७ वीं पीढ़ी तक के बीच के नाम वह भी क्रमवार चंद्र कवि बिलकुल ही नहीं जानता था अथवा क्या वह उन को निगल कर परलोक में जा बैठा है? जो कि हमारी वृत्ति सदैव प्रत्येक विषय के अनुकूल अनुमान करने और उस के साध्य को मान्य करने की है इसलिये प्रतिकूल अनुमान ही क्यों करें और वैधर्म्य की ओर क्यों दृष्टि डालें । क्योंकि जो आज विद्वान लोग अन्य बड़े २ प्रसिद्ध ग्रंथों के विषय में ऐसे ही प्रतिकूल ही अनुमान करने लग जावें और वैधर्म्य का ही आश्रय कर लें तो बड़ा अनर्थ हो जाय । अब हम चौदहवीं १४ पीढ़ी से एक सौ सैंतालीसवीं पीढ़ी तक के नाम हमारे तथा बूंदी राज्य के शोध किये हुए हमारे पाठकों के जानने के लिये यहां लिखते हैं । पुष्करजी (विजयपालजी) १४ असमंजसजी १५ प्रेमपूरजी १६ भानुराजजी १७ मानसिंहजी १८ हनुमानजी (धर्म्मपाल) १६ चित्रसेनजी २० शंभूजी २१ महासेनजी (ऋद्धीशजी) २२ सुरथजी २३ रुद्रदत्तजी (कर्णपालजी) २४ हेमरथजी (रामपालजी) २५ चित्रांगदजी २६ चंद्रसेनजी (चित्ररथजी) २७ वाल्हीकजी (वत्सराजजी) २८ धृष्टद्युम्नजी (वरुणजी) २९ उत्तमजी ३० सुनीकजी ३१ सुबाहुजी (मोहनजी) ३२ सुरथजी ३३ भरथजी (मद- सेनजी) ३४ सत्यकीजी (सत्यकजी और सात्विकजी) ३५ शत्रुजित्जी (केसरीदेवजी) ३६ विक्रमजी ३७ सहदेवजी (इन को जीतकर कुरुवंशी राजा ने दिल्ली ले ली) ३८ वीरदेवजी (भीमसे- नजी) ३९ वसुदेवजी ४० वासुदेवजी ४१. रथाधीरजी ४२ शत्रुघ्नजी ४३ सुमेरुजी (शालिवाहनजी) ४४ ऋतवर्म्माजी ४५ सुधर्म्माजी ४६ दिव्यवर्म्माजी ४७ यौवनाश्वजी ४८ हरिश्चश्वजी ४९ अजैपालजी (अजमेर बसाने वाले) ५० भटदलनजी ५१ अनंगराजजी ५२ भीमजी ५३ गोगाजी ५४ शुभकरणजी ५५ उदयकरणजी ५६ जशकरणजी ५७ हरीकरणजी ५८ कीर्त्तिशजी ५९ बालकृष्णजी ६० हरिकृष्णजी
५८ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व ॥ वीसल देव जी का वर्णन ॥ अग दुष बीर बीसल नरिंद । बहु पापरत्त द्रव्यान अंध ॥ कुं० ॥ २८२ ॥ क्रत अक्रित काम क्रित्तह सु कीन । जिन असुर घोर अनि द्रव्य लीन ॥ संसार थागि फुनि द्रव्य काज । उपजाडू मत्ति अजमेर राज ॥ कुं० ॥ २८३ ॥ कौडी सु मोल मज कियौ एक । लीयो न किनह फिरि सचर नेक ॥ कामंध अंध सुझ्यौ न काल । चक अचक जोरि गिरि ढुक्कं माल ॥ कुं० ॥ २८४ ॥ चल्ल्यौ न राजनीतह प्रमान । आनीत बंधि नृप थान थान ॥ सुझ्यौ न अम्म चाल्यौ प्रमान । मुकजौ निगम्म करि अगसमान ॥ कुं० ॥ २८५ ॥ अबलोच छोह खंडिय सु कित्ति । मुक्कयौ अम्म आअम्म जित्ति ॥ दरबार अतिथ दीसै न कोइ । अप्प सुह कित्ति संभरै लोइ ॥ कुं० ॥ २८६ ॥ चौसठि बरस बर राज कीन । पायौ न पुत्र फल सुंष छीन ॥ बल अचछ चित्त चिंत्यौ मु काल । पायौ न सुक्रत कछु करन साल ॥ कुं० ॥ २८७ ॥ गति अंत सुमति होइ बीर । पाबै सु जम्म जज्जर सरीर ॥ द्रषि गयौ सुमन वीसल नरिंद । उपनौ बीर खिति बीष कंद ॥ छं० ॥ २८८ ॥ घन मदन सदन भरि स्त्रब्ब जस्म । तिह परत उठि कत्या कदम्स ॥ ६१ रामकृष्णजी ६२ बलदेवजी ६३ हरदेवजी ६४ भीमजी ६५ सहदेवजी ६६ रामदेवजी ६७ वसुदेवजी ६८ श्यामदेवजी ६९ हरिदासजी ७० महीधरजी ७१' वामदेवजी ७२ श्रीधरजी ७३ गंगाधरजी ७४ महादेवजी ७५ शारंगधरजी ७६ मानसिंहजी ७७ चक्रधरजी ७८ शत्रुजितजी ७९ हलधरजी ८० महाधनुजी ८१ देवदत्तजी ८२ दामोदरजी ८३ काशीनाथजी ८४ लीलाधरजी ८५ धरणीधरजी ८६ रमेशजी ८७ भगवतदासजी ८८ कृष्णदासजी ८९ शिवदासजी ९० हरिपूर्णजी ९१ देवीदासजी ९२ कर्मचंद्रजी ९३' रामदासजी ९४ महानन्दजी ९५ विष्णुदासजी ९६ महारामजी ९७ रेवादासजी ९८ अमरसिंहजी ९९ गंगादासजी १०० मानसिंहजी १०१ विशंभरजी १०२ मथुरादासजी १०३ द्वारिका- दासजी १०४ माधवजी १०५ सुदासजी १०६ वीरभद्रजी १०७ गोपालजी १०८ गोविन्ददासजी १०९ माणिक्यराजजी दूसरे ( इन के दो पुत्र बड़े हनुमानजी और छोटे सुयीवजी जिन में से पाटवी हनुमानजी सांभर का राज्य अपनी प्रसन्नतां से सुग्रीवजी को देकर आप पटना जीत वहां के राजा हुए कि जिन के वंश में इकतीस ३१ प्रकार के घूर्षये चौहान हुवे) ११० सुग्रीवजी (सांभर के राजा हुए) १११ अंगदजी ११२ केसरीजी ११३ जयंतजी ११४ जगदीशजी ११५ जयरामजी ११६ विजयरामजी ११७ कृष्णजी ११८ जीतयुहुजी ११९ गोबर्हुनजी १२० मोहनजी १२१ गिरिधरजी १२२ उदयरामजी ( उद्यमजी) १२३ भारंगजी १२४ अर्जुनजी १२५ शत्रुंजीतजी १२६ सोमदत्तजी १२७ दुःखंतजी १२८ भीमजी १२९ सत्यपालजी १३० परशुरामजी १३१ रघुरामजी (मांदोट के राजा से सात दिन लड़कर सांभर छोड़ बुरहानपुर अपने सुसरे के यहां भाग गये और वहीं मरे) १३२ समरसिंहजी १३३ माणिक्यराजजी तीसरे (सांभर इन्होंने पीछे विजय कर ली) १३४ मधुकर्मजी
