पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 69, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ें५६ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्वे
ता सुअन सूर सामंतदेव । अरिसंत मत्त मत्ता जु रेव ॥ महदेव सुअन सोहंत तास । सु प्रसन्न ईस सेवंत जास ॥ छं० ॥ २८४ ॥ बर अजयसिंह सिंघच्च सु राम । नर बीरसिंह संग्राम ताम ॥ सुअ बिंदसूर उद्धारचार । आलोक श्रीय संकाविदार ॥ छं० ॥ २८५ ॥ सुअ बैरसिंह वैरी बिहंड । ध्रुव बीरसिंह अरि बीर डंड ॥ अरिमंत सकल कलि कलन चूर । मानिकं राव चहुआन सूर ॥ छं० ॥ २८६ ॥ ॥ महिसिंहजी से धर्मधिराजजी तक का वर्णन ॥ राजत्त * सुअन ता सहस मध्य । महसिंह सिंघ संग्राम पथ्य * ॥ सुअ चंद्रगुप्त सम चंद्ररूप । प्रतापसिंह आरेन दूप ॥ छं० ॥ २८७ ॥
नूप । तत । पूर । बालंन । प्रथम । जग । दुप । पहु । मंह । रत । कोडी । कियो । चल्यौ । प्रमान । मांन । थांन । चल्यो । मुकजो । मुक्कयौ । निगम । मुक्क्यो । जित । किति । चौसठि । चित । पायौ । जंम । बिप्र । जंम । कदम । कदम । दानेवसल । यांन । स । आनि । उगात । उगात । उतंग । पुकस्यान । जरन । जाहुजाहु । जाह जाह । इन्द । सं० १७७० और १६४७ में "नैर पुर रुद्र डरि हक बजि । मांनि । जज्जेरी । जज्जरीय । पांनि । लगे । डके । सुरूप । मृग । सर्प । अप्प । अप । सद । पुज ॥
-
- पक्षपात रहित वृद्ध और विद्वान कवि कहते हैं कि यहां अर्थात् छंद २८६ और २८७ के बीच में कितनेक छंद लोप हो गये हैं किन्तु चंद कवि ने तो मूल पुरुष श्री चहुवानजी से लेकर पृथ्वीराजजी तक पीढ़ावली वर्णन कियी थी कि जिन को सब ऐतिहासिक ग्रंथ और सर्वसा- धारण मनुष्य हिन्दुओं का अंतिम बादशाह होना प्रकाश करते और मानते हैं। और क्वचित् चंद का नाम विध्वंस करने वाले यह कहते हैं कि ग्रंथकर्त्ता ने अपने अज्ञात होने के कारण खंड विखंड वंशावली वर्णन कियी है। इन दोनों सम्मतियों में से हम पहिली से सम्मत हैं क्योंकि प्रथम तो चंद कवि अपने वंश परंपरा से इस राजकुल का मुख्य कवि और ख्यात वर्णन करने वाला था और यह कदापि संभव नहीं है कि आज तो हम चौहान वंश की शुद्ध अथवा अशुद्ध पीढ़ावली जान सकें और हम से सात सौ वर्ष पहिले जो उक्त राजकुल का निज कवि हुवा वह न जानता हो और न वर्णन करै । दूसरे चहुवान वंश की पीढ़ावली जो श्रीमान् श्री बूंदी राव राजाजी महोदय ने निश्चय कराई है और जो एक चहुवान वंश मात्र की पीढ़ावली हम भी सन् १८७३ से सिद्ध कर रहे हैं और वह बूंदी वाली से विशेषांश में मिलती हुई है उन दोनों के अनुसार श्री चहुवानजी से. पृथ्वीराजजी एक सौ सतहत्तरवीं १७७ पीढ़ी में हुए सिद्ध होते हैं। अब यहां सूक्ष्म बुद्धि से विचार कर देखने की बात है कि छंद २८२ से २८६ तक में जो तेरह १३ नाम क्रम से कवि ने कहे हैं वह उक्त दोनों वंशावलियों से बराबर मिलते हैं और "राजत्त सुअन ता सहस मध्य" का अर्थ इन प्रथम माणिक्यराजजी के विषय में घट नहीं सक्ता क्योंकि इतना वंश यहां तक बढ़ नहीं सक्ता। इस के सिवाय जो पाठक चहुवान वंश की इस परम प्रसिद्ध कथा को जानते होंगे कि तीसरी पीढ़ी में अहादेवजी जिनका उपनाम परभंजनजी भी है उनके हाथ से अनजाने प्रमाति ऋषि की एक गाय मर गई थी कि जिस पर ऋषि ने शाप दिया था कि "तुम्हारा वंश नाश हो" तदनन्तर ऋषि को