रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकथासार
प्रथम सर्ग
शब्द तथा अर्थ के समान सर्वदा सम्बद्ध संसार के माता-पिता भगवान् शंकर और पार्वतीजी को नमस्कार कर कविकुलकलाधर कविवर कालिदास सूर्य से उत्पन्न रघुवंश का वर्णन करने संकोच करते हुए कहते हैं—यद्यपि मैं रघुवंश का पार पाने में सर्वथा असमर्थ हूँ, फिर भी वाल्मीकि आदि महाकवियों ने सूर्यवंश पर सुन्दर काव्य लिखकर वाणी का द्वार खोल दिया है। इसलिए उसमें प्रवेश कर उस वंश का कुछ वर्णन कर देना मेरे लिए शक्य हो गया है। जिस प्रकार हीरे की कनी से बिधे मणियों में डोरा पिरोया जा सकता है उसी प्रकार मैं अपनी तुच्छ बुद्धि से उन प्रतापी रघुवंशियों का वर्णन कर सकूँगा, जिनका साम्राज्य समुद्र के ओर-छोर तक फैला हुआ था, जिनके अजेय रथ पृथ्वी से सीधे स्वर्ग तक जाया-आया करते थे। जो शास्त्रों के अनुसार यज्ञ करते थे, जो दान करने के लिए ही धन बटोरते थे, जो सत्य की रक्षा के लिए ही कम बोलते थे, जो अपना यश बढ़ाने के लिए ही दूसरे देशों को जीतते थे, जो भोग-विलास के लिए नहीं वरन् सन्तान उत्पन्न करने के लिए विवाह करते थे और जो बुढ़ापे में पुत्रों को राज्य सौंपकर मुनियों के समान जंगल में रहकर तपोमय जीवन बिताते थे और अन्त में परमात्मा का ध्यान करते हुए अपने पाञ्चभौतिक शरीर का त्याग कर देते थे।
जैसे वेद के छन्दों में सर्वप्रथम ॐ है वैसे ही राजाओं में सबसे प्रथम सूर्य के पुत्र वैवस्वत मनु हुए जिनका समादार बड़े-बड़े तपस्वी, विद्वान् एवं महात्मा लोग किया करते हैं। उन्हीं वैवस्वत मनु के वंश में चन्द्रमा के समान सबको सुख देनेवाले तथा शुद्ध चरित्रवाले राजा दिलीप ने जन्म लिया था, उनका रूप अत्यन्त सुन्दर था। जैसा सुन्दर उनका रूप था वैसी ही उनकी बुद्धि भी बड़ी तीव्र थी। अल्पकाल में ही उन्होंने सारी विद्याएँ पढ़ लीं। वे न्याय में बड़े कठोर, पक्षपातरहित और अत्यन्त दयालु थे। उनके राज्य में सभी लोग नियमों पर चलते थे और आश्रमों के नियमों के अनुसार ही अपने धर्म का पालन करते