आदि पर्व ] पृथ्विराजरासो । ५६ ॥ ढुंढा दानव की उत्पत्ति और उस का अजमेर के वन में रहना ॥ कत्या कदस्स उर असुर रज्जि । घर ढुंढ नाम दानव उपज्जि ॥ कं० ॥ २९९ ॥ जगि जोग नयर जुगनीय थान । पुज्जै सु आय उग्गति विच्छान ॥ रथ च्यार चक्र उत्तंग बाह्र । असि असिय चय्य मुष अग्ग दाह ॥ कं० ॥ ३०० ॥ संभरिय धरा धरनीय ठाच । पुक्कस्यौ नरनि रे जाहु जाच ॥ सिर कोपि रीस धुनि दसन बज्जि ॥ उभरे घग्ग जनु इंदू गज्जि ॥ कं० ॥ ३०१ ॥ प्राचार पाय धुकि धरनि धुज्झि । पुर नयररुद्र उर हक्कि बज्जि ॥ कंपी सु भूमि नव खंड मान । जज्जरिय नाव ज्यौं बाय पान ॥ कं० ॥ ३०२ ॥ लगै न पलक्क द्रग देव चच्छि । डक्कै डकार द्रगपाल गच्छि ॥ दिष्यौ सरूप दानव उतंग । वैराट रूप धरि धस्यौ अंग ॥ कं० ॥ ३०३ ॥ पंषीरु द्रग्ग नर स्त्रप्प भाजि । आघात सह दानव सु गाजि ॥ चिंत चिंत चिंत जुग्गनि प्रधान । पुज्जै सु आनि उग्गति विच्छान ॥ कं० ॥ ३०४ ॥ चहुआन रूप दानव प्रमान । भज्यौ सु पुच आबू सथान ॥ ॥ कं० ॥ ३०५ ॥ छ० ॥ १४० ॥ (दामोदरजी) १३५ रामचंद्रजी १३६ संग्रामसिंहजी १३७ शिवदत्तजी (श्यामदत्तजी) १३८ भोगाद- त्तजी १३९ शिवदत्तजी १४० रुद्रदत्तजी १४१ ईश्वरजी १४२ उमादत्तजी १४३ चतुरजी १४४ सोमेश्वरजी पहिले (इन के दो लड़के भरथजी १ और उरथजी २ उन में से भरथजी पाटवी के वंश में पृथ्वी- राजजी हुवे और उरथजी के वंश में बूंदी और कोटा आदि के हाड़ा चौहान हुए हैं) १४५ भरथजी १४६ मुकुटजी १४७ ॥ इसके छन्द २८८ की पहिली तुक के पहिले पाद "सुत मोहसिंह वर मोह रूप ।" में कवि का गूढ आशय यह समझना आवश्यक है कि वह उसमें तीन नाम वर्णन करता है मोह- सिंह (सिंहदेवजी) सिंहवर और मोहनरूप कि जिसके सिंह शब्द को अर्थ करने के समय मोह शब्द के साथ और वर के साथ दोबार लगाने से पृथक दो नाम सिद्ध हो जाते हैं अतएव हमने सिंह शब्द के नीचे दो लकीर करी हैं। और इसी तरह छन्द २९१ की पहिली तुक के दूसरे पाद में "प्रथव" शब्द से पृथ्वीराज नामक का निःसन्देह ग्रहण षट् भाषा में व्युत्पन्न विद्वान कर सक्ते हैं । तदनन्तर बीसलदेवजी के जो वृत्त चंद ने जैसे के तैसे उत्तापित होकर लिखे हैं उनको मनन करने से विद्वान पाठक सहज ही में यह अनुमान कर सक्ते हैं कि यद्यपि चंद उनके कुल का वंश परंपरा से राज-कवि था परन्तु वह निःसंदेह बड़ा ही स्पष्ट-वक्ता और पक्षपात रहित पुरुष था क्योंकि आज इस उनीसवीं शताब्दी में भी जब कि स्वतंत्रता और सभ्यता का सूर्य पूर्ण प्रकाशित होरहा है तब भी कोई राज-कवि ऐसा स्पष्ट-वक्ता और पक्षपात रहित अपने यजमान की दुर्गतियों को उसके भावी संतानों के शिक्षार्थ निडर होकर प्रकाश करने वाला प्रायः किसी के दृष्टि न आया होगा । इस के साथ भाषाओं के शोध करने वाले विद्वानों को चंद
६० पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व दूहा ॥ खो दानव अजमेर वन । रचि तह दिन घन अंत ॥ शून्य दिसान न जीव कौ । थिर थावर द्रिगभंत ॥ ॥ छं० ॥ ३०६ ॥ रू० ॥ १४१ ॥ मुरिच्छ ॥ संभरि सोर नरिंदच संभरि । पंथ प्रजा पसरै रन जंगर ॥ रम्य अरम्य करी सु धरनिय । रहे मठ कोट अफोट करंनिय ॥ ॥ छं० ॥ ३०७ ॥ रू० ॥ १४२ ॥ ॥ सारंगदेवजी की राणी गौरीजी का अनलगर्भ सहित रणथंभ पधारना ॥ दूहा ॥ गौरां चलि रनथंभ गिरि । सारंग सचौ राह ॥ प्रजा पुछंदी महिम धरि । यम्भ अनल गौराह ॥ ॥ छं० ॥ ३०८ ॥ रू० ॥ १४३ ॥ अनल अक्षा धरि गौरि सिसु । गय रनथंभ दिसान ॥ राजहव रावत पती । मातुल पष चहुवान ॥ ॥ छं० ॥ ३०९ ॥ रू० ॥ १४४ ॥ का यह वाक्यखंड "हक अहक" भी ध्यान देकर समझने योग्य है कि "हक" अथवा "हक्क" जो हिन्दी भाषा में प्रयोग होता है वह अरबी अथवा फारसी नहीं है किन्तु संस्कृत स्वक शब्द से है और "अहक" शब्द स्वतः इस बात की स्पष्ट साची देता है । इसी रूपक के छन्द २९९ से ढुंढा राक्षस की उत्पत्ति चंद कबि वर्णन करता है ॥ १४१ पाठान्तर :- रहितह । रहतहं । दिसानन । जीवक्यै । द्विग । मंत ॥ १४२ पाठान्तर :- पसरौ । अवचिय । रहै ॥ १४३-१४४ पाठान्तर :-सारंग । यभ । गौराह । यभ । रिनथंभ । राजदव । पति ॥ इन रूपकों के पढ़ने पहिले हमारे पाठकों को यह बात ध्यान में रखनी चाहिये कि बीसलदेवजी ने अपने लड़के सारंग देव जी को अपने हाथ से मार डाले थे कि जिस के पीछे वे आप भी सांप के काटने से मर गये और अजमेर अर्थात् संभर का राज्य विना राजा के रह गया और अजमेर के वन में ढुंढा नामक दावन रहने लगा किन्तु बीसलदेवजी के लड़के सारंगदेवजी की रानी गौरी के गर्भ था । राणी जी राज्य की यह दशा देखकर अपने पिता रणथंभ के राजा के यहां चली गईं और वहां सारंगदेवजी के आनल अर्थात् आना राजा उत्पन्न हुए । यह सब कथा आगे के रूपकों में जब आना राजा अपनी माता से अपने पिता का नाम और सब वृत्तान्त पूंछेंगे तब कवि माता और पुत्र के संवाद में बीसलदेवजी की कथा सविस्तर वर्णन करेगा। इन रूपकों में अभी गौरी राणी जी का सगर्भा रणथंभ जाना ही कबि ने वर्णन किया है ॥
आदि पर्व ] पृथ्थीराजरासौ । ६१ ॥ आना राजा का जन्म होना और उन का बालपन ॥ भुजंगी ॥ धरै गौर जन्मं आनल्ल राजं । बसे देव गामं दुनी कुच बाजं ॥ नवं वृत्त नित्तं नवं वृत्त सिष्यै । नरं तार तारं नवं स्रत्त भिष्यै ॥ छं० ॥ ३१० ॥ चरं संभरी वात पुच्छंत मित्तं । धरै ध्यान दिष्यै अजमेर चित्तं ॥ कला स्त्रव्व सिष्यंमछा मल्ल वीरं । गिनै मग्ग ओसं पढै मंच धीरं ॥ छं० ॥ ३११ ॥ दिनं सीह अण्वीह आखेट षिखै । ननं नेह निद्रा सुरं सिद्ध मिंखै ॥ करं पाइकं विह्न साइक्क नष्य । भरं भै अभैनं सुयं सव्व रख्यै ॥ छं० ॥ ३१२ ॥ वधै काम कामं अलीहो न भष्यै । सुमै राजसं तामसं सत्त चष्यै ॥ रवै जम्म सेना ग्रहै जम्म भारी। सुई संभरी वात दिष्यै करारी ॥ छं० ॥ ३१३ ॥ कव्है काल कालं अकालं ति बंधै । द्रुतं जोर मा वित्त सौं चित्त संधै ॥ दुच्चं वाच परचंड दुग्गं सरूपं । इसो दिष्यियै राज आना अनूपं ॥ छं० ॥ ३१४ ॥ रू० ॥ १४५ ॥ कवित्त ॥ अति बल बंड प्रचंड । हिंड आखेटक षिखै ॥ घिरन रोज वाराह । बंधि वागुव वर मिखै ॥ वन परवत्त झिरना । निवान (राइ *) राजन सँग हिँडै ॥ राग रंग (भाषा *) कवित्त । दिव्य वानी चित्त संडै ॥ हय हत्थिय देय संकै न मन । षग्ग मग्ग पूनी चढै ॥ चहुआन वंस अवतंस दूम । रंग अनेक आना रचै ॥ ॥ छं० ॥ ३१५ ॥ रू० ॥ १४६ ॥ १४५ पाठान्तर :-आनल्ल । वृत्त । नितं । बूत । भृत । बान । पुछंत । सेतं । चितं । सब । सिषं । सिपं । महामल्ल । गिनी मंगि आमें । औमें । अवीह । सिद्धं । पायकं । साइकं । नंष्ये । भरंभे अभैन सोई सब्व रख्यै । भरं भय भैनं सोई सब्वं रप्ये । भरं भेअभैनं सोयं सब्ब रख्यै । वधे । लीहो । होन । सत्तं । चषै । जमं । ग्रहे । जम । सोई । साई । सोइ । संभरि । तिबंधे । जो । रभावित्त । सों । दुर्गा । दिंषियै । अनूप ॥ इस रूपक से कविने आना राजा के जन्मादि की कथा वर्णन करना प्रारंभ किया हैं ॥ १४६ पाठान्तर :-राहू । संगे । हिंड़े । कवित्तं । संपै । रंगा । (राइ *) (भाषा *) विशेष हैं ॥
६२ · पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व ॥ आना का बालपन व्यतीत होना और वीरत्व को प्राप्त हो माता से पूछना ॥ दूहा ॥ तन मंडी मचि अप्पनी । छंडी बालक बुद्धि ॥ रोस रम्यौ अरि अंग में । तब पुच्छि मातच सुद्धि ॥ कूं०॥ ३१६ ॥ रू० ॥ १४७ ॥ ॥ आना की माता का उसको सर तर और अब्बर विद्या का उपदेश करना ॥ गाथा ॥ सर तर अब्बर विद्या । सा विद्या अन्य सारसी नथ्थी ॥ सो आना अन भंगं । संचनं प्रिय यो सष्षि ॥ कूं० ॥ ३१७ ॥ रू० ॥ १४८ ॥ जा सिसु वीरं पतनी । बीरं होइ बीर भज्जार्यं ॥ नवं तीन बत्त तरंगं । सा माग्गं वीरया पुत्तं ॥ कूं० ॥ ३१८ ॥ रू० ॥ १४६ ॥ ॥ आना का माता से पूछना कि मैं किस वंश में उत्पन्न हुआ हूं ॥ दूहा ॥ बीर पुत्त मातुल सुमति । गर्वार सपनो जाइ ॥ को किच्छि बंसहि उपज्यौ । तूं मुझ जंपहि माइ ॥ कूं० ॥ ३१६ ॥ रू० ॥ १५० ॥ ॥ गौरी माता का कहना कि यह बात न पूछो उसके कहते मुझे भय और करुणा होती है ॥ दूहा ॥ गौरि मात कहै पुत्त सौं । पुत्त न पुच्छहु बत्त ॥ जिच्छि भय जल लोचन भरहि । बर पूछन पर तत्त ॥ कूं० ॥ ३२० ॥ रू० ॥ १५१ ॥ १४७ पाठान्तर :-मत । मही । बुद्धि । पुकिय ॥ १४८-१४६ पाठान्तर :-अरकर । मंत्रनं । अनभंग । साखि ॥ १४६ ॥ धीर । भजाइं ॥ नवती नवल तरंगं । नव तीन बत्त तरंगं । नवती नव सत रंगं ॥ यह तीन प्रकार के पदच्छेद कोई २ कवि करते हैं ॥ १५० पाठान्तर :-पुत्ति । संपत्रौ । जाई । जाइं । किहिं । ऊपनौ । मांइ । भाइ ॥ १५१ पाठान्तर :-गौरी । सौ । पुत । पुछहु । जिन । भरहिं । पूछत । परतत ॥
