पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८ पृथ्वीराजरासो । [ आदि पर्व आनंद अग्गवर इंद्र सम । अंग नंद जस उड्डरै ॥ अजमेर नयर अरि जेर करि । विमल राज बीसल करै ॥ कुं० ॥ ३३८ ॥ रू० ॥ १६८ ॥ बरस बीसलदेवजी ने राज्य किया । अब विद्वानों के विचार देखने जैसी बात है कि इस रूपक के संवत् को इसी प्रकरण के दूसरे रूपकों में कहे संवतों से मिलाने से एक सौ वर्ष का फरक पड़ता है और जो ९१ वर्ष का एकसा अंतर रासो में लिखे सब संवतों को संप्रत शोध से मिलाने और जो पखाने हमने पृथ्वीराजजी के शोध किये हैं उन से पड़ता है वह इस से सिवाय है । जगत का एक यह सर्व साधारण नियम है और उसका भार सब पक्षपात रहित विद्वानों पर है कि प्रत्येक समय के विद्यमान बड़े २ विद्वान सब परम पद-प्राप्त ग्रन्थकर्त्ताओं के ऊपर जो कोई व्यर्थ आक्षेप करै उस को खण्डन कर के छिन्न भिन्न कर दें क्योंकि यदि यह भार विद्वानों पर स्वतः सिद्ध न रहा होता तो सब कीट क्रिकिट सब अमूल्य ग्रन्थों को खंड कर खाजांय और बड़े २ कवियों के नामों पर पोता फेर दें। अतएव ऐसी जिम्मेदारी को शुद्ध अंतःकरण से समझने वाला कोई विद्वान क्या यह कहेगा कि भिन्न २ पुस्तकों में यह भिन्न २ अशुद्ध पाठ चंद कवि जैसा महाकवि बीसलदेवजी की तरह दानव होकर लिख गया है ? क्या इन भूलों का अपराधी चन्द है ? नहीं-नहीं-कभी नहीं । हम क्या एक छोटा सा बालक भी कह सकता है कि यह सब भूलें अयोग्य लेखक और कवियों ने जान कर अथवा अनजाने कियी हैं। अब हमारी सम्मति इस विषय में चन्द की शैली और ख्यातियों की पुस्तकों में लिखे सं० ९३१ को देखते हुए ऐसी है कि यहां ऐसा पाठ था कि “नौ सें अरु इकतीस” और इस हमारे अनुमान की पट्टन विजय करने के संवत् वाले रूपक पुष्टि करते हैं। देखो :- बीसलदेवजी का पाट बैठना ... ... ... ... ९३१ वर्ष उनका राज्य करना जोड़ो ... ... ... ... ६४ वर्ष रासो के संवतों और विक्रमी में जो सर्वत्र एकसा अन्तर है वह जोड़ो-९१ वर्ष विक्रमी संवत् = १०८६ रासो के रूपकों के जो मूल पाठ अशुद्ध हैं उनको अभी हम जैसे लिखित पुस्तकों में हैं वैसे ही रक्खेंगे क्योंकि जब तक सब विद्वान एक मत न हो जांय तब तक उनको हम पुरातत्त्व विद्या के नियमों के अनुसार बदल नहीं सक्त हैं। इस के अतिरिक्त हम पुरातत्त्व वेत्ताओं को चेत कराते हैं कि फीरोज़शाह की लाटपर की प्रशस्तियों को जब एक बार प्रथम बीसलदेवजी के और पृथ्वीराजजी के चरित्रों को भले प्रकार ग्रंथान्तरों में पढ़कर उन आशयों के सहारे से फिर विचारें तौ उन को मालूम हो सकेगा कि पहिली प्रशस्ती जिस में का नीचे लिखा अनुवाद है उस को बीसलदेवजी को नहीं समझना चाहिये किन्तु पृथ्वीराजजी की समझना उचित है और केवल यही विशेष समझना होगा कि बीसलदेवजी के उपलक्ष्य का संबन्ध उस में इतना ही है कि जिस मिती को वह प्रशस्ती निर्माण हुई है वह मिती बीसलदेवजी के पाट बैठने की है अर्थात् वैशाख शुदी १ और पृथ्वीराजजी को बीसलदेवजी का अवतार होना लोग मानते हैं अतएव इन प्रशस्तियों के लिखने वालों ने अपने इस गूढ़ भाव को प्रकाश करने में उन दोनों का सादृश्य दिखाया