भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 91, कुल 470 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 91

८० पृथ्वीराजरासो । [ आदि पर्व ॥ बीसलदेवजी का तीन दिन निराहार उपवास कर गोदानादि करना और महादेव का अपछरा को उन्हें उठाने भेजना ॥ दूहा ॥ राजन मन चक्रित भयौ । सुनि थानेक की विद्धि ॥ जे तो अभि अंतर * वसत । कहि ने तैर सिध सिद्धि ॥ छं० ॥ ४०१ ॥ रू० ॥ १८२ ॥ अरिच्छा ॥ सहसं गौ मंगाइ सवच्छिय । देइ द्रव्य नै अच्छी अच्छिय ॥ सहस घट सिव ऊपर कीनौ । तीन उपास नेम तब लीनौ ॥ छं० ॥ ४०२ ॥ रू० ॥ १८३ ॥ तीन दिवस रहै राव निराहर । जल फल तज्यौ पवन कौ आहर ॥ एक निसा इक अपछर आई । सब अपछरा नृत्ति करि गाई ॥ छं० ॥ ४०३ ॥ रू० ॥ १८४ ॥ बहुत बेर पीछै बोल्यौ हर । अपछर जाइ उठेउ वह नर ॥ सो अपछर नर देषन आई । देषति नृपति बसि नींदा माछी ॥ छं० ॥ ४०४ ॥ रू० ॥ १८५ ॥ ॥ अपछरा का बीसलदेवजी को महादेव के प्रसन्न होने और मन की कामना पूरण होने का कहना ॥ दूहा ॥ तुम कौं सिव सु प्रसन्न भय । कह्यौ सोछनि वर सोचि ॥ जाहु थान धरि थान तजि । तूठे संभर तोचि ॥ छं० ॥ ४०५ ॥ रू० ॥ १८६ ॥ तेरे मन की कामना । ऊपर शिव कौ पाइ ॥ इतनी कहि करि सोछिनी । दियौ सु नृपति उठाइ ॥ छं० ॥ ४०६ ॥ रू० १८७ ॥

  • चंद की भाषा का व्याकरण तो हम कुछ समय में बनाकर प्रकाश करेंगे परंतु एक सूत्र उस का यह स्मरण में रखना चाहिये कि उस में षट-भाषा-वत् संधि विकल्प करके होती है । होने के उदाहरण बहुत आवेंगे परंतु न होने के उदाहरण यह अभि + अंतर और पंचा + अमृत हैं ॥ १८२ पाठान्तर :- विधि । जि । तौक । ते । सिद्धु । सिध ॥ १८३ से १८५ पाठान्तर :- सहसं । गज । मंगाय । सर्वछिय । देय । ते । अक्षीय । अक्षीय । घट । शिव । तिन । द्यौस । रहै । निशा । एक । आईय । अपछर । नृतत । गाईय । पीछे । बोले । उठाउ । वहे । आइय । देखि नृपति वसि नीद समाइय ॥ १८६-८७ पाठान्तर :- कों । सौं । शिव । हुव । यांन । संभू ॥ को । पांय । दीयौ । नृपति । उठाय ॥