आदि पर्ब ] ' पृथ्वीराजरासो । ६३ ॥ आना का माता से अपने बंश की कथा हठ करके पूछना ॥ पद्धरी ॥ उच्चर्यौ मात सो पुत्त सचि । जानों न वंस औ पिता बचि ॥ मैं तात नाम बंदी न लेचि । नन करों श्राद्ध कबहू न गेह ॥ कुं० ॥ ३२१ ॥ अप्यौ न चंव अंजुलिय तात । उप्यौ वेद हूं किण सु गान ॥ के नाम लेय मातुलह वंस । पित बैर लेउं बर बीर हंस ॥ कुं० ॥ ३२२ ॥ छंडौं कि प्रान मुक्कूं व देह । संसार भार अप्यौं कि छह ॥ आना नरिंद यह कहिय बात । सुनि श्रवण अप्प धर परिय मात ॥ ' कुं० ॥ ३२३ ॥ रु० ॥ १५२ ॥ ॥ आना की माता का उसे कथा प्रगट न करने को कहना और ढंक करके संक्षेप में कहना ॥ दूहा ॥ पुत्र प्रगह न कीजिये । मो तिय इय अंदेह ॥ आदि हुते दानव प्रबल । घर घुंमी असुरेह ॥ कुं० ॥ ३२४ ॥ रु० ॥ १५३ ॥ भिरन कहत दानव सरिस । मानव मनुषी देह ॥ मो गंधारि निच्चारि मुझ । पुत्त विलासनि गेह ॥ कुं० ॥ ३२५ ॥ रु० ॥ १५४ ॥ अरिल्ल ॥ इह मातुल बंस प्रधानह मान । भये दस पुत्त सु मानिक थान ॥ विचारि कयौ तहां संभरि गाम । बस्यौ अजमेर सुमंत विश्राम ॥ कुं० ॥ ३२६ ॥ रू० ॥ १५५ ॥ १५२ पाठान्तर :- उच्चयै । उच्चस्यौ । रूच्च । जानौ । मुझ । बच्छ । लैहि । कस्यौ । सु । वेदहु । किंनसु । कै । लेइ । लैऊं । लेऊ । छंडों । कै प्रांनं । मुक्कौं । ब । अकेलेह । आनां । इह । इम । कहीय । अप । वरिय ॥ १५३-५५ पाठान्तर :- पुत्र । पुत्त । प्रगट । कीजोइ । जिय । अंदेस । हुंते । असुरेस ॥ १५३ ॥ विलासन । विलास । न ॥ १५४ ॥ प्रधानह । मांन । मांनिक । थांन । गाम । सुमंत्र । विश्रांम ॥-१५५ ॥
६४ पृथ्वीराजरासो । [ आदि पर्व ॥ अन्य उपलक्ष्यों के द्वारा आना का संभारि की पूर्व कथा संभारना ॥ कवित्त ॥ घर मुक्किय वलि राय । सात खम्यौ न कित्ति रस ॥ घर मुक्किय सुअ पंड । सुष्प मुक्यौ सु दुष्प वसि ॥ घर मुक्किय श्रीराम । सिया छोड़य बल गोइय ॥ घर मुक्की नल राय ॥ सिरचि कलंकित जोइय ॥ घर मुक्कि वीर हर चंद नृप । नीच घरह घट जऊ भयौ ॥ ढंकन सु इला नृप जानियै । नृप ढंकन इलचर कयौ ॥ ॥ छं० ॥ ३२७ ॥ रु० ॥ १५६ ॥ नृप ढंकन इल होइ । इलह्र ढंकन सु राज भर ॥ एह्र ढंकन वर देव । देव ढंकन वर अंवर ॥ अपजस ढंकन कित्ति । कित्ति ढंकन जस धारिय ॥ औगुन ढंकन विद्य । सुगुन विद्या उच्चारिय ॥ ढंकनह्र काल वर भ्रंमको । भ्रंम कांह्र ढंकन करिय ॥ सावित्त गुरु ढंकै जु सिसु । सिसु ढंकन पित उच्चरिय ॥ ॥ छं० ॥ ३२८ ॥ रु० ॥ १५७ ॥ अरिल्ल ॥ इच्चि विधि आनल्ल बत्त उच्चारिय । पुहु कथा संभरि संभारिय ॥ किच्चि विधि राषस ढुंढ उपन्ना । सारंगदे कैसे जुद्ध किन्ना ॥ छं० ॥ ३२९. ॥ रु० ॥ १५८ ॥ ॥ आना का माता से पूछना कि नर अर्थात् वीसलदेव दानव कैसे हुआ ॥ दूहा ॥ एक बत्त तुम सम कहौं । मात कथा समझाइ ॥ नर किच्चि विधि दानव भयौ । इह अचरज मो आइ ॥ छं० ॥ ३३० ॥ रु० ॥ १५९ ॥ १५६-१५७ पाठान्तरः-वल । राइ । लिन्यौ । रिस । मुकीय । श्री । सुष । दुष । मुकीय । सीया । षोईय । गोईय । मुक्किय । सिरां । सिरह । कलंक । तज्यौ । जोइय । मुंकि । घरहिं । भयौ । इल । भूमि । इल वर । कयै । अप । जस । किर्ति । किर्ति । धारीय । औगन । सगुन । उच्चारीय । को । मा । वित्त ॥ १५७ ॥ बत । उच्चारीय । किहिं । अपंन्नौ । कींनौ ॥ १५८-१५९ पाठान्तरः-वत । सो । समझाय । अचरिज ॥ १५६ ॥ नौ । सो । हूं । जानियौ । नव निहचे नि संदेह ॥
