भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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पृष्ठ 68

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो। ५५ चतुर वीर चहुवान । च्यार सुप्पौ चैवाहं ॥ अष्ट अष्ट आरिष्ट । देव चारिष्ट सु साहं ॥ पंमार वाह्र धन धन करह । कह्यौ रिष्य परमार धन ॥ चालुक्क वाह्र चालुक्क दुज । कुसित कुसन संडित तन ॥ ॥ छं० ॥ २७९ ॥ रू० ॥ १३७ ॥ अनल कुंड आसंग । उपजि चौआन अनिल घन ॥ सुकर संठि करि वार । धनुष संग्रह्यौ वान वल ॥ तिन रष्खिस परिवार । धार सुष धरनि नि घटिय ॥ षन्त जुषित्त संमुद्दे । तिनह्र सिर सरअन तुह्रिय ॥ बंभान जग्य निर विघ्न किय । पुह्रप दृष्टि सुर सीस रजि ॥ रष्पि सु धरनि पग भुज्ज वर । रिष्ट निवारिय इष्ट भजि ॥ ॥ छं० ॥ २८० ॥ रू० १३८ ॥ ॥ जिन्होंने द्विजों की रक्षा कियी उनके वंश में पृथ्विराज हैं ॥ दूहा ॥ तिन रक्षा कीनी सु दुज । तिन्हि सु वंस प्रथ्रिराज ॥ सो सिरषत पर वादनह्र । किय राझौ जुविराज ॥ ॥ छं० ॥ २८१ ॥ रू० ॥ १३६ ॥ ॥ चाहूवानजी के वंश के राजाओं की कथा ॥ ------------------oooo*------------------ ॥ चाहूवानजी से माणिकराजजी पहिले तक तेरह पीढ़ी का वर्णन ॥ पद्धरी ॥ ब्रह्मान जग्य उतपन्न सूर । चहुवान अनल अरि मलन सूर ॥ उत्तंग अंग प्रचंड वाह्र । पहुमीस इंद अरि गिलन राह्र ॥ छं० ॥ २८२ ॥ प्रतिपाल धरनि अंगह्र सु अम्म । श्रुत मान कीन उत्तंग क्रम्म ॥ रत्तो सु जोग भव भोग रास । पुर अमर नाग नर कित्ति जास ॥ छं० ॥ २८३ ॥ १३७-१३८ पाठान्तर :-जाय कुलिल । चहुवान । मुपौ । सुसाहं । वाह्र । हिपि । पंमार । मंडि । ततन ॥ १३७ ॥ कुंद । चौहांन । रष्पि । सपरिवार । मुप । निघट्टिय । जुपितं । निरविघन । भुज्जवर ॥ १३८ ॥ १३६ पाठान्तर :-रख्या । तिहिं । पृथ्वीराज । पृथिराज । प्रवावंदंनह ॥ १४० पाठान्तर :-बंभ्रान । उत्पच । चहुवांन । मल । मयूर । उतंग । पहुबीसु । इंदू अरिगिलन । धरनी । अंग । श्रुतमान । उतंग । रतो । सुजोग । भास । क्रिति । तास्रू । अन । सु । अन । माहंत । संका । विडार । मानिकं । राजंत । सु । अन । माह्र । भूत । भयंकर । रत ।