पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । ५७ सुत सोच सिंघ बर मोह रूप । भूतह भयंक रन रत्त भूप ॥ सुत सेनराइ बह लेन वंत । संप्रति राइ सुभ तत्त संत ॥ छं० ॥ २८८ ॥ सुअ नागहस्त सस नाग राज । अस्यून्त नंद आनंद राज ॥ गिर लोहधीर सुत भ्रम्ममार । सुअ बीरसिंघ संकाबिडार ॥ छं० ॥ १८९ ॥ सुअ विबुधसिंघ सम जोगसूर । जस चंदराय बर अजस दूर ॥ सुत किन्नराज जस किन्न चिंत । हरहरह राइ नर बुडिमंत ॥ छं० १८० ॥ वानन्न राइ बलि अंग तास । सुअ प्रथव राइ पहुमी प्रचास ॥ तिन अनुज अंग राजत अनेक । कलि अलप आउ कित्ती अकेय ॥ छं०॥ २९१ । धर्माधिराज रति जोग भोग । पट घंट पित्ति पग्गह सु भोग ॥ मनाने पर उन्होंने अपराध क्षमा कर के कहा कि कितनीक पीढ़ियों तक तो तुम्हारे वंश में एक २ ही पुत्र होता रहेगा फिर वंश बढ़ेगा । इस से भी इस सूत्र का अर्थ माणिकराजजी में नहीं घट सक्ता । तथा उक्त दोनों पीढ़ावलियों को इस रूपक के साथ मिलाने से यह भी ज्ञात होता है कि छंद २८७ से अर्थात् उस में कहे महिसिंहजी एक सौ अड़तालीस १४८ वीं पीढ़ी में हुए और उन से फिर सब नाम बराबर क्रम से एक सौ सतहत्तर १७७ वें पृथ्वीराजजी तक मिलते हैं । क्या अब जो चौदहवीं १४ पीढ़ी से एक सौ सैंतालीस १४७ वीं पीढ़ी तक के बीच के नाम वह भी क्रमवार चंद्र कवि बिलकुल ही नहीं जानता था अथवा क्या वह उन को निगल कर परलोक में जा बैठा है? जो कि हमारी वृत्ति सदैव प्रत्येक विषय के अनुकूल अनुमान करने और उस के साध्य को मान्य करने की है इसलिये प्रतिकूल अनुमान ही क्यों करें और वैधर्म्य की ओर क्यों दृष्टि डालें । क्योंकि जो आज विद्वान लोग अन्य बड़े २ प्रसिद्ध ग्रंथों के विषय में ऐसे ही प्रतिकूल ही अनुमान करने लग जावें और वैधर्म्य का ही आश्रय कर लें तो बड़ा अनर्थ हो जाय । अब हम चौदहवीं १४ पीढ़ी से एक सौ सैंतालीसवीं पीढ़ी तक के नाम हमारे तथा बूंदी राज्य के शोध किये हुए हमारे पाठकों के जानने के लिये यहां लिखते हैं । पुष्करजी (विजयपालजी) १४ असमंजसजी १५ प्रेमपूरजी १६ भानुराजजी १७ मानसिंहजी १८ हनुमानजी (धर्म्मपाल) १६ चित्रसेनजी २० शंभूजी २१ महासेनजी (ऋद्धीशजी) २२ सुरथजी २३ रुद्रदत्तजी (कर्णपालजी) २४ हेमरथजी (रामपालजी) २५ चित्रांगदजी २६ चंद्रसेनजी (चित्ररथजी) २७ वाल्हीकजी (वत्सराजजी) २८ धृष्टद्युम्नजी (वरुणजी) २९ उत्तमजी ३० सुनीकजी ३१ सुबाहुजी (मोहनजी) ३२ सुरथजी ३३ भरथजी (मद- सेनजी) ३४ सत्यकीजी (सत्यकजी और सात्विकजी) ३५ शत्रुजित्जी (केसरीदेवजी) ३६ विक्रमजी ३७ सहदेवजी (इन को जीतकर कुरुवंशी राजा ने दिल्ली ले ली) ३८ वीरदेवजी (भीमसे- नजी) ३९ वसुदेवजी ४० वासुदेवजी ४१. रथाधीरजी ४२ शत्रुघ्नजी ४३ सुमेरुजी (शालिवाहनजी) ४४ ऋतवर्म्माजी ४५ सुधर्म्माजी ४६ दिव्यवर्म्माजी ४७ यौवनाश्वजी ४८ हरिश्चश्वजी ४९ अजैपालजी (अजमेर बसाने वाले) ५० भटदलनजी ५१ अनंगराजजी ५२ भीमजी ५३ गोगाजी ५४ शुभकरणजी ५५ उदयकरणजी ५६ जशकरणजी ५७ हरीकरणजी ५८ कीर्त्तिशजी ५९ बालकृष्णजी ६० हरिकृष्णजी