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । ६७ आये बंस छतीस । विप्र बंदी जन सारे ॥ दियौ छत्र सिर तिलक । वेद संचच्च उच्चारे ॥ आधार है वह यह है कि इस ग्रन्थ में लिखे हुए संवत् संप्रत शोध हुए और मुसलमानी तवा- रीखों में लिखे हुए संवतों से नहीं मिलते । अतएव इस संवत् विषयिक झगड़े का प्रारंभ इस रूपक १६८ और छन्द ३३९ से समझना चाहिये क्योंकि रासे के जितने छन्दों में संवत् मिती कहे गये हैं उनमें से प्रथम छन्द यही है । इस से हम को विदित होता है कि संवत् ८२१ वैशाख सुदी १ शुक्रवार को बीसलदेवजी राज-गद्दी पर विराजे किन्तु इसी आदि पर्व में इस रूपक से थोड़े से ही और आगे बढ़कर हम को बीसलदेवजी के पट्टन द्विज्य करने के संवत् सूचन करनेवाले नीचे लिखे रूपक मिलेंगे:- (संवत् १८५९ की पुस्तक में) दोहा ॥ सो संवत् नव सत अटु । वरस तीस छह अग्ग ॥ पुर पट्टन बीसल नृपति । राजत सयलह जग्ग ॥ कवित्त ॥ संवत् नव सत अटु । वरस दस * तीय सत अग्ग ॥ पुर प्रविष्ट बीसल नरिंद । राजंत सयल जग्ग ॥ ( संवत् १७७० की पुस्तक में ) दोहा ॥ सो संवत् नव सत अध । वरस तीस छह अग्गि ॥ पुर पट्टन बीसल नृपति । राजत सयलह जन्नि ॥ कवित्त ॥ सर संवत् नव सत्त । वरस दस * पंच सत अग ॥ पुर प्रविष्ट बीसाल । नृपति राजंत सयल जग ॥ ( गुजरात देश की पुस्तक में ) दोहा ॥ सो संवत् नव शत अधिक । वर्ष तीस छह अग्ग ॥ पुर प्रतिष्ठ विशल नृपति । राजत सकले जग्गं ॥ जितनी पुस्तक हम इस टिप्पण के लिखते समय देख सके उन सब में ऊपर लिखे पाठ पाये अर्थात् किसी में हमारी सं० १८५९ का पाठ मिलता है तो किसी में संवत् १७७० वाली का । शोक की बात है कि हमारी १६३१ तथा १६३२ वाली पुस्तक में तो यह पर्व्व ही नहीं है और संवत् १६४७ वाली में यह पृष्ट नहीं है कि जिसमें इन छन्दों का होना सम्भव है । यह तो जानने में ही है कि पिछले रूपक १४० में चंद कह आया है कि "चौसट्टि बरस बर राज कीन" चौंसठ
- हिन्दी भाषा के ऐसे प्राचीन काव्यों में चंद जैसे महाकवियों को गूढ़ बातों को खोलने की कुंजियों में से हम एक का यहां प्रकाश करते हैं कि दश दस और दृशि दसि शब्दों का अर्थ जहां वे कुछ संख्या प्रकाश करने को प्रयोग हुए हों वहां सूक्ष्मता रखते हैं अर्थात् दश अथवा दस = १० का वाचक और दृशि अथवा दसि = शून्य ० अर्थात् केवल दहाई का वाचक होता है और जहां लेखक दोष से इन शब्दों के लिखने में गड़बड़ हो जाती है वहां संख्या में भी गड़बड़ पड़ जाती है कि इस के उदाहरण इस महाकाव्य में यहां से लेकर अनेक स्थलों में आवेंगे ॥
६८ पृथ्वीराजरासो । [ आदि पर्व आनंद अग्गवर इंद्र सम । अंग नंद जस उड्डरै ॥ अजमेर नयर अरि जेर करि । विमल राज बीसल करै ॥ कुं० ॥ ३३८ ॥ रू० ॥ १६८ ॥ बरस बीसलदेवजी ने राज्य किया । अब विद्वानों के विचार देखने जैसी बात है कि इस रूपक के संवत् को इसी प्रकरण के दूसरे रूपकों में कहे संवतों से मिलाने से एक सौ वर्ष का फरक पड़ता है और जो ९१ वर्ष का एकसा अंतर रासो में लिखे सब संवतों को संप्रत शोध से मिलाने और जो पखाने हमने पृथ्वीराजजी के शोध किये हैं उन से पड़ता है वह इस से सिवाय है । जगत का एक यह सर्व साधारण नियम है और उसका भार सब पक्षपात रहित विद्वानों पर है कि प्रत्येक समय के विद्यमान बड़े २ विद्वान सब परम पद-प्राप्त ग्रन्थकर्त्ताओं के ऊपर जो कोई व्यर्थ आक्षेप करै उस को खण्डन कर के छिन्न भिन्न कर दें क्योंकि यदि यह भार विद्वानों पर स्वतः सिद्ध न रहा होता तो सब कीट क्रिकिट सब अमूल्य ग्रन्थों को खंड कर खाजांय और बड़े २ कवियों के नामों पर पोता फेर दें। अतएव ऐसी जिम्मेदारी को शुद्ध अंतःकरण से समझने वाला कोई विद्वान क्या यह कहेगा कि भिन्न २ पुस्तकों में यह भिन्न २ अशुद्ध पाठ चंद कवि जैसा महाकवि बीसलदेवजी की तरह दानव होकर लिख गया है ? क्या इन भूलों का अपराधी चन्द है ? नहीं-नहीं-कभी नहीं । हम क्या एक छोटा सा बालक भी कह सकता है कि यह सब भूलें अयोग्य लेखक और कवियों ने जान कर अथवा अनजाने कियी हैं। अब हमारी सम्मति इस विषय में चन्द की शैली और ख्यातियों की पुस्तकों में लिखे सं० ९३१ को देखते हुए ऐसी है कि यहां ऐसा पाठ था कि “नौ सें अरु इकतीस” और इस हमारे अनुमान की पट्टन विजय करने के संवत् वाले रूपक पुष्टि करते हैं। देखो :- बीसलदेवजी का पाट बैठना ... ... ... ... ९३१ वर्ष उनका राज्य करना जोड़ो ... ... ... ... ६४ वर्ष रासो के संवतों और विक्रमी में जो सर्वत्र एकसा अन्तर