पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 81, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ें९० पृथ्वीराजरासौ। [ आदि पर्व ॥ बीसलदेवजी पाट बैठकर कैसे राज करते थे ॥ दूहा ॥ लसय पाट बीसल नृपति । विकल दूच्छ घन सार ॥ पंडन चिय दंडन करै । बिन अपराध अनार ॥ ॥ छं० ॥ ३४५ ॥ रू० ॥ १७१ ॥ कवित्त ॥ दूसौ बीर बीसल । नरिंद अजमेर नैर पर ॥ रचि रचना पुर दिव्य । मनौं विसक्रम कीय कर ॥ अध्रम भ्रम उपेरै । क्रम दुक्ति मन इच्छै ॥ हक्क द्रव्य संग्रहै । विना हक लोभन वंछै ॥ चव बरन सरन चहुआन कै । वंस छत्तिस सेवंत छी ॥ बीसल नरिंद अंमाधिधरि । देव कला देवत्त ही ॥ ॥ छं० ॥ ३४६ ॥ रू० ॥ १७२ ॥ ॥ बीसलदेवजी का अपने पुत्र सारंगदेवजी को उपदेश करके सांभर भेजना कि जो अपनी धा-बैन के पति के विनाश से दुचित हो गये थे ॥ कवित्त ॥ पट रागिनि परिच्छार । ग्रभ्य सारंग उपन्नौ ॥ पुत्र होत भइ मृत्य । बाल बानिक कौं दिन्नौ ॥ १७१ यह रूपक संवत् १७१० और १६४७ की पुस्तकों में तो नहीं है किन्तु सं० १८५९ तथा सोसाईटी की छापी हुई पुस्तकों में है । जब कि इन से भी बहुत पुरानी पुस्तकों में यह न मिले तब तक उस को क्षेपक संज्ञा हम नहीं दे सक्ते यहां यह भी समझ लेने योग्य बात है कि १६९ रूपक से १७० रूपक तक बीसलदेवजी की पाटन की चढ़ाई के लिये छत्र धारण करने का वर्णन है । प्राचीन समय में जब कि राजा किसी पर चढ़ाई करते थे तौ छत्र धारण विधि का वैदिक कर्म करके प्रस्थान करते थे । पाठकों को यह बीसलदेवजी की कथा बहुत सावधानता से पढ़ना चाहिये क्योंकि इस के बीच २ में उन के लड़के सारंगदेवजी आदि के भी वृत्त आते जाते हैं परंतु उन सब को कवि ने बीसलदेवजी के वृत्तों में मिलाकर वर्णन किये हैं ॥ पाठान्तर :—इछ । १७२ पाठान्तर :—बीसल । नेर । मनौं । विश्वक्रम्म । विसकम्म । विसकर्म । करि । अधर्म । भ्रम । ऊपरै । श्रम । दुक्ति । नन । इछै । विनां । हक्क । लोभ । न । चकौच । चहुवांन । छतीस । छत्तीस । अधाधिधार । देव । तही ॥ १७३ पाठान्तर :—पाट । रानि । ग्रभ । उपनौ । भय । मृत्ति । कां । दीनों । वनिकं । दि नौ । सम । पै । इक्क । लगैं । कीयौ । वीना । हुवे । गये । बिनस्सयौ ।