पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआदि पर्व ] पृथ्विराजरासो । ५६ ॥ ढुंढा दानव की उत्पत्ति और उस का अजमेर के वन में रहना ॥ कत्या कदस्स उर असुर रज्जि । घर ढुंढ नाम दानव उपज्जि ॥ कं० ॥ २९९ ॥ जगि जोग नयर जुगनीय थान । पुज्जै सु आय उग्गति विच्छान ॥ रथ च्यार चक्र उत्तंग बाह्र । असि असिय चय्य मुष अग्ग दाह ॥ कं० ॥ ३०० ॥ संभरिय धरा धरनीय ठाच । पुक्कस्यौ नरनि रे जाहु जाच ॥ सिर कोपि रीस धुनि दसन बज्जि ॥ उभरे घग्ग जनु इंदू गज्जि ॥ कं० ॥ ३०१ ॥ प्राचार पाय धुकि धरनि धुज्झि । पुर नयररुद्र उर हक्कि बज्जि ॥ कंपी सु भूमि नव खंड मान । जज्जरिय नाव ज्यौं बाय पान ॥ कं० ॥ ३०२ ॥ लगै न पलक्क द्रग देव चच्छि । डक्कै डकार द्रगपाल गच्छि ॥ दिष्यौ सरूप दानव उतंग । वैराट रूप धरि धस्यौ अंग ॥ कं० ॥ ३०३ ॥ पंषीरु द्रग्ग नर स्त्रप्प भाजि । आघात सह दानव सु गाजि ॥ चिंत चिंत चिंत जुग्गनि प्रधान । पुज्जै सु आनि उग्गति विच्छान ॥ कं० ॥ ३०४ ॥ चहुआन रूप दानव प्रमान । भज्यौ सु पुच आबू सथान ॥ ॥ कं० ॥ ३०५ ॥ छ० ॥ १४० ॥ (दामोदरजी) १३५ रामचंद्रजी १३६ संग्रामसिंहजी १३७ शिवदत्तजी (श्यामदत्तजी) १३८ भोगाद- त्तजी १३९ शिवदत्तजी १४० रुद्रदत्तजी १४१ ईश्वरजी १४२ उमादत्तजी १४३ चतुरजी १४४ सोमेश्वरजी पहिले (इन के दो लड़के भरथजी १ और उरथजी २ उन में से भरथजी पाटवी के वंश में पृथ्वी- राजजी हुवे और उरथजी के वंश में बूंदी और कोटा आदि के हाड़ा चौहान हुए हैं) १४५ भरथजी १४६ मुकुटजी १४७ ॥ इसके छन्द २८८ की पहिली तुक के पहिले पाद "सुत मोहसिंह वर मोह रूप ।" में कवि का गूढ आशय यह समझना आवश्यक है कि वह उसमें तीन नाम वर्णन करता है मोह- सिंह (सिंहदेवजी) सिंहवर और मोहनरूप कि जिसके सिंह शब्द को अर्थ करने के समय मोह शब्द के साथ और वर के साथ दोबार लगाने से पृथक दो नाम सिद्ध हो जाते हैं अतएव हमने सिंह शब्द के नीचे दो लकीर करी हैं। और इसी तरह छन्द २९१ की पहिली तुक के दूसरे पाद में "प्रथव" शब्द से पृथ्वीराज नामक का निःसन्देह ग्रहण षट् भाषा में व्युत्पन्न विद्वान कर सक्ते हैं । तदनन्तर बीसलदेवजी के जो वृत्त चंद ने जैसे के तैसे उत्तापित होकर लिखे हैं उनको मनन करने से विद्वान पाठक सहज ही में यह अनुमान कर सक्ते हैं कि यद्यपि चंद उनके कुल का वंश परंपरा से राज-कवि था परन्तु वह निःसंदेह बड़ा ही स्पष्ट-वक्ता और पक्षपात रहित पुरुष था क्योंकि आज इस उनीसवीं शताब्दी में भी जब कि स्वतंत्रता और सभ्यता का सूर्य पूर्ण प्रकाशित होरहा है तब भी कोई राज-कवि ऐसा स्पष्ट-वक्ता और पक्षपात रहित अपने यजमान की दुर्गतियों को उसके भावी संतानों के शिक्षार्थ निडर होकर प्रकाश करने वाला प्रायः किसी के दृष्टि न आया होगा । इस के साथ भाषाओं के शोध करने वाले विद्वानों को चंद