रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)
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दिया था, केवल उनके पास मिट्टी का बर्तन मात्र शेष रह गया था। ये कुमार राजा रघु के वैसे ही पुत्र हैं जैसे इन्द्र का जयन्त। अतः कुल से, कान्ति से, नयी अवस्था से, विनय आदि गुणों से सम्पन्न तुम्हारे अनुरूप हैं। अतः तुम इनका वरण कर लो, जैसे रत्न की शोभा सुवर्ण के साथ अधिक होती है वैसे ही तुम्हारा और अज का मेल अत्यन्त अनुरूप होगा। तब राजकुमारी इन्दुमती ने बड़ी प्रसन्नता से अज को स्वीकार कर लिया लज्जा के कारण वाणी से तो कुछ न कह सकी, किन्तु रोमाञ्च के बहाने सात्त्विक भाव के उदय हो जाने से उसका अनुराग प्रकट हो गया। इन्दुमती के अजविषयक अनुराग को देखकर सखी सुनन्दा ने परिहासपूर्वक कहा—आये ! दूसरे राजा के पास चलो, यह सुन इन्दुमती ने सुनन्दा को रोषपूर्वक तिरछी नजर से देखा, क्योंकि अब अन्यत्र जाना इन्दुमती को इष्ट नहीं था।
अनन्तर राजकुमारी इन्दुमती ने सुनन्दा के हाथों से कुंकुम के चूर्ण से लाल धागा वाली स्वयंवर माला को रघु पुत्र अज के गले में पहनवा दिया। एक समान शील, स्वभाव एव सौन्दर्य गुणवाले अज और इन्दुमती के सम्बन्ध से प्रसन्न हुए नगर निवासी कहने लगे कि यह इन्दुमती आज अज से वैसे ही मिल गयी जैसे निर्मल चन्द्र से चाँदनी तथा सागर से गङ्गा मिलती हैं। उस स्वयंवर मण्डप में एक तरफ प्रसन्न हुए वर पक्ष वाले थे और दूसरी ओर इन्दुमती को न प्राप्त कर सकने वाले राजाओं का झुण्ड था। उस समय वह मण्डप उस सरोवर के समान लग रहा था, जिसमें प्रातःकाल एक तरफ खिले हुए कमल हो, तो दूसरी ओर बिना खिले कुमुदों का समूह हो।
सप्तम सर्ग
स्वयंवर मण्डप में इन्दुमती द्वारा अज को माला पहनाकर वरण कर लेने के बाद भोजराज ने समान योग्य वर अज के साथ अपनी बहन इन्दुमती को लेकर अपने नगर की ओर चले और मुरझाये चेहरे वाले दूसरे राजा लोग इन्दुमती के प्रति निराश होकर अपने रूप एवं वेशभूषा की निन्दा करते हुए अपने-अपने शिविर की ओर चल दिये।
पुष्प, माला, ध्वजा, पताका आदि से अच्छी तरह सजाये गये राजमार्ग से जाते हुए वर-वधू को देखने वाली स्त्रियों की अनेकविध चेष्टाएँ हुईं—कोई स्त्री अपने केशपाश में माला बांधना भूलकर जूड़े को अपने हाथ में थामे ही