है वह जोड़ो-९१ वर्ष विक्रमी संवत् = १०८६ रासो के रूपकों के जो मूल पाठ अशुद्ध हैं उनको अभी हम जैसे लिखित पुस्तकों में हैं वैसे ही रक्खेंगे क्योंकि जब तक सब विद्वान एक मत न हो जांय तब तक उनको हम पुरातत्त्व विद्या के नियमों के अनुसार बदल नहीं सक्त हैं। इस के अतिरिक्त हम पुरातत्त्व वेत्ताओं को चेत कराते हैं कि फीरोज़शाह की लाटपर की प्रशस्तियों को जब एक बार प्रथम बीसलदेवजी के और पृथ्वीराजजी के चरित्रों को भले प्रकार ग्रंथान्तरों में पढ़कर उन आशयों के सहारे से फिर विचारें तौ उन को मालूम हो सकेगा कि पहिली प्रशस्ती जिस में का नीचे लिखा अनुवाद है उस को बीसलदेवजी को नहीं समझना चाहिये किन्तु पृथ्वीराजजी की समझना उचित है और केवल यही विशेष समझना होगा कि बीसलदेवजी के उपलक्ष्य का संबन्ध उस में इतना ही है कि जिस मिती को वह प्रशस्ती निर्माण हुई है वह मिती बीसलदेवजी के पाट बैठने की है अर्थात् वैशाख शुदी १ और पृथ्वीराजजी को बीसलदेवजी का अवतार होना लोग मानते हैं अतएव इन प्रशस्तियों के लिखने वालों ने अपने इस गूढ़ भाव को प्रकाश करने में उन दोनों का सादृश्य दिखाया
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ६६ ॥ बीसलदेवजी का अंत समय पट्टन विजय करने को छत्र धारणा करना ॥ दूहा ॥ वर पहन अहन अमित । समित वेद फुनि राज ॥ समय अंत बीसल सिरह । धस्यौ छत्र सम साज ॥ ॥ कूं० ॥ ३४० ॥ रू० ॥ १६६ ॥ पद्धरी ॥ सिर धारि छत्र वीसल नरिंद । आसनह सिंघ वर वरन इंद ॥ भूदेव मंडि वेदी विसाल । रस पंच मेधि मेलेँ ति काल ॥ कूं० ॥ ३४१ ॥ वर बढी ज्वाल खंडन विभाग । जमि रहे जमत्त पुट पञ्जति लाग ॥ मष समुष दिष्व परस्पर वैन । तिन पुटह बीच तन धूम औन ॥ कूं० ॥ ३४२ ॥ जानीत वेद मुख रहै मैंान । सुभ समय असुभ उच्चार कौंन ॥ संपूर् वेद किन्ने भिषेक । दुज दय वंदि आसिष अषेष ॥ कूं० ॥ ३४३ ॥ बिधि औन राज दिय सु जप माल । जै जया सबद बीसल भुच्चाल ॥ ॥ कूं० ॥ ३४४ ॥ रू० ॥ १७० ॥ है कि जिस से निर्णय करने में यह झगड़ा पड़ जाता है कि अमुक प्रशस्ती पृथ्वीराजजी की है अथवा बीसलदेवजी की । हमारे पास इन प्रशस्तियों संबन्धी सन्न संज प्रस्तुत नहीं है और न इतना अवकाश है नहीं तो हम ही परिश्रम करके कुछ विशेष सारांश प्रकाश करते । इस के अतिरिक्त जो सं० १२३० जैसी प्रशस्तियों को वीसलदेवजी की मानें तो फिर पृ थ्वीराजजी को तेरहवें शतक में मानना पड़ेगा कि उस दशा में भी पृथ्वोराज जी चितोड़ की और आबू की प्रशस्तियों के अनुसार रावल समरसीजो के समकालीन होंगे और मुसलमानी तवारीखों के सन झूठे ठहर कर संशत प्रसूत हुई तर्क के अनुसार मुसलमानी तारीख जालीं सिद्ध होंगी ॥ ' Om. In the year 1230, on the first day of the bright half of the month Vaishakh. (a monument) of the Fortunate-Visal-Deva,-son-of-the-Fortunate-Amilla-Deva- King-of-Sacumbhari, Popular Ed. of the Asiatic Researches, page 315. पाठान्तर :-पाठ । बर । वर । प्रतिपादा । प्रतीपदौ । छत्तीस । सारै । दीयौ । उच्चारे । नैर ॥ १६६ पाठान्तर :-पुनि । समैं । सरह । धैयौ । जास ॥ १७० पाठान्तर :-मंडि । छत्रधारि । घंवरन । इंद्र । मधि । मेले । मले । मेलिय । वढिय । वटी । दिपिं । बेन । पुट । हबी । चतन । औन । रहे । मोंन । शुभ । अशुभ । कोंन । कीनो । बंध । बंधि । एन । शद्द । भूवाल ॥
९० पृथ्वीराजरासौ। [ आदि पर्व ॥ बीसलदेवजी पाट बैठकर कैसे राज करते थे ॥ दूहा ॥ लसय पाट बीसल नृपति । विकल दूच्छ घन सार ॥ पंडन चिय दंडन करै । बिन अपराध अनार ॥ ॥ छं० ॥ ३४५ ॥ रू० ॥ १७१ ॥ कवित्त ॥ दूसौ बीर बीसल । नरिंद अजमेर नैर पर ॥ रचि रचना पुर दिव्य । मनौं विसक्रम कीय कर ॥ अध्रम भ्रम उपेरै । क्रम दुक्ति मन इच्छै ॥ हक्क द्रव्य संग्रहै । विना हक लोभन वंछै ॥ चव बरन सरन चहुआन कै । वंस छत्तिस सेवंत छी ॥ बीसल नरिंद अंमाधिधरि । देव कला देवत्त ही ॥ ॥ छं० ॥ ३४६ ॥ रू० ॥ १७२ ॥ ॥ बीसलदेवजी का अपने पुत्र सारंगदेवजी को उपदेश करके सांभर भेजना कि जो अपनी धा-बैन के पति के विनाश से दुचित हो गये थे ॥ कवित्त ॥ पट रागिनि परिच्छार । ग्रभ्य सारंग उपन्नौ ॥ पुत्र होत भइ मृत्य । बाल बानिक कौं दिन्नौ ॥ १७१ यह रूपक संवत् १७१० और १६४७ की पुस्तकों में तो नहीं है किन्तु सं० १८५९ तथा सोसाईटी की छापी हुई पुस्तकों में है । जब कि इन से भी बहुत पुरानी पुस्तकों में यह न मिले तब तक उस को क्षेपक संज्ञा हम नहीं दे सक्ते यहां यह भी समझ लेने योग्य बात है कि १६९ रूपक से १७० रूपक तक बीसलदेवजी की पाटन की चढ़ाई के लिये छत्र धारण करने का वर्णन है । प्राचीन समय में जब कि राजा किसी पर चढ़ाई करते थे तौ छत्र धारण विधि का वैदिक कर्म करके प्रस्थान करते थे । पाठकों को यह बीसलदेवजी की कथा बहुत सावधानता से पढ़ना चाहिये क्योंकि इस के बीच २ में उन के लड़के सारंगदेवजी आदि के भी वृत्त आते जाते हैं परंतु उन सब को कवि ने बीसलदेवजी के वृत्तों में मिलाकर वर्णन किये हैं ॥ पाठान्तर :—इछ । १७२ पाठान्तर :—बीसल । नेर । मनौं । विश्वक्रम्म । विसकम्म । विसकर्म । करि । अधर्म । भ्रम । ऊपरै । श्रम । दुक्ति । नन । इछै । विनां । हक्क । लोभ । न । चकौच । चहुवांन । छतीस । छत्तीस । अधाधिधार । देव । तही ॥ १७३ पाठान्तर :—पाट । रानि । ग्रभ । उपनौ । भय । मृत्ति । कां । दीनों । वनिकं । दि नौ । सम । पै । इक्क । लगैं । कीयौ । वीना । हुवे । गये । बिनस्सयौ ।
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ७५ ता वानिक नंदिनिय । नाम गौरी सारँग सन * ॥ इक्क थांन पय पान । इक्क सिज्या इक आसन ॥ नव वरस लगिग कन्या रच्ची । व्याह राज बीसल कियौ ॥ वीवाह हुओ वर वन गयो । तहां सिंघ वर विनसयौ ॥ छं० ॥ ३४७ ॥ रु० ॥ १७३ ॥ दूहां ॥ सिंघ विनासौ वनिक सुत । कन्या किया अंदोह ॥ वृत्त धस्यौ ब्रह्मचर्य को । तप पहुकर तजि मोह ॥ छं० ॥ ३४८ ॥ रु० ॥ १७४ ॥ पद्धरी ॥ अति दुचित्त भयौ सारंग देव । नित प्रत्ति करै अरहंत सेव ॥ बुध अम्म लियौ बंधै न तेग † । सुनि श्रवन राज मन भौ उदेग ॥ छं० ॥ ३४९ ॥ बुझाइ कुंच्अर सनमान कीन । किचि काज तुम्झ हूद्द अम्म लीन ॥ तुम इंडि सरम हम कछौ वत्त । वांनिक पुत्त इन तैं दुचित्त ॥ छं० ॥ ३५० ॥ दूह नष्ट ग्यांन सुनियै न कान । पुरपातन भज्जै कित्ति छान ॥ तुम राज बंस राजनह संग । मृगया सर खेलौ वन दुरंग ॥ छं० ॥ ३५१ ॥ परबोध तजो बोधक पुरान । रामाइन सुन भारथ निदान ॥ अभिमान दान रिन सरन अम्म । चास्यौ प्रकार सुनि राज क्रम्म ॥ छं० ॥ ३५२ ॥ परबोध मानि राजन कुमार । तत काल मंगि वंधे हथ्यार ॥ भय प्रसन राज कीनौ पसाव । संभरि रजधानी करहु जाव ॥ छं० ॥ ३५३ ॥ गजराज पाट हैं वर उतंग । सिंघासन दीनो जटिल नंग ॥ तुम जाहु कुंच्अर संभरिय थान । किरपाल करिय कायथ प्रधानं ॥ छं० ॥ ३५४ ॥ प्रोचित मुकंद ‡ सारँग चुहान । साचौर धनी नरसिंघ भान ॥ धंधार जार वच्चवल बलोच । दिय बहुत हसम कौयौ न सोच ॥ छं० ॥ ३५५ ॥
- यह पाठ हम ने सं० १६४७ तथा १७१० की पुस्तकों से रक्खा है इधर की सब पुस्तकों में सम पाठ है । सनोतिषणुदाने तथा चि० अखपिंडते ॥ अथवा सं० सून वा सूनु का अपभ्रंश है ॥ १७४ पाठान्तर :- कंन्या । कीयौ । वृत । धर्यो । पुहुकर ॥ † हिं० तेग from Sk. (तैग्म-(तिग to assail, to seek, to injure, to attempt to kill) or तिग्म = sharp as a weapon) इसी तरह हिं० तेज is not from the A. Tayz or P. Tez, but from the Sk. तेज m. Sharpness, pungency sharpness of a weapon. Brilliance. Spirit. ‡ यह नागर जाति का ब्राह्मण था ॥ १७५ पाठान्तर :- प्रति । ध्रम । कीयौ । बंधे । स्रवनं । भयं । बुलाय । कुवर । तुम । ध्रम । धर्मै । वृत । बानिकं । तैं । दुचित्तं । ग्यांन । सुनियें । सुनीयेँ । कानं । भैं । छित्ति ।
