पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 78, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंआदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । ६७ आये बंस छतीस । विप्र बंदी जन सारे ॥ दियौ छत्र सिर तिलक । वेद संचच्च उच्चारे ॥ आधार है वह यह है कि इस ग्रन्थ में लिखे हुए संवत् संप्रत शोध हुए और मुसलमानी तवा- रीखों में लिखे हुए संवतों से नहीं मिलते । अतएव इस संवत् विषयिक झगड़े का प्रारंभ इस रूपक १६८ और छन्द ३३९ से समझना चाहिये क्योंकि रासे के जितने छन्दों में संवत् मिती कहे गये हैं उनमें से प्रथम छन्द यही है । इस से हम को विदित होता है कि संवत् ८२१ वैशाख सुदी १ शुक्रवार को बीसलदेवजी राज-गद्दी पर विराजे किन्तु इसी आदि पर्व में इस रूपक से थोड़े से ही और आगे बढ़कर हम को बीसलदेवजी के पट्टन द्विज्य करने के संवत् सूचन करनेवाले नीचे लिखे रूपक मिलेंगे:- (संवत् १८५९ की पुस्तक में) दोहा ॥ सो संवत् नव सत अटु । वरस तीस छह अग्ग ॥ पुर पट्टन बीसल नृपति । राजत सयलह जग्ग ॥ कवित्त ॥ संवत् नव सत अटु । वरस दस * तीय सत अग्ग ॥ पुर प्रविष्ट बीसल नरिंद । राजंत सयल जग्ग ॥ ( संवत् १७७० की पुस्तक में ) दोहा ॥ सो संवत् नव सत अध । वरस तीस छह अग्गि ॥ पुर पट्टन बीसल नृपति । राजत सयलह जन्नि ॥ कवित्त ॥ सर संवत् नव सत्त । वरस दस * पंच सत अग ॥ पुर प्रविष्ट बीसाल । नृपति राजंत सयल जग ॥ ( गुजरात देश की पुस्तक में ) दोहा ॥ सो संवत् नव शत अधिक । वर्ष तीस छह अग्ग ॥ पुर प्रतिष्ठ विशल नृपति । राजत सकले जग्गं ॥ जितनी पुस्तक हम इस टिप्पण के लिखते समय देख सके उन सब में ऊपर लिखे पाठ पाये अर्थात् किसी में हमारी सं० १८५९ का पाठ मिलता है तो किसी में संवत् १७७० वाली का । शोक की बात है कि हमारी १६३१ तथा १६३२ वाली पुस्तक में तो यह पर्व्व ही नहीं है और संवत् १६४७ वाली में यह पृष्ट नहीं है कि जिसमें इन छन्दों का होना सम्भव है । यह तो जानने में ही है कि पिछले रूपक १४० में चंद कह आया है कि "चौसट्टि बरस बर राज कीन" चौंसठ
- हिन्दी भाषा के ऐसे प्राचीन काव्यों में चंद जैसे महाकवियों को गूढ़ बातों को खोलने की कुंजियों में से हम एक का यहां प्रकाश करते हैं कि दश दस और दृशि दसि शब्दों का अर्थ जहां वे कुछ संख्या प्रकाश करने को प्रयोग हुए हों वहां सूक्ष्मता रखते हैं अर्थात् दश अथवा दस = १० का वाचक और दृशि अथवा दसि = शून्य ० अर्थात् केवल दहाई का वाचक होता है और जहां लेखक दोष से इन शब्दों के लिखने में गड़बड़ हो जाती है वहां संख्या में भी गड़बड़ पड़ जाती है कि इस के उदाहरण इस महाकाव्य में यहां से लेकर अनेक स्थलों में आवेंगे ॥