भारतकोश
रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)

DevanagariHindipublished735 पृष्ठ

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( २४ )

राजाओं की सच्ची पत्नी तो पृथ्वी ही है । तुम्हारे मरने पर भी वह अब न मिलेगी, क्योंकि मरने पर प्राणी अपने अपने कर्म के अनुसार अलग-अलग मार्ग से जाते हैं । शास्त्र कहते हैं कि जब कुटुम्बी अधिक रोते हैं तब प्रेतात्मा को बड़ा कष्ट होता है । जब शरीर और आत्मा का बिछोह हो जाता है तब पुत्र स्त्री आदि की क्या बात है । आप जितेन्द्रियों में श्रेष्ठ हैं अतः शोक मत कीजिए । इस प्रकार राजा ने आठ वर्ष किसी तरह बिताकर अपने सुशिक्षित कुमार दशरथ को शास्त्र के अनुसार प्रजापालन का उपदेश देकर भगवद्भजन करते हुए गंगा-सरयू संगम पर अपना शरीर त्यागकर स्वर्ग के नन्दन वन में चले गये । ( रघुवंश के आठवें सर्ग का इन्दुमती के मरने पर राजा अज का विलाप तथा कुमार संभव के चतुर्थ सर्ग में शङ्कर जी के क्रोधाग्नि से भस्म हुए कामदेव को देखकर रति का विलाप संस्कृत काव्यों में करुण रस का हृदयविदारक दृश्य है । )

नवम सर्ग

संयम से अपनी इन्द्रियों को जीत लेनेवाले योगियों में तथा प्रजापालक राजाओं में सर्वश्रेष्ठ राजा दशरथ ने अपने पिता के पश्चात् उत्तर कोशल का राज्य बड़ी योग्यता से संभाला । वे कार्तिकेय के समान बलवान् और समुद्र के समान गम्भीर थे । विद्वानों का कहना है कि इस विश्व में दो ही व्यक्ति ऐसे थे जिन्होंने कर्तव्यपालन करने वाले लोगों को समुचित फल दिया—एक मनुवंशी राजा दशरथ और दूसरा देवराज इन्द्र । दशरथ देवताओं के समान तेजस्वी और सागर के समान शान्त एवं धैर्यवान् थे । वे सबको समान समझते थे और सबसे एक-सा व्यवहार करते थे । वे कुबेर के समान प्रजाओं में धन बरसाते थे । हँसी में भी उन्होंने झूठ नहीं बोला । वे धनुष लेकर और अकेले रथ पर बैठकर समुद्र तक फैली हुई पृथ्वी का शासन करते थे । बादल के समान गरजता हुआ समुद्र उनका जय-जयकार करता था ।

जैसे इन्द्र ने अपने वज्र से पर्वतों के पंख काट दिये थे वैसे ही दशरथ ने अपने बाणों से शत्रुओं का सफाया कर दिया था । उनकी अयोध्या नगरी कुबेर की अलका से कम न थी । चक्रवर्ती राजा होने पर भी उनमें आलस्य नहीं था । जैसे पर्वतों से निकलनेवाली नदियां समुद्र को पा लेती हैं वैसे ही कोशल;