७२ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व अनेक जाति उमराव सध्य । द्वै गौ नर बाचन सुतर रथ्थ ॥ तिन्हि बार धाय बानिक बुलाय । जिन जाहु कुँअर की सध्य काय ॥ छं० ॥ ३५६ ॥ तुम कियौ पुच सौं सेक मुंड । षिखि बैन कयौ कहा देहुँ दंड ॥ अजमेर मेल्हि संभरि दिसान । जो जाहु तब्ब षंडौ परान ॥ छं० ॥ ३५७ ॥ इतनी कथिय नृप चल्यौ सध्य । रथ च्यार भरे मिन वार अध्य ॥ जोजनह एक कीनौ मिलान । अनेक अष तहां षान पान ॥ छं० ॥ ३५८ ॥ भय प्रात प्रसन पग लग्गि पुत्त । चलि सीष अंगि संभरि पहुत्त ॥ सर जाय पहूचिय संभ राय । मन वच सुद्ध करि क्रम नाय ॥ छं० ॥ ३५८ ॥ दस मछिष भँजि तहां बन्नि सु दीन । जज होम धोम सुर प्रसन कीन ॥ कीनौ प्रवेस सुर मच्छिम मैलि । तोरन कलस बंधि राज पौलि ॥ छं० ॥ ३६० ॥ रु० ॥ १७५ ॥ कवित्त ॥ किय प्रवेश सारंग । देव संभरिय थान थिर ॥ आयेहु वैश्य षिचिथ । अनेक पग लग्गि नम्सि नर ॥ तब कायथ किरपाछ । सबन कौं आग्या दीनी ॥ सस्त्र वस्त्र दत वित्त । देय दिह्लासा कीनी ॥ जद्दवनि गौरि आइय जबहि । पाइ लगी परमार कै ॥ नव सगुन भए सगुनी कह्यौ । कुँअर होइ कुम्मार कै ॥ छं० ॥ ३६१ ॥ रु० ॥ १७६ ॥ दूहा ॥ देवराज रावत सुता । देवत्तनि जहौंन ॥ गौरि नाम सारंग वर । मनरति म्वरति जौन ॥ छं० ॥ ३६२ ॥ रु० ॥ १७७ ॥
पेलो । सुनहुं । रिण । श्रम । चाल्यों क्रम । कुंआर । बंधे । हथ्यार । हुब । प्रसत्र । रजधान संभरिय करह जाव । हैं । कुमार । यांन । करीय । प्रधांन । सारंग । चुहांन । चैहान । धनीय । भांन । दिये । हसंम । कियौ । वांनिक । बुलाई । सथ । सों । मूठ । षन । कह्यो । दिसांन । खरांन । कथ । सथ । मध्य । सथि । जोजन । अरक । लगि । पहुंच । बच । नादू । भंजि । बली । प्रसन्न । तोरंन कलस बंधेति पोल ॥ १७६ पाठान्तर :-थांन । आय । आइ । षित्रि । कों । आथा । ससत्र । शस्त्र । चित्त । दिलासा । किनो । जदवनि । पाय । कुंअर । कुंमार ॥ १७७ पाठान्तर :-देवर्तनि । जदौन । मनो । रनि । मनोरति ॥
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । ७३ ॥ बीसलदेवजी का मृगया से बाहुरना एक तलाव बनाने की आज्ञा देना और दरबार करना ॥ दूहा ॥ तब बाहुरि बीसल नृपति । मृगया खेलत बन्न ॥ देखि थान सर * उद्धरन । मतौ उपान्यौ मन्न ॥ छं० ॥ ३६३ ॥ रू० ॥ १७८ ॥ पद्धरी ॥ तब देखि नरिन्द अनूप ठाम । निर्झर गिरिन्द वन अभिराम ॥ बुद्धाय लिए मंची प्रधान । सर * रचै इहां पहुकर समान ॥ छं० ३६४ ॥ फरमाय † काम अप आय गेह । आनंद अंग उपज्यों अछेद ॥ बैठौ सिंहासन धम्म नंद । बीसल नरिन्द नर लोक इंद ॥ छं० ॥ ३६५ ॥ सिर छत्र पास दुय चमर ढार । अति रूप जानि अस्वनि कुमार ॥ आईय सु कुलि छत्तीस नाम । पावासर तोवर गौर राम ॥ छं० ॥ ३६६ ॥ हजूर लए राजन बुलाइ । तंबोलि दियो सनमुख्य चाइ ॥ पढि बंदि छंद बोले विरद । मुसकाय सीस नायौ नरिन्द ॥ छं० ॥ ३६७ ॥ सब सभा पूरि जैसैं नखित्त । चहुआन बीच जनु चंद रत्त ॥ सनमान करे सब दइय सीष । फिरि बंदी जन दीनी असीष ॥ छं० ॥ ३६८ ॥ निसि गई पंच पल ण्क जाम । राजन महल्ल ‡ प्रवेस ताम ॥ करपूर अगर मृगमद सु वास । सैंधे छिरकिक उत्तिम अवास ॥ छं० ॥ ३६६ ॥ रू० ॥ १७८ ॥ * यह बीसल का तालाब अब तक अजमेर के पास विद्यमान है । उस के किनारे पर जहांगीर बादशाह ने एक महल बनाया था कि जिस में उस ने इंगलिस्तान के बादशाह जेम्स पहिले के एलची से मुलाक़ात कियी थी । इस टिप्पण को हमने इस तालाब के किनारे पर खड़े होकर लिखी है । यदि कोई पुरातत्ववेत्ता इस तड़ाग की वर्त्तमान दशा अपनी आंख से देखे तो उस को बड़ा शोक और आश्चर्य होगा कि अंग्रेज सरकार के राज्य समय में ऐसे प्राचीन स्थलों के जीर्णोद्धार राज-कोष के द्रव्य से होता है परंतु रेलवाले अपनी रेल इस पर दौड़ा २ कर उस को छिन्न भिन्न कर डालते हैं कि पांच सात वर्ष पीछे वह समूल नष्ट हो जायगा। हमारी सम्मति में यह विषय पुरातत्ववेत्ता विद्वानों और समस्त भारतप्रजा को सरकार हिन्द की सेवा में मिमोरियल करने जैसा है कि जिस से यह ऐतिहासिक चिन्ह यथास्थित बना रहे। † यह भी हिन्दी शब्द है संस्कृत स्फुरितम् अथवा स्फूर्तिः = स्फुरणे, मनसः कल्पनायाम् से ॥ ‡ यह भी हिन्दी है संस्कृत महल्ल = अंतःपुर inner appartments, palace. और मह- ल्लिकः = अंतःपुर रक्षक से ॥ १७८ पाठान्तरः-नृपति । वन । यांन । मतौ । मन ॥ १७९ पाठान्तर :-नरिंद । निझर । नर्झरन । गिरंद । अभिराम । बुलाय । लये । रचो । समानं । बैठो । सुसिंघासन । धर्म । नरिंद । समीप । दोय । जानि । अश्वनि । आदय । कुली । छतीस । ताम । पावा- सिर । तूंवरं । बुलाय । बुलाहि । दीयो । सनमुख । चाहि । चाय । छंद । वंदि । विरद । नाम्यो । जैसें । चहुवान । सनमान । दईय । जांम । राजन । धाम । कर्पूर । सोंधे । छिरकि । उत्तम ॥