रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)
पृष्ठ 33, कुल 735 में से
संदर्भ में पढ़ें( १८ )
वायु से कपाई गयी बाग-बगीचों की परम्पराओं में विहार करना चाहती हो तो इनका वरण कर लो । फिर भी वे इन्दुमती को न जँचे ।
बाद सुनन्दा अनूप देश के राजा के पास ले जाकर कहने लगी—ये सहस्रार्जुन के वंश में उत्पन्न हुए हैं और बड़े गुणी हैं। इस राजा की माहिष्मती राजधानी की करधनी बनी नर्मदा नदी को महल में बैठकर देखने की यदि तुम्हारी इच्छा हो तो, इनकी अङ्क लक्ष्मी बन जाओ। अत्यन्त मनोरम होते हुए भी ये इन्दुमती को न जचे । तब सुनन्दा मथुरा के राजा सुषेण के पास ले जाकर इन्दुमती से उनका परिचय देने लगी—ये नीप वंश में उत्पन्न हुए हैं और इनकी कीर्ति दूसरे देशों में भी पायी जाती है। इनकी रनिवास की स्त्रियों के स्तनों के चन्दन से स्नान करते समय यमुना गङ्गा की तरङ्गों से मिली हुई सी जान पड़ती हैं। अतः कुबेर के बगीचे के समान वृन्दावन में विहार करने की इच्छा हो तो, इनसे विवाह कर वर्षा ऋतु में गोवर्द्धन की कन्दराओं में शिलाजीत से सुगन्धित चट्टानों पर बैठकर मोरों का नाच देखो । इनको छोड़कर इन्दुमती आगे बढ़ती है और सुनन्दा कलिङ्ग देश के राजा हेमाङ्गद के वर्णन के बाद नागपुर के राजा के वर्णन में कहने लगी कि ये पाण्डु प्रान्त के राजा देवताओं के तुल्य हैं। महर्षि अगस्त्य भी इनके अश्वमेध यज्ञ के अन्त में अवभृथस्नान की निर्विघ्न सम्पन्नता पूछते हैं। इनके बल से डरकर रावण भी इनसे मित्रता रखता है ! ये नील कमल के समान श्यामल हैं, तुम गोरोचना के समान गोरी हो । अतः मेघ एवं बिजली के समान तुम्हारा सम्बन्ध हो जाय । ये भी इन्दुमती को न जचे । जिस प्रकार रात में बत्ती जिन-जिन मकान को छोड़कर आगे बढ़ती जाती है वे वे मकान प्रकाश के अभाव में अन्धकार से विवर्ण हो जाते हैं, उसी प्रकार इन्दुमती जिन-जिन राजाओं को छोड़कर आगे बढ़ती गयी, वे-वे राजा भी उदास होते गये ।
इसके बाद इन्दुमती जब अज के पास पहुँची, तो उनका दक्षिण बाहु फड़कने लगा, उससे उनको विश्वास हो गया कि यह मेरा ही वरण करेगी। इधर इन्दुमती सर्वाङ्गसुन्दर एवं दोषरहित अज को प्राप्त कर आगे जाने से उसी प्रकार रुक गयी जैसे वसन्त ऋतु में बौर आये हुए आम के वृक्ष को छोड़कर भ्रमरपंक्ति दूसरे वृक्षों पर नहीं जातीं। सुनन्दा अज का वर्णन करती हुई कहने लगी—ये इक्ष्वाकुवंश में उत्पन्न महाराज दिलीप के पुत्र उस राजा रघु के सुपुत्र हैं जिन्होंने चारों दिशाओं से सम्पत्ति बटोरकर विश्वजित नामक यज्ञ में सर्वस्व समर्पण कर