भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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पृष्ठ 67

५४ पृथ्वीराजरासो । [ आदि पर्व ॥ क्षत्रीयों के छत्तीस वंशों की नामावली ॥ कवित्त ॥ रवि ससि जादव वंस । ककुत्थ परमार सदावर ॥ चाहुवान चालुक्क । छंद सिल्हार आभीयर ॥ दोय मत्त मक्वान । गरुअ गोहिल गोहिल पुत ॥ चापोत्कट परिच्छार । राव राठौर रोस जुत ॥ देवरा टांक सैंधव अनिग । योतिक प्रतिच्छार दधिषट् ॥ कारद्दपाल कोटपाल हुन । हरितट गोर कमाष मट ॥ छं० ॥ २७७ ॥ रू० १३५ ॥ दूहा ॥ धान्यपालक निकुंभ वर । राजपाल कविनीस ॥ काल छुरक्कै आदि दै । वरने बंस छतीस ॥ ॥ छं० ॥ २७८ ॥ रू० ॥ १३६ ॥ ॥ चारों अग्निकुल क्षत्रीयों ने वशिष्ठ का यज्ञ निर्विघ्न किया ॥ कवित्त ॥ पठन संच रिष जाप । च्यार षिची उप्पाए ॥ कुचिल हीन परिच्छार । पैारि रष्पहु सत आए ॥ १३५-३६ पाठान्तर :-यादव । परमार-रु । तौंबर । चालुक । छिंद । छंदक । आभीवर । गुरुआ गोह । गही श्रुत । राठोर । सिंधव । अनग । अनंग । योतिक । प्रतिहा । दधीपट । करेटपाल । हुन । हरीतट । गोरक । भाड । जट ॥ १३५ ॥ ध्यानपालक । ध्यान पालकनि । कुंभ । कविनीस । द्वै । छत्तीस ॥ कवि चंद के समय में जो छत्तीस कुल क्षत्रियों के प्रसिद्ध थे उन के नाम उसने वर्णन किये हैं अर्थात् रवि = सूर्यवंशी १ ससि = चंद्रवंशी २ जादव = यदुवंशी ३ ककुत्थ = कछवाहे ४ परमार ५ सदावर = तौंबर ६ चौहान ७ चालुक = सोलंकी ८ छंद = रांदेल ९ सिल्हार १० आभीयर ११ दोयमत्त = दाहिमा १२ मक्वान १३ गोहिल १४ गहिलोत १५ चापोत्कट = चावडा १६ परिहार = पंढियार १७ राठौर १८ देवडा १९ टांक २० सैंधव = सिंधव २१ अनिग = अनग २२ योतिक २३ प्रतिच्छार २४ दधिषट २५ कारट्टपाल = काठी २६ कोटपाल २७ हुन = हुन, हुण २८ हरितट = हाडा २९ गोर = गोड ३० कमाष = कमाड, जेठवा ३१ मट = जट ३२ ध्यानपालक वा धान्यपालक ३३ निकुंभ ३४ राजपाल ३५ कालछुरक्कै = कालछुर ३६ । इन के विषय में कवि दलपत रामजी अपने ज्ञाति निबंध नामक ग्रंथ में लिखते हैं कि रत्नकोश नामक संस्कृत ग्रंथ की टीका में लिखा है कि क्षत्रिय कुल का आदि पुरुष मनु उस के वंश में से यह छत्तीस हुए हैं ॥ सं० १६४७ और सं० १७९० की पुस्तकों में इन रूपकों के स्थान में रूपक १३७ और उस के स्थान में इन को लिखे हैं अर्थात् उलट पुलट हैं। हम ने उन का क्रम इस लिये ग्रहण नहीं किया है कि रूपक १३४ के छंद २७६ की पहिली तुक का अर्थ उस के पीछे इन रूपकों का ही होना प्रकाश करता है ॥