पृथ्वीराजविजय महाकाव्यम् (कवि जयानक - अजमेर चौहान साम्राज्य एवं सम्राट् पृथ्वीराज इतिहास)
Prithvirajavijaya Mahakavya of Jayanaka with Commentary
कश्मीरी कवि जयानक (टीकाकार: जोनरराज) द्वारा
पृष्ठ 123, कुल 330 में से
संदर्भ में पढ़ेंclosely: की followed by त्तौ with a repha on the right, which together with the matra looks like कीत्तौँ or कीर्त्तौ.
In Devanagari typography, त्त + ौ + र् (repha): the repha sits above the right vertical stem or between the matras.
So it is कीर्त्तौ!
Then: लतारोपस्यारोपान्तरनिरपेक्षत्वात् ॥(l.21) 18.
Verse 19: यस्य कैरविणी व्योम्नि पृथिव्यां तारकावली . पाताले चन्द्रिका कीर्त्तिः कं न चक्रे सविस्मयम् ॥
Footnotes: 1 Ms. प्रा° to °र्थम् lc. under. l. 9. 2 Ms. °षाद्भो°.
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१०४ पृथ्वीराजविजयमहाकाव्यम्
Then lines:
Line 1: नैव सुवृत्तानां सुवृत्तैरेवोपमानात् तेनैवो(l 9)पमानत्वेनन्वयस्य सद्भावात् ॥
Wait, in line 1: तेनैवो(l 9)पमानत्वेनन्वयस्य or तेनैवो(l 9)पमानत्वेनान्वयस्य?
Look at `तेनैवो