भारतकोश
रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)

DevanagariHindipublished735 पृष्ठ

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ईश्वर की इच्छा से कहीं विष भी अमृत हो जाता है और कहीं अमृत भी विष हो जाता है । प्रिये ! मैंने बहुत अपराध किये पर तुमने कभी मेरा तिरस्कार नहीं किया । मैंने मन से भी तुम्हारी बुराई नहीं की फिर तुम क्यों छोड़ जा रही हो । देखो चन्द्रमा को रात्रि पुनः मिल जाती है, चकवे को चकवी प्रातः मिल जाती है पर तुम तो सदा के लिए चल बसी ! अब मैं क्या करूँ ? तुम्हारे चरणों की कृपा का स्मरण कर यह अशोक वृक्ष फूलों की आँसू बरसाकर तुम्हारे लिए रो रहा है । तुम्हारे सुख-दुःख की साथी सखियाँ रो रही हैं, चन्द्रमा के समान प्रसन्न मुख वाला तुम्हारा पुत्र विलख रहा है और तुम्हारा अनन्य प्रेमी मैं अत्यन्त दुःखी हूँ । आज मेरा धीरज छूट गया है । आनन्द जाता रहा, तुम्हीं बताओ मुझसे तुम्हें छीनकर निर्दयी विधाताने मेरा क्या नहीं छीन लिया ।

जब कोशलनरेश अपनी प्रिया के लिए इस प्रकार शोक कर रहे थे उस समय उन्हें देखकर वृक्ष भी मानों अपना शाखाओं से रस बहाकर आँसू बहाने लगे । कुटुम्बियों ने अज के गोद से इन्दुमती को हटाया और पुष्प माला से सजाकर ज्योंही चन्दन की लकड़ियों से उसका दाह संस्कार किया त्योंही अज पत्नी के वियोग में व्याकुल हो उठे । शास्त्रविधिके अनुसार दश दिन कृत्य सम्पन्न कर जब वे नगर में घुसे तब उन्हें देखकर नगर भर के लोग फूट-फूट कर रोने लगे ।

उन दिनों महर्षि वशिष्ठ अपने आश्रम पर ही एक यज्ञ में संलग्न थे, योग बल से राजाके शोक का कारण जानकर एक शिष्यसे सन्देश भेजा । एक बार तृणविन्दु नामक ऋषि तप कर रहे थे । उनकी तपस्या से डरकर इन्द्र ने उनका तप भंग करने के लिए हिरणी नामकी अप्सरा भेजी । जैसे गंगा की लहर तट को गिरा देती है वैसे ही ऋषि को तप से डिगाने के लिए वह अप्सरा वहाँ आ पहुँची । उसे देखते ही मुनि ने क्रुद्ध होकर शाप दिया कि जा तू संसार में मनुष्य की स्त्री हो जा । वह शाप सुनते ही घबड़ाकर मुनि से हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाती हुई बोली—भगवन् ! मैंने दूसरों के कहने से यह काम किया है । इसमें मेरा दोष नहीं हैं, मुझे क्षमा कीजिए । यह सुन ऋषि ने कहा जब तक तुम्हें स्वर्गीय पुष्प नहीं दिखाई पड़ेगा तब तक तुम्हें भूतल पर रहना पड़ेगा । वही अप्सरा विदर्भ वंश में जन्म लेकर तुम्हारी रानी बनी थी अब स्वर्गीय पुष्प देखकर वह शाप से मुक्त होकर स्वर्ग चली गई । अतः आप उसकी मृत्यु का शोक न करें। अब शोक छोड़कर पृथ्वी का पालन कीजिए ।