पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 88, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंआदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । ७७ वरन वरन पल्लव । पहुप द्रुमवेल्लि केलि-फल ॥ कीर पिक चकोर । मोर कोकिल कौतूहल ॥ वाराह सिंघ मृग जूथ जहां । दिष्पिराज अचरिज भयौ ॥ अनूप ठाम आराम अति । सिव परसत सब सुष भयौ ॥ छं० ॥ ३८५ ॥ रू० ॥ १८३ ॥ कवित्त ॥ परवत में कंदरा । तहां किन्नर सु विराजै ॥ वारि बूंद सिर झरै । पास सिंघ जूथ समाजै ॥ आनि अचानक राज । पाइ लगे करि प्रन्न पति ॥ ॐ नमो सिव सकल । नमो अकलेस अकल मति ॥ फल पहुप द्रव्य पंचा अमृत । धूप दीप अग्रें धरिय ॥ अस्नान दान चहुवान करि । तब अस्तुति सेवा करिय ॥ छं० ॥ ३८६ ॥ रू० ॥ १८४ ॥ ॥ बीसलदेवजी का गोकर्णेश्वर महादेव की स्तुति करना ॥ भुजंगी ॥ नमो वाय भूताय थानं भयानं । जटा मांचि गंगा झलकै प्रमाणं ॥ चयं नेच ज्वाला जळं चंद्र भालं । विषं कंठ मालां रुलै रुंड मालं ॥ ३८७ ॥ मचा आदि मुद्रा नषं सिंगि नादं । सिधं देव देवं कथं साथ साधं ॥ धरा धूरि धूसं विभूतं घसंते । नमस्ते नमस्ते नमस्ते नमस्ते ॥ ३८८ ॥ गजं चर्म आछादितं भ्रंम नासं । रहै वीर भैरवं गनं आस पासं ॥ पदम्मासनं पुष्टि नंदी प्रचंडौ । चवं वेद आमोद चौसठि चंडी ॥ ३८६ ॥ भी देखने में आते हैं अतएव इस को कवियों की एक शैली मानना चाहिये । ऐसे स्थलों में प्रायः शुष्क-कवि आपस में बहुत वाद विवाद कर सिर फोड़ा करते हैं अतएव हम एक और भी सूक्ष्म कारण बताते हैं कि चंद और सूर जैसे आर्द्र-कवि गान विद्या में पारंगत होने के कारण जहां एक ही यति में अनेक स्वर स्वरित हो गये हों वहां की एक दो मात्रा को दूसरी यति में मिला देते हैं कि जिस में स्वर न बिगड़े देखो यहां उतंग के तुं और सरिता के ता पर स्वर स्वरित हो गये हैं ॥ १८४ पाठान्तरः-प्रबत्त । किंनर । बुंदि । नपै । सिंध । पाय । प्रनति । उं । द्रबि । पंचै । दांन । चहुवांन । १८५ पाठान्तरः-झलकै । वंदे । सधं । दूरि । ढूसं । भैरूं । आसा । पासं । पदंमासनं । पुष्टी । कोद । चौसठि । डक । डौरूं । तड़कै । मेरे । धूजै । धनुंक्कं । धरें । वांम । सूलपांणी ।