पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 73, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ें६० पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व दूहा ॥ खो दानव अजमेर वन । रचि तह दिन घन अंत ॥ शून्य दिसान न जीव कौ । थिर थावर द्रिगभंत ॥ ॥ छं० ॥ ३०६ ॥ रू० ॥ १४१ ॥ मुरिच्छ ॥ संभरि सोर नरिंदच संभरि । पंथ प्रजा पसरै रन जंगर ॥ रम्य अरम्य करी सु धरनिय । रहे मठ कोट अफोट करंनिय ॥ ॥ छं० ॥ ३०७ ॥ रू० ॥ १४२ ॥ ॥ सारंगदेवजी की राणी गौरीजी का अनलगर्भ सहित रणथंभ पधारना ॥ दूहा ॥ गौरां चलि रनथंभ गिरि । सारंग सचौ राह ॥ प्रजा पुछंदी महिम धरि । यम्भ अनल गौराह ॥ ॥ छं० ॥ ३०८ ॥ रू० ॥ १४३ ॥ अनल अक्षा धरि गौरि सिसु । गय रनथंभ दिसान ॥ राजहव रावत पती । मातुल पष चहुवान ॥ ॥ छं० ॥ ३०९ ॥ रू० ॥ १४४ ॥ का यह वाक्यखंड "हक अहक" भी ध्यान देकर समझने योग्य है कि "हक" अथवा "हक्क" जो हिन्दी भाषा में प्रयोग होता है वह अरबी अथवा फारसी नहीं है किन्तु संस्कृत स्वक शब्द से है और "अहक" शब्द स्वतः इस बात की स्पष्ट साची देता है । इसी रूपक के छन्द २९९ से ढुंढा राक्षस की उत्पत्ति चंद कबि वर्णन करता है ॥ १४१ पाठान्तर :- रहितह । रहतहं । दिसानन । जीवक्यै । द्विग । मंत ॥ १४२ पाठान्तर :- पसरौ । अवचिय । रहै ॥ १४३-१४४ पाठान्तर :-सारंग । यभ । गौराह । यभ । रिनथंभ । राजदव । पति ॥ इन रूपकों के पढ़ने पहिले हमारे पाठकों को यह बात ध्यान में रखनी चाहिये कि बीसलदेवजी ने अपने लड़के सारंग देव जी को अपने हाथ से मार डाले थे कि जिस के पीछे वे आप भी सांप के काटने से मर गये और अजमेर अर्थात् संभर का राज्य विना राजा के रह गया और अजमेर के वन में ढुंढा नामक दावन रहने लगा किन्तु बीसलदेवजी के लड़के सारंगदेवजी की रानी गौरी के गर्भ था । राणी जी राज्य की यह दशा देखकर अपने पिता रणथंभ के राजा के यहां चली गईं और वहां सारंगदेवजी के आनल अर्थात् आना राजा उत्पन्न हुए । यह सब कथा आगे के रूपकों में जब आना राजा अपनी माता से अपने पिता का नाम और सब वृत्तान्त पूंछेंगे तब कवि माता और पुत्र के संवाद में बीसलदेवजी की कथा सविस्तर वर्णन करेगा। इन रूपकों में अभी गौरी राणी जी का सगर्भा रणथंभ जाना ही कबि ने वर्णन किया है ॥