पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । ७६ ॥ बीसलदेवजी से गोकर्णेश्वर के सिद्ध का उन का नाम ग्रामादि पूछना ॥ दूहा ॥ इति अस्तुति राजन मुषच । पढि पुज्जिव पग वंदि ॥ देषि सिद्ध चकित भयौ । भाजन बुद्धि नरिंदि ॥ छं० ॥ ३८५ ॥ रु० ॥ १८६ ॥* कहत सिद्ध किच्छि पुरहुं तैं । कौंन गोत किच्छि नाम ॥ इहि तीरथ आये हुते । कै आगैं कोइ काम ॥ छं० ॥ ३८६ ॥ रु० ॥ १८७ ॥ बीसलदेवजी का अपना नाम गाम आदि बताना ॥ दूहा ॥ पुर अजमेर सु वास हम । गोत ग्याति चहुआन ॥ बीसल दे मो नाम सिध । आयौ करन सनान ॥ छं० ॥ ३८७ ॥ रु० ॥ १८८ ॥ ॥ सिद्ध का गोकर्णेश्वर के तीर्थ की महिमा वर्णन करना ॥ अरिल्ल ॥ सिद्ध कहत सुन राजन वत्तिय । जो तू तजि आयौ निज घत्तिय ॥ इह गोपेसुर थान अपूरब । नित प्रति निसा उतरै सौ रंभ ॥ छं० ॥ ३८८ ॥ रु० ॥ १८८ ॥ इन थानक चारन वर पाए । तिनके नाम कहि रु समझाए ॥ भसमाकर रावन मधु कीटक । तिन उपास निराचर षट टक ॥ छं० ॥ ३८९ ॥ रु० ॥ १८० ॥ इहै तिथ की महिमा गाए । धेनु दुग्धतैं आनि हवाए ॥ जैसैं ध्याए तैसैं पाए । इतनी कहि सिध उठि सिधाए ॥ छं० ॥ ४०० ॥ रु० ॥ १८१ ॥ १८६ पाठान्तर :-भयौ ॥ *यह रूपक सं० १६४७ और १७७० की लिखी पुस्तकों में नहीं है जो इन से भी पुरानी पुस्तकों में यह न मिले तो इस को क्षेपक मानना चाहिये । किन्तु अभी तो हम इस को क्षेपक संज्ञा प्रदान नहीं कर सक्ते ॥ १८७ पाठान्तर :-परहुं । तैं । क्यौंन । नांम । आगैं । कांम ॥ १८८ पाठान्तर :-नांम । सनांन ॥ बीसल दे शब्द में जो दे है वह देव शब्द का संक्षिप्त रूप है इसी तरह समरसी में सी सिंघ वा सिंह का संक्षिप्त है ॥ १८८ से १८१ पाठान्तर :-वत्तीय । इह । घरत्तीय । इहां । गामेसद्र । थांन । प्रतै । यांनक । च्यारंन वर । च्यार नर । नांम । उपवास । टंक ॥ ए हैं । धैनु । तैं । आंनि । जैसैं । तैसैं ॥