भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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पृष्ठ 89

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९८ | पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व बजै डक्क डोरू डसकं तडक्कै । धकै सेरु धुज्जै छके गैन छक्कैँ ॥ धनूकं पिनाकं धरै बाम हस्ते । नमस्ते नमस्ते नमस्ते नमस्ते ॥ ३८० ॥ सिधं साध आराधयं शूलपानी । सिवा भ्रंम साधेति के साध जानी ॥ नरं किंनरं गंध्रवं नग्ग जष्पं । सुरं आसुरं अच्छरी हूर रष्पं ॥ ३८१ ॥ सनक्कादिकं सप्तर्षी बाल कालं । प्रथीवायुगेनाय तेजंस लालं ॥ नभो भान चंद्रं नवं ग्रह समक्षे । नमस्ते नमस्ते नमस्ते नमस्ते ॥ ३८२ ॥ मिटै संकटं वाट घाटं विघहं । रटै नाम तो कोटि काटै कसट्टं ॥ परं बेचरं भूचरं जंच मंचं । जपै व्याधि आसाध भाजै अनंतं ॥ ३८३ ॥ मच्छादी पुरुषं मच्छीमा मुरारी । नवं क्वॉन तो सौं निपातिक परारी ॥ गिरा गौरि अर्धंग कैलास वस्ते । नमस्ते नमस्ते नमस्ते नमस्ते ॥ छं० ॥ ३८४ ॥ रु० ॥ १८५ ॥ साधेंति । ज्यंनी । यंध्रधं । जखं । अच्छदी । दिखं । सनकादिकं । सपत रिषी । सप्त रिषी । प्रथो- वायुगेनाय तेजं । भांन । मिटैं । नांम । ती । महा आदि । पुरिषं । पुरुषं । तवों । कोन । तौ । नपातिग । अरधंग । कयल्लास ॥ हमारे जो पाठक ऐसे हैं कि जिन को न तो कभी यह शंका हुई न अब है और न आगे होगी कि हिन्दी भाषा का यह अति प्राचीन महाकाव्य आदि से अंत पर्यंत जाली बना है उन को उचित है कि यूरोप देश निवासी मिस्टर यौज़, डाक्टर हार्नली, मिस्टर बीम्स और भरतखंड निवासी डाकुर राजेन्द्रलालजी मित्र जैसे महाशयों को अनेक धन्यवाद दें कि उन के शोध और अनेक लेखों के कारण से यह महाकाव्य सर्वसाधारण लोगों के जानने में आय गया नहीं तो कुछ समय और व्यतीत होने पर कोई मनुष्य जैसी कि तर्क वितर्कों से अब दोष देते हैं वैसे ही इस रूपक में “नमस्ते नमस्ते नमस्ते नमस्ते” का पाठ देख करके कदाचित यह अनुमान करलेते कि इस को स्वामी श्रीदयानन्द सरस्वतीजी के सिद्धान्तानुयायी किसी कवि ने झूठा बना दिया है क्योंकि नमस्ते शब्द का प्रचार या तो वैदिक समय में था अथवा इन दिनों में आर्य समाजस्यों में है और आदि के चार रूपकों से चंद के धर्म संबन्धी विचार वैदिक समय के से होना प्रतीत होते हैं । यद्यपि आज यह महाकाव्य इतना प्रसिद्ध हो गया है परंतु भावी दोष देनेवाले के लिये वह कुछ बाधक नहीं हो सक्ता क्योंकि जो कुछ प्रमाण इस समय की प्रसिद्धि के उस को उस समय में मिलेंगे उन सब को वह निःशंक होकर वर्तमान समय के दोष देनेवालों की भांति जाली कह सक्ता है जैसे कि इस समय में सब राजपूताने के राज्यों के प्राचीन संवत इस रासे के ९१ वर्ष के अंतर के संवत के अनुसार मिलते हैं और उन सब को इसी रासें ने अशुद्ध कर दिये कहा जाता है । इसी तरह वह भी कह सक्ता है कि इस समय में जाल ही जाल फैल गया था क्योंकि जैसे आज चंद स्वयम् साक्षी नहीं दे सक्ता वैसे हम लोग भी उस समय में न होंगे । सारांश यह है कि एक नवा सौ दुःख हरता है और थोथी हठ के आगे किसी की कुछ नहीं बनती ॥