पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
४४२ पृथ्वीराजरासो । [ ग्यारहवां समय ४ निसुरति षां का अरब खाँ को शाबसी दे कहना कि तुमने शाह के बचन माने और हिन्दु धर्म्म को न मान कर म्लेच्छ कुल कर्म्म को धारण किया सो ठीक किया ॥ कवित्त ॥ कह्यौ साचि जो बचन । सोइ तुम काज सुधार्यौ ॥ तेइ बचन सति होइ । हिंदु भ्रम्मं न विचार्यौ ॥ मेछ धर्यौ कुल क्रंम । जोगि ग्यानह जिम धारहि ॥ सेवक मत्त सुभाइ । देन आलम नाकारहि ॥ घुरसान षान सुरतान पति । दल बहल पावस मिलिग ॥ चतुरंग सज्जि चौरंग मिलि । सिद्ध चरित सिद्धन चलिग छं० ॥ १५ ॥ ६० ॥ ७ ॥ शाहाबुद्दीन का सेना समेत सजकर चलना ॥ कवित्त ॥ गज्जनेस आएस । सूर चतुरंगन सज्जिथ ॥ बीर बाल ससि वहि । सोच पूरन जिम भज्जिय ॥ करक निसा दिन मकर । सेन बढ्ढी निम चंगिय ॥ मिलि अनंग आनंद । रंज आनंद सुजंगिय ॥ द्वादस सहस्र बारुन समद । दोइ लष सज्जे सुभर ॥ पारब सुअम्य आरंस दल । चव्यौ साच मधि दुप्पहर ॥ छं० ॥ १६ ॥ ६० ॥ ८ ॥ चलते समय शाह का चित्त चित्तरेखा में मत्त गयंद की भांति लगा हुआ था ॥ गाथा ॥ चित्तं मत्त गयंदं । पुंतारं नत्थि उत्तरयं ॥ त्यों चित्तरेषय चित्तं । सुविच्चानं मंडियं नेहं ॥ छं० ॥ १७ ॥ ६० ॥ ६ ॥ ७ पाठान्तर-सोय । साज सुधारौ । होई । धंम । विचारौ । धरौ । कर्म्म । जोग । ग्यांनह । सुभाय । सुभाई । घुरसांन षांन । सजि ॥ ८ पाठान्तर-आएक । चतुरंगति । सजिय । भजिय । निशा । बढी । चंगीय । जंगीय । समुंद । समद । दोय । लखु । सजे । दुपहर ॥ ६ पाठान्तर-चितं । मत । पुतारं । नथि । उतरयं । चित्तं ॥
४४४ पृथ्वीराजरासो । [ ग्यारहवां समय ६ अरब खां का आज्ञा मानकर चित्ररेषा को भेंट में देना ॥ अरिल्ल ॥ आरब षान तन छन मानिय । ज्यौं सुकिया पिय आग्या जानिय ॥ लै फुरमान बंदि सिर धारिय । चित्ररेष दीनी सा नारिय ॥ छं० ॥ २८ ॥ रू० ॥ १२ ॥ चित्ररेषा वेश्या के रूप का वर्णन ॥ साटक ॥ बेस्र्या बंकित भूप रूप मनस!, स्रंगार धारावली ॥ सोयं सूरति लच्छि अच्छित गुन॑, बेली सु कामावली ॥ का बर्नै कवि उत्ति जुक्ति मनथं, त्रैलोक्य मं साधनं ॥ सोयं बाल तिरत्त उष्ट विद्रुमं, का मोह जोगेश्वरं ॥ छं० ॥ २९ ॥ रू० ॥ १३ ॥ सटक ॥ रूपं नहि कटाच्छ कूल तटयौ, भायं तरंगं बरं ॥ द्यावं भावति सीन असित गुन॑, सिद्धं मनं भंजनी ॥ सोयं जोग तरंग रुवति बरं, चीलोक्य ना ता समा । सोयं साचि सहाव दीन अहियं, आनंग क्रीड़ा रसं ॥ छं० ॥ २९ ॥ रू० ॥ १४ ॥ बिना युद्ध चित्ररेषा को लेकर गोरी का लौट आना ॥ दूहा ॥ अंग सुलच्छिन हेम तन । नगधरि सुंदरि सीस ॥ गोरी ग्रहि गोरी गयौ । बिना जुद्ध बुझि रीस ॥ छं० ॥ ३० ॥ रू० ॥ १५ ॥ चित्ररेषा के साथ शाह के आदर और प्रेम का वर्णन ॥ दूहा ॥ जिम जिम साह सु आदरिय । तिम तिम बढ्ढिय पेम ॥ क्रम क्रम फल गुन बढ़ इय । बेली नमैं सु तेम ॥ छं० ३१ ॥ रू० १६ ॥ १२ पाठान्तर-षांन । छन । मंतिय । सुकीया । जांनिय । फुरमांन । धारीय ॥ १३ पाठान्तर-सोयं । लछि । अछित । बेली । बरनै । युक्ति । मन । तिरत । जोगेस्ररं ॥ १४ पाठान्तर-नत । कंठाख्य । तटयो । मान । ग्रसित । भजनी । रुञ्जति । जीकोन ता संमयं । त्रिलोक्स । नह । समां । साहाब । ग्रहीयं ॥ १५ पाठान्तर-लछिन । शीश । गृहि । युद्ध ॥ १६ पाठान्तर-आदरीय । बढ़िय । जिम २ फलगुन वाधरय ॥
[ ग्यारहवां समय ९ ] पृथ्वीराजरासो । ४४५ चित्ररेषा को सुलतान को वश करने का वर्णन ॥ कवित्त ॥ वसि कीनौ सुरतान । चंग जिस भ्रमै डोरि कर ॥ ज्यौं भावी बसि जाइ । वचन उद्योत बाल सुर ॥ ज्यौं वसि जीवन संन । प्रात वसि जेम क्रांम गुर ॥ ज्यौं वसि नाद कुरंग । वास वसि जेम मधुक्कर ॥ मछिन्ना सु मुक्ति सब वस्सि भय । मच्छिा मच्छि सुमति वसि ॥ एकांग एक सुंदर सद्दल । रचै साचि सुरतान रसि ॥ छं० ॥ ३२ ॥ रु० ॥ १७ ॥ चित्ररेषा की कथा सुन कर कवि का आनंदित होना ॥ दो० ॥ पंथी पेम परेव जिस । सुमन मनोहर मिष्ट ॥ सुनत कथा संलख दृदृ । अनंदिय मन इष्ट ॥ छं० ॥ ३३ ॥ रु० ॥ १८ ॥ * इति श्री कविचंद विरचिते प्रथ्रिराजरासके चित्ररेषा वर्णनं नाम एकादसो प्रस्ताव संपूर्णम् ॥ ११ ॥ १७ पाठान्तर—कीनौँ । सुरतांन । भ्रुमै । होई । मंत । क्रम । नद । वशि । मधुकर । सुमति । जांसि । मति । रहें । सुरतांन । रस ॥ १८ पाठान्तर—यह । आनंदीय ॥
- यह दोहा Caulfield, Ms. में नहीं है, परन्तु वह हमारी सं० १६४७ और सं० १८५८ की पुस्तकों में है ॥
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