भारतकोश
रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)

DevanagariHindipublished735 पृष्ठ

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अष्टमः सर्गः २५१

इच्छा से वहाँ से उतार लिया हो। अर्थात् उस समय वेग से चलने वाले वायु के कारण वह माला उड़ गई ॥ ३४ ॥

भ्रमरैः कुसुमानुसारिभिः परिकीर्णा परिवादिनी मुनेः।
ददृशे पवनावलेपजं सृजती बाष्पमिवाञ्जनावलिम् ॥ ३५ ॥

अन्वयः—जनैः कुसुमानुसारिभिः भ्रमरैः परिकीर्णा मुनेः परिवादिनी पवनावलेपजम् अञ्जनावलिम् वाष्पं सृजती इव ददृशे।

भ्रमरैरिति। कुसुमानुसारिभिः पुष्पानुयायिभिर्भ्रमरैरलिभिः परिकीर्णा व्याप्ता मुनेर्नारदस्य परिवादिनी वीणा। 'वीणा तु वल्लकी। विपञ्ची सा तु तन्त्रीभिः सप्तभिः परिवादिनी ॥' इत्यमरः। पवनस्य वायोरवलेपोऽधिक्षेपस्तमञ्जनेन कज्जलेनाविलं कलुषं बाष्पमश्रु सृजति मुञ्चतीव ददृशे दृष्टा। भ्रमराणां साञ्जनबाष्पबिन्दुसादृश्यं विवक्षितम्। "वा नपुंसकस्य" इति वर्तमाने "आच्छीनद्योर्नुम्" इति नुम्विकल्पः।

भाषार्थ—माला तो वीणा से गिर गई पर पुष्पों के रस के लोभ से फूलों के पीछे २ उड़ने वाले भ्रमर नारदजी की वीणा के चारों ओर मडरा रहे थे उन्हें देख कर मालूम पड़ता था कि मानो वायु से अपमानित होकर वह वीणा काजल से मिले हुए आंसू बहा रही हो ॥ ३५ ॥

अभिभूय विभूतिमार्तवीं मधुगन्धातिशयेन वीरुधाम् ।
नृपतेरमरस्रगाप सा दयितोरुस्तनकोटिसुस्थितिम् ॥ ३६ ॥

अन्वयः—सा अमरस्रक् मधुगन्धातिशयेन वीरुधाम् आर्तवीं विभूतिम् अभिभूय नृपतेः दयितोरुस्तनकोटिसुस्थितिम् आप।

अभिभूयेति। साऽमरस्रग्दिव्यामाला मधुगन्धयोर्मकरन्दसौरभयोरतिशयेनाधिक्येन वीरुधां लतानाम्। 'लता प्रतानिनी वीरुत्' इत्यमरः। ऋतोः प्राप्तामार्तवीमृतुसम्बन्धिनीं विभूतिसमृद्धिमभिभूय तिरस्कृत्य नृपतेरजस्य दयिताया इन्दु-मत्या ऊर्वोविशालयोः स्तनयोर्ये कोटी चूचुको तयोः सुस्थिति गोप्यस्थाने पतितत्वात्प्रशस्तां स्थितिं स्थानमाप प्राप्ता।

भाषार्थ—अन्य लताओं की अपेक्षा अत्यधिक मकरन्द तथा सुगन्धवाली वह दिव्यमाला राजा अज की प्रिया इन्दुमती के बड़े-बड़े स्तनों के अग्रभाग पर जाकर गिरी ॥ ३६ ॥

क्षणमात्रसखीं सुजातयोः स्तनयोस्तामवलोक्य विह्वला ।
निमिमील नरोत्तमप्रिया हतचन्द्रा तमसेव कौमुदी ॥ ३७ ॥