पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 82, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंआदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ७५ ता वानिक नंदिनिय । नाम गौरी सारँग सन * ॥ इक्क थांन पय पान । इक्क सिज्या इक आसन ॥ नव वरस लगिग कन्या रच्ची । व्याह राज बीसल कियौ ॥ वीवाह हुओ वर वन गयो । तहां सिंघ वर विनसयौ ॥ छं० ॥ ३४७ ॥ रु० ॥ १७३ ॥ दूहां ॥ सिंघ विनासौ वनिक सुत । कन्या किया अंदोह ॥ वृत्त धस्यौ ब्रह्मचर्य को । तप पहुकर तजि मोह ॥ छं० ॥ ३४८ ॥ रु० ॥ १७४ ॥ पद्धरी ॥ अति दुचित्त भयौ सारंग देव । नित प्रत्ति करै अरहंत सेव ॥ बुध अम्म लियौ बंधै न तेग † । सुनि श्रवन राज मन भौ उदेग ॥ छं० ॥ ३४९ ॥ बुझाइ कुंच्अर सनमान कीन । किचि काज तुम्झ हूद्द अम्म लीन ॥ तुम इंडि सरम हम कछौ वत्त । वांनिक पुत्त इन तैं दुचित्त ॥ छं० ॥ ३५० ॥ दूह नष्ट ग्यांन सुनियै न कान । पुरपातन भज्जै कित्ति छान ॥ तुम राज बंस राजनह संग । मृगया सर खेलौ वन दुरंग ॥ छं० ॥ ३५१ ॥ परबोध तजो बोधक पुरान । रामाइन सुन भारथ निदान ॥ अभिमान दान रिन सरन अम्म । चास्यौ प्रकार सुनि राज क्रम्म ॥ छं० ॥ ३५२ ॥ परबोध मानि राजन कुमार । तत काल मंगि वंधे हथ्यार ॥ भय प्रसन राज कीनौ पसाव । संभरि रजधानी करहु जाव ॥ छं० ॥ ३५३ ॥ गजराज पाट हैं वर उतंग । सिंघासन दीनो जटिल नंग ॥ तुम जाहु कुंच्अर संभरिय थान । किरपाल करिय कायथ प्रधानं ॥ छं० ॥ ३५४ ॥ प्रोचित मुकंद ‡ सारँग चुहान । साचौर धनी नरसिंघ भान ॥ धंधार जार वच्चवल बलोच । दिय बहुत हसम कौयौ न सोच ॥ छं० ॥ ३५५ ॥
- यह पाठ हम ने सं० १६४७ तथा १७१० की पुस्तकों से रक्खा है इधर की सब पुस्तकों में सम पाठ है । सनोतिषणुदाने तथा चि० अखपिंडते ॥ अथवा सं० सून वा सूनु का अपभ्रंश है ॥ १७४ पाठान्तर :- कंन्या । कीयौ । वृत । धर्यो । पुहुकर ॥ † हिं० तेग from Sk. (तैग्म-(तिग to assail, to seek, to injure, to attempt to kill) or तिग्म = sharp as a weapon) इसी तरह हिं० तेज is not from the A. Tayz or P. Tez, but from the Sk. तेज m. Sharpness, pungency sharpness of a weapon. Brilliance. Spirit. ‡ यह नागर जाति का ब्राह्मण था ॥ १७५ पाठान्तर :- प्रति । ध्रम । कीयौ । बंधे । स्रवनं । भयं । बुलाय । कुवर । तुम । ध्रम । धर्मै । वृत । बानिकं । तैं । दुचित्तं । ग्यांन । सुनियें । सुनीयेँ । कानं । भैं । छित्ति ।