भारतकोश
रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)

DevanagariHindipublished735 पृष्ठ

पृष्ठ 31, कुल 735 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 31

( १६ )

गन्धर्व अपने लोक को चला गया। विदर्भ नगरी के निकट पहुँचने पर विदर्भराज ने अज की अगवानी कर आदर के साथ नगर में लाकर बड़ा सत्कार किया।

भोज के कर्मचारियों द्वारा निश्चित नये राजभवन में अज ठहराये गये। इन्दुमती के विषय में अनेक प्रकार की चिन्ता करते हुए अज को रात में नींद देर से आयी। रात्रि के अन्त प्रभातकाल में बन्दीगण मधुर वाणी से अज की स्तुति करने लगे—विद्वन् ! रात बीत गयी, चन्द्रमा की कान्ति मन्द हो चली, आपके चञ्चल नेत्र तथा खिलते हुए कमल की ठीक समानता हो सकेगी यदि दोनों साथ खिलें। अतः उठिए, प्रभातवायु आपके मुख की सुगन्धि पाने की इच्छा से बार-बार बहता फिरता है। कोमल लाल पत्तों पर पड़ी ओस की बूँदें आपके अधरोष्ठ से मिले मृदुहास्य की तरह मालूम पड़ती हैं। आपके हाथी सोकर उठे हैं, सूर्य की किरणों मे उनके दांत श्रृंग की तरह रङ्गीन मालूम पड़ते हैं। तम्बूओं में बँधे हुए आपके अरबी घोड़े जगकर सैन्धव लवण का स्वाद ले रहे हैं। देखिए, रात की पुष्पमालाएँ मुरझा गयी हैं। दीपक की कान्ति मलीन हो गयी और आपका सुग्गा भी हमारी तरह बोलता हुआ आपको जगा रहा है। अतः आप भी उठ जाइए।

इस प्रकार मधुभाषी वन्दियों के द्वारा स्तुतिपूर्वक जगाये गये कुमार अज पलंग से वैसे ही उठ बैठे जैसे मधुर शब्द करनेवाले हंसों के निनाद से जगा ईशानकोण का दिग्गज सुप्रतीक गंगा के रेतीले तट से उठ जाता है। शय्या छोड़ने के बाद अज ने प्रातःकालीन नित्य-कृत्य, सन्ध्यावन्दनादि समाप्त कर प्रसाधनकुशल परिचारक के द्वारा विरचित स्वयंवर के योग्य वेश-भूषा से सज-धज कर स्वयम्बर में विराजमान राजाओं के समाज में सम्मिलित हुए।

षष्ठ सर्ग

षष्ठ सर्ग में इन्दुमती के स्वयंवर का आकर्षक वर्णन है। राजा रघु के पुत्र युवराज अज ने स्वयंवर स्थान में उपस्थित होकर मंचों पर सजाये हुए सिंहासनों पर आसीन सुन्दर वेशवाले उन राजाओं को देखा, जो विमानों पर बैठे हुए देवताओं के समान सुशोभित हो रहे थे। अज राजा भोज द्वारा बताये गये योग्य मंच पर सुन्दर बनी सीढ़ियों के मार्ग से उस प्रकार चढ़ गये जैसे शेर का बच्चा पर्वत की चट्टानों पर पैर रखता हुआ ऊँचे शिखर पर चढ़ जाता है। वे